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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

उग्रगीता

( ४९ )

जब नर नींद करै सुख सोवे । सुषुप्ति लिये मगन सो होवे॥ और जब प्रलय होइ संसारा । रहै लीन सब ब्रह्म मझारा ॥ ए गतिभक्ति ते मुक्ति कहावे । पै काहेते आवै जावे ॥ सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । भेद न जा नर अज्ञानी ॥ संशय लीन मगन होइ सोवै । ताते फिर २ संशय होवै ॥ प्रलय घात जिव ब्रह्म समाई । मनोकामनाते फिरि आई ॥ जैसे कामना होवै लीना । तैसे कामना होवै बीना ॥ ताते आवागमन न छूटै । फिरि २ जन्म योनि धरि लूटै॥ जो चीन्है अभ्यन्तर आतम । चेतन रूप चिन्है परमातम ॥ सबके अंतर मैं ही व्यापौ । करण करावन मैं ही आपौ ॥ जैसे तिलमें तेल रहाई । जैसे काष्ठमें अग्नि रहाई ॥ अग्नि रूप हो अन्न पचावौ । सब जीवनके मध्य रहावौ । ऐसे व्यापक मैं अभ्यन्तर । चारिउ भोजन करौं निरन्तर ॥ चारिउ भोजन सुनो सुजाना । जो मुखमें सब आनि समाना॥ भक्षणमें एक भोजन भाई । डाढते चाभि २ सो खाई ॥ दूसर भोजन कहावै सोई । पहित भात जो भोजन होई ॥ तीसर भोजन जो नाम कहावै । डाढ दांत ताहि नहिं पावै ॥ सीरा सिरखन कठी कहावै । बिना दांतन रसना लै जावे ॥ चौथा भोजन नाम जो कहिया । दांत लगाय रस चूसे जहिया॥ यह सब भोजन मैं ही करऊँ । उदर सकलबिधि मैं ही भरऊँ॥ ब्रह्मरूप अविनाशी मोरा । पूर्ण अंश आहि यहि थोरा ॥ क्षर अक्षर दोउ ब्रह्म स्वरूपा । क्षर बिन रहै अक्षर अनूपा ॥ अक्षर पारब्रह्म सो आही । दुख सुख कछु व्यापै नहिं ताही॥ ब्रह्मो निशि दिन खोजत रहई । ताकर वार पार नहिं लहई ॥ जैन यती संन्यासी ढूँढै । बहुत मुडावै बहुते चूढै ॥

( ५० )

बोधसागर

ताकर वार पार नहीं पावै । खोजत २ जन्म गँवावै ॥ योगी जंगम और दरबेशा । बहु विधि रूप बनावै वेशा ॥ अक्षर गति कोइ पार न पावै । प्रभु पूरण सब माहँ रहावै ॥ जो सुमिरै प्रभु प्रेम लगावै । ताकह काल कबहुँ नहीं पावै ॥ ताको अवागमन नशाई । ना कहुँ आवे ना कहुँ जाई ॥ अर्जुन यह पुरुषोत्तम योगा । अध्याय पंचदश नाम संयोगा ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर धर्मदास सुजाना । ब्रह्मज्ञान यह कृष्ण बखाना ॥ ब्रह्मज्ञान ऐसा है सोई । उग्र ज्ञान जाने नहीं कोई ॥ जिन जाना तिन ही पहिचाना । जैसे गूँगे सपना जाना ॥ गूंगा शैन जो गूंगा जानी । अभिअन्तर सो ले पहिचानी ॥ मैं तोहि प्रगटै कहौ बखानी । गुप्त शैन कोइ गूंगे जानी ॥ अगम अपार शब्द निर्धारा । बूझै आदि अन्त सुख सारा ॥ नहीं बोली भाषा महाँ आवै । नहीं रूप कछु वरणि सुनावै ॥ हाथ न पांव सुतिं नहीं जाके । कहौ कैसे कोउ पावै ताके ॥ दृष्टि अदृष्टि न देखन आवै । सतगुरु अवर न वरण लखावै ॥

छन्द-वरण अवरण भाव बूझौ क्षर अक्षरको भेद जो ।

क्षर विनशित अक्षर सुस्थित अथ कहे यह भेद जो ॥

अक्षर माहिं नि दरशाय गुरु भेद लखाइया ।

कोटि वेद पुराण वांचे सतगुरु भेद लखाइया ॥

सोरठा-अक्षर भेद है सार बहु विधि कहौ पुकारिकै ।

बूझै बूझनिहार, आदि पुरुष सुख शब्द है ॥

इति श्रीमदुग्रगीतब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे पुरुषो-

त्तमयोग व्याख्यानो नामपंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

उपगीता

( ५१ )

अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

सुनौ संत तुम कुंतिकुमारा । पुरुषोत्तम मैं कहेउं विचारा ॥ अब दुइ योग मैं कहेउँ बखानी । दैव आसुरी ताको मानी ॥ दैव योग जो साथै प्राणी । दैवकी शरण लेइ पहिचानी ॥ ताको लक्षण कहि समुझावौ । भिन्न भाव करि बरणि सुनावौ ॥ दैव योग संपदा को वर्णक । ताको पूजि होइ जो शर्णक ॥ प्रथम अभय निर्भय होइ रहई । काहूकी कछु शंक न करइ ॥ सत राखै अभ्यंतर अपने । झूठ न व्यापै कबहीं सपने ॥ ज्ञान योगते मन थिर राखै । दम शाम कै काया में राखै ॥ दान पुण्य मैं चित अभिलाषै । योग युक्ति मैं बहु विधि भाषै ॥ नित्त नेम पठै गुरु मंत्रा । ताते काया होइ पवित्रा ॥ अरि औ मित्र एक सम जानै । इच्छा काहूकी मनन्हि आनै ॥ होइ अकोध जो त्यागे हठको । शीतल रूप जो साथे घटको ॥ जुगली चाली दूरि बहावै । दया भाव चित माहि समावै ॥ लव लिप्सन होई जिय जाके । कोमल वचन रहै सुख ताके ॥ लोक लाज तजि साधु सुभावै । चपल बुद्धि कह दूरि बहावै ॥ तेज तजै सत्क्रियाकी आसा । क्षमावंत होइ रहेउ उदासा ॥ धीरज मनमें सदा समाई । शुचि संयम करि युक्ति रहाई ॥ होइ अद्रोह द्रोहन्हि आवै । सदा देव संपद मन भावै ॥ मन इच्छा पूजै सब कामा । देव कर्म ताकर है नामा ॥

आसुरी संपदाको वर्णन

अब आसुरी को करौ बखाना । हृदयमें नहीं ज्ञान समाना ॥ दंभ करी करि लोक देखावै । अंतर्गतन्हि ब्रह्म समावै ॥ द्रव्य देखि फूलै अधिकारी । निशिदिन लवलिप्साचितधारी ॥

( ५२ )

बोधसागर

करि अभिमान आपको जानै । और न दूसर चितमें आनै ॥ क्रोध सदा अभि अन्तर राखै । बहु कठोर कोमल नहिं भाखै॥ रहै अज्ञान ज्ञान नहिं भावै । जहां ज्ञान तहैं रोष उठावै ॥ प्रवृत्ति निवृत्ति पुण्य औ पापा । कर्म धर्म करि थापैं आपा ॥ शौच किया मानै नहिं आवै । निराचारमें मन चित लावै ॥ जत्नके अस्त सदा सुख मानै । जग कर्ताको कबहि न मानै ॥ यह व्यवहार आसुरी आही । कबहु न सुमिरे प्रभु जो ताही॥ ऐसे जीव सदा दुख पावै । नरक वास में जाइ समावै ॥ नर्क द्वार तीन हैं भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥

तीन द्वार नर्कको वर्णन

प्रथम द्वार जो काम बनावा । काम द्वारलै चित्त लगावा ॥ कामविषय निशिदिन लपटाना । नर्क वासमें जाइ समाना ॥ दूसर द्वार क्रोध कहावै । जाके क्रोध सदा चित भावै ॥ ताते नर्कवास में जाई । उपजत विनशत बहु दुख पाई॥ तीसर द्वार लोभ है भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥ लोभ लागि जो जन्म गवाई । वासा नर्क सदा सो पावै ॥ नर्क द्वार यह तीन बखाना । मूरख इनमें रहै समाना ॥ दैव आसुरी संपद नामा । अध्याय षोडशो कहेउँ बखाना॥

कवीर उवाच

कहै कवीर सुनु संत विवेकी । दोउ संपदा कहेउँ विशेषी ॥ पाप पुण्य हैं दोऊ बेरी । एक लोहे एक कंचन केरी ॥ बेरी पाय एक दुख होई । कंचन ते सुख अधिक न सोई॥ यह संसार फंद यम केरा । कैसे छूटै यम उर झेरा ॥ कर्म करै कर्ता न कहावे । पाप पुण्य शिर भार लेयावे ॥ सत संतोष हियेमें धरई । सहज सरूपी भवजल तरई ॥

उग्रगीता

( ५३ )

साधु संत सेवा चित राखै । सदगुरु शब्द अमीरस चाखै॥ चाखत अमी अमर सो होई । अजर अमर सत्यलोक समोई॥

छन्द-धर्मदास तुम सुनो चित दै कर्म न लागे दासको । पाप पुण्य बंधा रहै जो छुटन चाहै फंद सो ॥ सुवा नलिनी पकरि अरझो आपनी मति मंद सो ।

सोरठा-सदा अहेरी काल, पाप पुण्य फंदा रचो । सदगुरु दीन दयाल, कर्म काटि मुक्ता करो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंभादे देवा- सुरसंप्रदायाख्यानां नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहेउ सुनौ यदुराई । कछु मोरे जिय संशय आई ॥ सो अब प्रगट कहौ भगवाना । आगे सूक्ष्म सुना मैं काना ॥ शास्त्र धर्म छाड़ि जिन दीन्हा । तिनकी गति तुम कैसे कीन्हा॥ रूप सरूप कौन है ताही । सत रज तमगुण ये को आही॥

श्रीभगवानुवाच

कहैं कृष्ण सुतु कुंतिकुमारा । भली बात कर कीन्ह विचार॥ जग रचना शास्त्र मत आही । तेहि मारग सब लागे जाही ॥ शास्त्र न वेद पुराण न छोडे । सो तौ नर्कवास में बोडे ॥ जब लगि ब्रह्मज्ञान नहि आवे । तब लगि शास्त्र धर्म मन लावे॥ जब आवे याको ब्रह्मज्ञाना । शास्तर वेद कितेव हेराना ॥ ता कह कर्म न लागे भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥ जब आतम परमातम जानै । कर्म धर्मते भे निरवानै ॥

( ६४ )

बोधसागर

मोक्ष सरूपी आपे होई । ना फिर जन्मे मरै न सोई ॥ ऐसी भांति जो साधु रहाई । ना कहँ आवै ना कहँ जाई ॥ अब तीनों गुण वर्नि सुनावौं । सकल कामना तोर मिटावौं ॥

त्रिगुणको वर्णन

सत रज तमगुण तीनि बखाना । तीनते तीनि २ औ जाना ॥ पूजा तीनि अब कहौं बखानी । पूजहिं सुर नर सुनि औ ज्ञानी ॥ सात्त्विकी देवा पूजैं भाई । राजस पूजैं यक्ष बनाई ॥ तामस भूत प्रेत पूजावहिं । नर्कवास लै सो मुक्तावहिं ॥

त्रिगुण अहारको वर्णन

अहार तीन अब सुनले भाई । सबमें सत रज तम जो आई॥ खीर खांड घृत करै अहारा । यह लक्षण सतगुण व्यवहारा॥ साधु सरूपी सदा सु चाला । सन्तनको बहुविधि प्रतिपाला॥ करुवा खट्टा लोनु तीक्षण । ये अहार राजस लक्षण ॥ दुख सुख ताहि जो व्यापे भाई । नाना व्यञ्जन करै बनाई ॥ तमगुणके आहार बखाना । भई रसोई पहर सेराना ॥ भोजन करि २ लोक सिधवै । स्वाद अनेक रहै ना पावै ॥ होइ उछिष्ट अन्न अब भाई । तामसि तामस करि २ खाई॥

त्रिगुण यज्ञ वर्णन

द्रव्य यज्ञ प्रथम है भाई । बिन फल इच्छा यज्ञ कराई ॥ प्रभुके सुमिरन रहै समाई । ताकी बुद्धि सात्त्विकी भाई ॥ राजस यज्ञ करै फल चाहे । दंभ करै यश कृत्रिम समाहै ॥ यज्ञ विधि निह तामसी होई । अन चूने बिनु करै रसोई ॥ जैसे तैसे यज्ञ करै पूरा । दक्षिना देत बहुत कै घूरा ॥ खरच करै औ कल्पे भाई । ताते नर्क बास चलि जाई ॥

उग्रगीता

(५५)

त्रिगुण तपस्या वर्णन

तनसो देवता पूजा लावै । गुरु और ज्ञानी पूज पुजावै ॥ शुचि संयम जो कोमल रहई । ताकर काल पला नहिं गहई ॥ ब्रह्मचर्य पुत्रि आनि जेवावै । रहै अनिच्छा सत्य न खोवै ॥ यह तन पूजा करै सुजाना । गुरु गोविन्द को धारे ध्याना ॥ सत्त्विक मन तप कहौं बुझाई । इन्द्री सबै हाथ जेहि आई ॥ प्रथमै प्रसन्न जो राखै । मौन रहै अमृत रस चाखै ॥ आतम निग्रह करै सुजाना । अन्तर्भाव सुधा निर्वाना ॥ तपस्या मनकी कही सुनाया । सुधा सरूपी सतगुण भाया ॥

सात्त्विकी वचन तपस्या वर्णन

वचन तपस्या करो बखाना । यह तप मुखते भया प्रवीना ॥ अभय वाक्य ताकूं भइ नाहीं । सत्ति सरोत्तर जस मुख माहीं ॥ प्रिय हित साधु वचन सो कहहीं । पाठ करी करि जन्म सुधरही ॥ एते वचन तपस्या होई । मुखते करे करावै सोई ॥ तीनि तपस्या सतगुण भावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥ रजस तपस्या त्रे प्रकारा । ताकूं अब मैं करो प्रचारा ॥ तीनि तपस्या राजस भाई । तनसों तपकरि लोक देखाई ॥ मनसों कपट कबहुँ नहिं छूटै । वचन सदा मुख बोले झूटै ॥ तीनि तपस्या राजस होई । ऐसी भांति करे जो लोई ॥ तामस तप है तीन प्रकारा । शुभ अशुभ कछु नाहिं विचारा ॥ हठ करि तपसो तनको गारै । मनमें कोध सदा जो धोरै ॥ वचन कठोर बहुत सो बोले । तामस ताप अहं लिये डोलै ॥ तीन तपस्या त्रिगुण सुभावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥

त्रिगुण दानका वर्णन

तीनि प्रकार दान अब वनौं । उत्तम सेवा ब्रह्महि चीन्हौं ॥

( ५६ )

बोधसागर

अन आश्रित को देइ जो दाना । तीरथ उत्तम ठौर ठेकाना ॥ दान देइ फल चाहै नाहीं । सात्त्विक दान सो कहिये ताहीं ॥

राजस दानका वर्णन

जत अश्रेको दान जो देई । लाहा कारण संशय लेई ॥ यह तौ राजसको व्यवहारा । दान देइ चित कल्पै भारा ॥

तामस दानका वर्णन

तामस अशुचिको देइ जो दाना । नटुवा वेश्या हित करि जाना ॥ ब्राह्मण देत क्रोध मन करई । इच्छा बहुतै फलको धरई ॥ यह लक्षण तामस कर होई । तीनि प्रकार दान है सोई ॥

तीनि नाम त्रिगुणको वर्णन

तीनि नाम वर्णौ मैं त्रिगुणा । जाते सृष्टि होत है सगुना ॥ वह अंतुतु है मति सोई । तीनिउ नाम एक सम होई ॥ निज मंत्रहि मैं भाषि सुनाया । ताको मर्म न काहू पाया ॥ पाक रसोइ छूति जो होई । वो अंततू सति है सोई ॥ पातक छूति रहैं नहिं कोई । यह तौ मंत्र पवित्र कराई ॥ पावै प्रसाद जो सकल जहाना । सुमिरे पावै पद निर्वाना ॥ सब कारज सुमिरे त्रे नामा । पूर्ण होइ सकल विधि कामा ॥ योग सिद्धि सत्रह अध्याई । सो तौ पूर्ण वर्णि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनु धर्मनिराया । तीनिउ गुण वरतै संसारा ॥ साधू कहैं कोइ कर्म न लगै । तन मनते इच्छा कह त्यागै ॥ कर्म करै कर्ता न कहावै । मन सो कुमारग जान न पावै ॥ मारग अगम साधुकर होई । कृष्ण अपने मुख भाषा सोई ॥ वेद पुराण पार नहिं पावै । जहँवा साधू ध्यान लगावै ॥ वेद कितेब दोउ है फन्दा । यहि ते लागि रहै जग धन्या ॥

उग्रगीता

( ९७ )

ज्ञानहि कहि २ कर्म हटावै । यज्ञ दान फिरि जन्म धरावै ॥ हम तौ कहौ अगोचर ज्ञाना । जाते होइ हंस निर्वाना ॥

छन्द—अगम अगोचर भेद सदगुरु साधु रहै समाइ कै । हंस होइ सत्यलोक आवै दरस सद्वरु पाइ कै ॥ पूरा गुरु जो पावई तौ मिटै यम फंद को । हंसको मुक्ताइ यमसो मिलै अच्युतानंदको ॥

सोरठा—ऐसा शब्द अपार, वार पार बिच भेद को । सत्य शब्द निर्धार, सद्वरु सोइ बताइया ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे योग-

सिद्धव्याख्यानो नाम सप्तश्लोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अथ अष्टादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहैं सुनो यदुनाथा । जो पूछौं सो कगै सनाथा ॥ सन्यास कर्म काहे सो कहिये । त्याग रूप सब वर्णन चहिये ॥

संन्यासको वर्णन

सुनु महाबाहु मैं कहौं बखाना । कर्म नाश संन्यास समाना ॥ कर्म धर्मको मारग छोंडै । ब्रह्म ध्यान अभ्यन्तर मांडै ॥ सब परपंचते न्यारा होई । कर्म संन्यास कहावै सोई ॥

त्यागरूप दर्शन

त्याग रूप है अगम अलेखा । कर्म करै नहिं आपु विशेषा ॥ निशि दिन कर्म धर्म जो होई । रहै अलिस लिस नहिं होई ॥ अपनेको कर्ता नहिं जानै । फल औ फल मनहिं नहिं आनै ॥ ताकहैं त्याग कहीये भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥

( ५८ )

बोधसागर

संन्यास त्रिप्रार वर्णन

संन्यास त्याग तीनि गति होई । अनिष्ट इष्ट मिश्र गति सोई ॥ अनिष्ट नर्ककी योनी भुक्ते । देव योनिको इष्ट संयुक्ते ॥ मिश्र मानुषकी देह जो पावै । तीनों गति गीता बतलावै ॥

त्रिप्रकार क्रिया वर्णन

कहौ क्रिया तीनिहु समुझाई । ज्ञान कर्म कर्ता जो आई ॥

ज्ञान क्रिया त्रिप्रकार

प्रथमैं ज्ञान सुनौ चितलाई । ताकर लक्षण तीनि बताई ॥ जबही ज्ञान हृदयमें आवै । सर्व त्यागि प्रभुको लवलवै ॥ सर्व व्यापि जो ब्रह्महि जानै । सात्त्विक लक्षण ज्ञान बखानै ॥ राजस लक्षण जानै प्रभु न्यारा । न्यारा २ ब्रह्म विचारा ॥ तामस लक्षण एक ठौरहि जानै । मूरति प्रतिमा पूजा ठानै ॥ ताहि एहै ठाकुर है येही । परम पुरुषते नाहिं सनेही ॥ जेहि देवा कौ जो कोई ध्यावै । तेहि देवहि ठाकुर ठहरावै ॥ यह लक्षण तम गुण व्यवहारा । तामैं वास है नरक दुबारा ॥

कर्म क्रिया त्रिप्रकार वर्णन

दोसर कर्म लक्षण है तीनि । जानै कोउ साधू परबीनी ॥ कर्म करै फल चहैन ताको । पुत्र कलत्र असंग सदाको ॥ राग द्वेष जाके नहिं आवै । एतौ सत्त्वगुण कर्म सुभावे ॥ राजस कर्म सुनावौं मीता । करि २ कर्म कामना प्रीता ॥ कर्म अधिकार आपु ना होई । फल वांछै मन राजस सोई ॥ तामस कर्म सुनौ तुम भाई । तप स्नान औ जप लर जाई ॥ हठ करि कर्म करै बहु भाई । दुख सुख अह निशि लहै सदाई ॥ ता प्रकार क्रोधहु बहु होई । तामस नर्क वास है सोई ॥

कर्ता लक्षण त्रै प्रकार

तीसर कर्ता रूप बखानौं । कारण करण करै सोइ जानौं ॥

उग्रगीता

( ५९ )

सात्त्विक कर्ता जो कछु करई । आपु मेटि प्रभुको चित धरई ॥ आपुको कर्ता नहिं जानै । कर्ता पूरण पुरुष बखानै ॥ ऐसी रहनि रहै जो दासा । नर्क स्वर्गकी ताहि न आसा ॥ सो सत्त्व गुण लक्षण है भाई । जाते कहिये साधु सुभाई ॥ राजस कर्ता आपुको जानै । दाराहित सुत आपको मानै ॥ बहुतै हर्ष शोक तेहि भावै । थोर करै बहुतै फल धावै ॥ तामस कर्ता लक्षण भाई । आलस निद्रा बहुत रहाई ॥ आपु अयोग चाहै पुरुषारथ । ह्वै अधीन नहिं चाहै स्वारथ ॥ कारज होइ गये अब जाको । दिन औ राति बतावै ताको ॥ भोर होइ सो दिवस बतावै । तामसकर यह सदा सुभावै ॥

त्रिप्रकार बुद्धिको वर्णन

तीनि प्रकार बुद्धि है भाई । प्रथमैं सुमिरन मैं ठहराई ॥ निवृत्ति प्रवृत्ति जो मारग जानै । करै विचार धर्म पहिचानै ॥ काज अकाज न बंध न मोक्षण । सो साध्वी है सात्त्विक लक्षण ॥ दुसरी बुद्धि तो धर्म अधर्मा । काज अकाज जाने सब पर्मा ॥ राजस बुद्धि लक्षण यह भाई । मनमें सहा विचार कराई ॥ तामसबुद्धि अब सुनहु सुजाना । क्रोध लिये मन विषय सुजाना ॥ धर्महि सो अधरम करि जानै । करै अधर्म धर्म पहिचानै ॥ ता अधरम कह धर्म जो कहई । सदा तामसी बहु दुख सहई ॥

त्रिप्रकार धीरज

सात्त्विक धीरज वरणि सुनाऊ । संशय तोर जो सकल मिटाऊं ॥ पांच तत्त्व मन संयम साधै । सकल कामना यह अवराधै ॥ इंद्री सकल एक सम कराई । सात्त्विक ऐसो धीर धराई ॥ राजस धीरज है परसंगा । पारस लागे धर्म उमंगा ॥ कर्म करै संगति ते सोई । औ फल चाहै राजस होई ॥

( ६० )

बोधसागर

धीरज तामस सपना देखै । भय अभय सकलौ में पेखै ॥ शोक विषाद बसै मन माहीं । तामस धीरज लक्षण आहीं ॥

त्रिप्रकार सुख वर्णन

अब सुख लक्षण कहौ जो सोई। तीनि भांति सुख व्यापक होई॥ प्रथमहि सात्त्विक सुख सुनु भाई। सुख कहैं विषके जानै सोई ॥ सुखसो कबही हेत न जानै । विष समान ताकह पहिचानै ॥ अंत समय विषसो सुख होई । सात्त्विक लक्षण बरनौ सोई ॥ दूसर इन्द्री सुख संयोगा । परनारी सो करै जो भोगा ॥ यही प्रकार महा सुख करई । सो सुखी अंत जो विषसो होई॥ राजस सुख लक्षण यह भाई । दुख बहुतक व्यापै जाई ॥ तीसर तामस सुखहि बखानो । विवेक विचार हृदय नहि अनो॥ आलस निद्रा बहु सुख मानै । सपने कबहीं राम न जानै ॥ तामस सुख यह कहिये भाई । जाते नर्क सदा भर्माई ॥

वर्णका वर्णन

चारि वर्ण अब वर्णौ भाई । तिनके ये गुण प्रगट सुनाई ॥ ब्राह्मण सत्त्वगुण रूप विराजै । कर्म स्वभाव ताहि तन छाजै ॥ शम दम तव शून्या सो करई । ज्ञान विज्ञान सत्य मन धरई ॥ स्थिर मनमें कठोर तन होई । ब्राह्मण कर्म स्वभाव जो सोई॥ क्षत्रिय सत्वरज दुइ गुण धारी। शूरबीर दाता अधिकारी ॥ तीक्ष्ण धीरज बुद्धि हे जागी । युद्ध करत कबहूँ नहि भागी ॥ वैश्य राजसी कहौ बुझाई । कृषी गऊ रक्षक है भाई ॥ वणिज व्योहार बहुत संसारा । यह तौ लक्षण वणिज व्यवहारा॥ शूद्र वर्ण सेवकाई करई । सेवक होइ भवसागर तरई ॥ सेवा फल है अगम अपारा । आवागमनते होई निनारा ॥ जो अभिमान तौ जन्म गवाँवै । सेवा विना नहीं बनि आवै ॥

उग्रगीता

( ६१ )

चारि वर्णको कर्म सुनाई । अर्जुन तोहि कहौं ससुझाई ॥ जो कोइ अपने धर्महि चाहे । प्रीति भाव सदा चित लाहे ॥ भला जानि पर धर्म न लेई । आपन धर्म छांड़ि नहि देई ॥ निज कुल छांड़ि ऊंच मन धरई । सो पुनि भवसागरमें परई ॥ कुलके कर्म सदा सुख पावै । नवनिधि लक्ष्मी ता घर आवै ॥ ताते तोहि कहौं ससुझाई । युद्ध करो तुम अर्जुन भाई ॥ कहा हमार चित नहि धरिहौ । हमरे कहे युद्ध नहि करिहौ ॥ तौ अब कर्म रेख उठि धावै । तोसो युद्ध अनेक करावै ॥ तब तुम करो युद्ध संग्रामा । करो मारि क्षत्रियके कामा ॥ तब तोहि रोख अधिक होइ भाई । हमरी प्रीति भंग होइ जाई ॥ जो नीका सो करो सुजाना । ज्ञान अज्ञान सब करेउँ बखाना ॥ यह गीता मैं कहि जो सुनावा । पै कछु भेद और ससुझावा ॥ गीता मता गुप्त है भाई । चारिहु जनको कहि ससुझाई ॥

चारि अवर्णको वर्णन

भक्ती हीना तपसो हीना । सेवा बिना नहीं आधीना ॥ निद्रा रूप सदासों रहई । तासो गीता कबहु न कहई ॥ तासों संगति कबहु न कीजे । इच्छा प्रभुकी गहिकै लीजे ॥ गुप्त ज्ञान है कथा पियारी । तहाँ कहो जहँ होइ हितकारी ॥ भक्त साधु जहँ हरि यश गावै । गीता कथा तहाँ अर्थोवै ॥ सुनत सुनावत बहु सुख होई । कोटिक अश्वमेध फल होई ॥ अर्जुन गीता तुम्है सुनावौं । ज्ञान कथा कहि बहु ससुझवौं ॥ मोह तुम्हार छूटि की नाही । सो तुम बोलौं हमरे पाहीं ॥ जो कछु तुम्हरे मनमें होई । करो जाइ तुम अर्जुन सोई ॥ अर्जुन सुनत दंडवत कीन्हा । विनय भांति ते बहु सुख दीन्हा ॥ मोह मोरि सब दूरि परानै । वचन तुम्हार ज्ञान करि मानै ॥ अन्न लीन तब हाथ उठाई । महा कोप होइ धनुष चढाई ॥

( ६२ )

बोधसागर

अध्याय अठारह कहा बखानी । योग सन्यास नाम तेहि जानी॥ अर्जुन गीता भयो समापति । जो कछु कही आपुकमलापति॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुन धर्मनि हीता । तुम्हरे लिये बखानेउँ गीता ॥ तुम तौ भक्त जत्तते न्यारा । आवागमनके बीज तुम्हारा ॥ अब तुम परम भक्ति चितलावौ । निशिदिनसतगुरुशब्द समावौ ॥ धर्मदास बिनती इठि लाई । सुनि गीता संशय उपजाई ॥ गीता कही कृष्ण केहि कारण । अर्जुन उठे कुटुम्ब संचारण ॥ ज्ञान सुने मति निर्मल होई । मित्र औ दुष्ट एक सम होई ॥ ज्ञान सुने कछु कोध न आवै । परम पुरुषते मन चितलावै ॥ गीता कृष्ण जो कहेउ बखाना । ज्ञान सुनाइ कोध मन आना ॥ कोधविना सो युद्ध न होई । नर्क द्वार कृष्ण कहेउ सोई ॥ कोध किये अज्ञान कहावै । यह सब भेद मोहि समुझावै ॥ कृष्णमता कहि प्रकट देखाऊ । ज्ञान सुने अज्ञान न आऊ ॥

कबीर उवाच

सुनि धर्मनि यह भेद है बंका । जानत नहीं राउ औ रंका ॥ कृष्ण ठगौरी जत्त लगाई । ताते भेद न बूझौ भाई ॥ यह प्रपंच कृष्णकर आही । तीनिहु लोक सदा भर्माई ॥ चाहै छल बल युद्ध करावै । अर्जुन कैसे धनुष उठावै ॥ महामोह तेहि रहा समाई । और भांति नहि मानै भाई ॥ छलहि मता किन्हौ आपै सोई । ज्ञान सुनाइ मोह कह खोई ॥ यह तौ ज्ञान कहो परमारथ । जेहिते युद्ध होइ पुनि स्वारथ ॥ जैसी इच्छा करै जो ज्ञाना । फल पावै सेवा अनुमाना ॥ नहिं अर्जुन मनपुरुष मिलापा । कैसे कर्म होइ निष्पापा ॥ पुरुष मिलाय न कृष्ण सुनावै । कैसे अगम अगोचर पावै ॥

उग्रगीता

( ६३ )

पावै अगम कृष्ण को मानै । तीनि लोकको भूपति जानै ॥ ताते ज्ञान कहि कर्म दृढ़ावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहैं सुनो गोसाई । मारग साधु जो अगम सुनाई ॥ कर्म धर्म कह पाछे मेलै । ज्ञान रूप अभ्यन्तर खेलै ॥ परम अनंद पुरुषको दर्शै । सेवक स्वामी चरण न पशैं ॥ गीता कहै औ कर्म दृढ़ावै । केहि कारण इनको भटकावै ॥ कौन ज्ञान जो भर्म बतावै । फिरि २ भवसागर भटकावै ॥

कवीर उवाच

धर्मदास मैं कहौ बुझाई । मूरुख लोग नहीं पतिआई ॥ तीनिउ लोक पुरुषपहि दीन्ह। राजे काज करावन कीन्ह। ॥ जो चाहै सो रचे बनावै । तीनि लोकते जान न पावै ॥ ज्ञानोपदेश देह जो भाई । तौ यह सृष्टि वैराग उठाई ॥ तब यह रचना सबही थाके । इनको कौन गोसाईया थापे ॥ तेहि कारण इन कर्म दृढ़ाई । अरुझी सृष्टि सकल भर्माई ॥ सतगुरु शब्द सुना कहैं दरसै । जाते प्रभु पूरण कहैं परसे ॥ गीता कहि जो कृष्ण सुनाई । तबहु न अंधा मोहि पतिआई ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु मैं तव बलिहारी ॥ जब कर अर्जुन धनुष संभारा । कहा कीन्ह सो कहौ विचारा ॥

कवीर उवाच

सुनो संत धर्मनि निर्वाना । अंत युद्ध सब करों बखाना ॥ बहुते भांति युद्ध तिन कीन्ह। युद्ध जीति राजहि मन दीन्ह। ॥ राज युधिष्ठिर मनहि विचारा । बहुते भांति बंधु हम मारा ॥ कस प्रायश्चित्त मोक्षण होई । कहो व्यास हमसों तुम सोई ॥

( ६४ )

बोधसागर

व्यास कृष्ण मिलि मत अर्थाई । कुल हत्या कैसे मुक्ताई ॥ करो विचार अश्वमेध जो करई । यज्ञ करत हत्या परिहरई ॥ सब मिलि ऐसा मता विचारा । बहुत भांति यज्ञ करौ संभारा ॥ ताते पाप मोक्ष होइ भाई । यज्ञ करनको मता हटाई ॥ करौ यज्ञ मन भयो विश्रामा । राज मनोरथ पूर्ण कामा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनवै कर जोरी । संशय उपजी मेटेउ मोरी ॥ पांडव कृष्णहि बहुत पियारे । किया यज्ञ तब कहाँ सिधारे ॥ कैसे गति मति उन पुनि पाई । कृष्ण सरीखो रहै समाई ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम चतुर सुजाना । पूछेउ सो अब करौ बखाना ॥ कृष्ण देह जब छांडन लागे । तिनसों कहो ताहिंते आगे ॥ अवधि हमारि आय नियराई । तुम हूँ गरो हेवारे जाई ॥ अर्जुन कहहु सुनौ गोसाई । कारण कवन हेवारे जाई ॥ कृष्ण कही तब ऐसी बाता । तुम तौ बंधु कीन्ह है घाता ॥ पातक बहुत जो तुमसे भयऊ । गरै हेवारे ताते कहेऊ ॥ कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराना । मारण बंधु न हम चित आना ॥ गीता ज्ञान मोहि समुझाया । युद्ध करनको अस्त्र बँधाया ॥ तुमको पातक नाहीं लागे । कर्ता करै आपु अनुरागे ॥ तुम्हरे कहे युद्ध हम कीन्हा । पातक हम शिर काहे दीन्हा ॥ पुनि तुम कह अश्वमेधहि करहू । सब पातक पाछिल परिहरहू ॥ तापर हम अश्वमेध जो कीन्हा । तबहू पातक हम शिर दीन्हा ॥ कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु भाई । कर्म रेख मेटो नहिं जाई ॥ कर्म रेखते सब जग आवै । बार बार दुख सुख भुक्तावै ॥ चारिउ युग फिरि याहै आई । हम तुम ऐसे संग रहाई ॥

उद्गीता

( ६५ )

ताते कछु संदेह न कीजै । वेगि हेवारे पयाना दीजै ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास पूछै सुनु भाई । आगे कैसे भई गुसाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर यह सर्ग बखाना । तुमसों वर्णन कहौं निदाना ॥ पांडव जाइ हेवारे गलिया । देह समेत युधिष्ठिर चलिया ॥ करेउ पुण्य जप तप औदाना । ताते पहुँचे स्वर्ग स्थाना ॥ और पांडवा नर्क समाने । हत्याके फल नर्क रहाने ॥ तहां जाइ कोइ बंधु न देखा । पूछेउ सबै देव मुनि शेषा ॥ कहां हमारे चारिउ भाई । केहि कारण मोहि इहां ले आई ॥ इहां कहां वे बसवे पाई । जाके खोजौं चारिउ भाई ॥ तुम राजा हो धर्म अवतारा । ताते पहुंचै स्वर्ग दुआरा ॥ बंधु तुम्हार पातक बड़ कीन्हा । ताते बास नर्कमें दीन्हा ॥

युधिष्ठिर उवाच

की उनको इहवां लै आवहु । की हमको उहवां लै जावहु ॥ जब यह विष्णु सुनो मन जानी । इनकह पुण्य बहुत पहिचानी ॥ उपजो मोह बंधु हित भाई । जाइ ले आवहु बंधु देखाई ॥ नर्क कुण्ड तेहि जाइ देखाई । बूड़ देखे चारिउ भाई ॥ और सकल परिवार घनेरा । काहू सुधि नहिं काहू केरा ॥ चारिउ भाई रोवन लागे । कर्म हीन हम बड़े अभागे ॥ राइ युधिष्ठिर मोह जनाऊ । मोह नर्क कुंड ले नाऊ ॥ दूत विष्णु सों बहुरि जनार्द । आपु युधिष्ठिर नर्कमें जाई ॥ जो कछु आज्ञा होइ गोसाई । आज्ञा मानि करौ सोइ जाई ॥ कहै विष्णु यह धर्म सरूपा । करो युधिष्ठिर पुण्य अत्रुपा ॥ जो कबहीं वे नर्क में जैहैं । अघ जीवन सब ले उत्तरे हैं ॥

नं. ८ कबीर सागर - ३

( ६६ )

बोधसागर

क्षण अंगुरी ले नर्कमो डारो । एते चारिउ बन्धु उबारो ॥ फिर लै आवहु कुंती जहवां । स्वर्ग स्थान वैकुंठ हैं जहवां ॥ ऐसी भांति करौ तहैं जाई । क्षणहि अंगुरी नर्क बुझाई ॥ ता कहैं लागि बंधु सब आये । राइ अनंद बहुत सुख पाये ॥ गये युधिष्ठिर धर्म स्थाना । धर्म पुत्र रहे धर्म ठेकाना ॥ भीम जाइकै पवन समाई । पवन पुत्र जेहि कहिये भाई ॥ अर्जुन इन्द्र पुत्र जो रहिया । इंद्रलोकमें बासा करिया ॥ सहदेव नकुल जो दूनों भाई । अश्विनि कुमार पुत्र हितलाई ॥ ऐसे स्वर्ग लोक जो किय बासा । पुण्य घटै भवसागर आसा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास कहैं सुनो गोसाँई । पांडव मित्र विष्णुके आहीं ॥ गीता भागवत वेद पुकारा । दर्शन प्रभु जिन नेक निहारा ॥ ताकर आवागमन न होई । सुर नर सुनि सब भाषै सोई ॥ साधु संत मिले सब गुणगवैं । जो कोइ हरिके दर्शन पावैं ॥ ताकी मोक्ष मुक्ति होइ भाई । जरा मरणको बीज नसाई ॥ साक्षादर्शन कृष्णको लहिया । और विराट देखायो तहिया ॥ मोक्ष मुक्ति उन काहे न पाई । साहेब कहौ मोहि समुझाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । पुरुष एक आदि रहि वासा ॥ तिन्ह पुनि खासा कीन्ह प्रकाशा । धर्म धीर एक अंश नेवासा ॥ तिनते उपजेउ ॐॐकारा । माया प्रकट भई विस्तारा ॥ ब्रह्मा विष्णु उपजे तब भाई । जिन यह रची सृष्टि दुनियाई ॥ इनकह तीनलोक जो दीन्हा । राज रूप रचना तिन कीन्हा ॥ सकल बीज जो पुरुषते आया । जाते सकल सृष्टि निर्माया ॥ कामिनि जबै धर्म निज कीन्हा । कर्मरेख जो भया अधीना ॥ दश अवतार कर्म सो भयऊ । कारण कर्म इन्है निर्मयऊ ॥

उग्रगीता

( ६७ )

कर्मरेख रघुपति दुख पायउ । सीता शोक बहु पछितायउ ॥ नरसिंह शूकर रूप धरावा । मच्छ कच्छ सर्व कर्म बनावा ॥ वामन होइ बलि छलिया जाई । परशुराम होइ युद्ध कराई ॥ कर्मरेख यदुपति दुख पावा । बन २ घेनु चरावन धावा ॥ गोपी षोडश सहस्र अनंदा । तिन सँग नाचे बाल सुकुन्दा ॥ कर्मरेख भे बोध शरीरा । आवा गमन मिटो नहीं पीरा ॥ निष्कलंक है दश अवतारा । कर्मरेख भय प्रलय संचारा ॥ इनते अधिक और को आही । कर्मरेखते भुक्तत जाही ॥ अंकुरी कोइ जीव रहे भाई । सो अंकुर पुरुष ते आई ॥ तिन कह पुरुष जो चितवन कीन्हा । कैसे लोक होइ लव लीना ॥ सतगुरु यहि कारण उपजावा । हंसन कारण मोहिं पठावा ॥ मूर्खा शब्द नहिं मानै भाई । अंकुरी परवाना पाई ॥ कर्मरेख पांडव दुख पावा । कर्मरेख छूटै न छुटावा ॥ इन कहैं सब जग करता जाने । ताते आवा गमन नसाने ॥ सतगुरु मिले सत्य शब्द लखावै । कर्मरेख बंधन सुक्तावै ॥

छंद-धर्मदास तुम बूझि देखौ छल मता भगवानहो ।

मूर्ख जन उपदेश कारण गीता कियो बखान हो ॥

पांच पांडव परम मंत्री तिनको गति कैसी दर्ई ।

नर्क स्वर्गमें वास करि २ जन्म फिरि २ तिन लई ॥

सोरठा-बूझो संत सुजान, गीता कथा जो सब सुनी ।

चेतनि हंस अमानि, और सकल भरमें दुनी ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

त्यागसंन्यासव्याख्यानं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

( ६८ )

बोधसागर

अथ उपसंहार

धर्मदास उचाव

धर्मदास विनवै कर जोरी । तुम दयालु बंदी मोरि छोरी ॥ गीता जो तुम कही बखानी । पांडवकी गति सब मैं जानी ॥ ऐसे सब जीव भरमाई । कैसेहु भांति मुक्ति नहिं थाई ॥ सोइ ज्ञान मोहिकहि समुझावौ । जरा मरण को बीज नसावौ ॥

कबीर उचाव

सुनु धर्मदास हंस पतिराया । हंसन कारण पुरुष की दया ॥ अंकुरी जिव आपु बोलाया । ताते हम कह लेन पठाया ॥ सत्य शब्द अब करौ प्रकाशा । पावै हंसा लोक निवासा ॥ उग्र ज्ञान है मता निनारा । सुक्ष्म वेद जो पुरुष संचारा ॥ पुरुष दया आनेउ संसारा । जेहिते पावै मुक्ति दुवारा ॥ अध्याय उनइस कहौं ये भाई । सुर नर मुनि जाने नहिं ताई ॥ मुक्त होइ सत्यलोकहि जावै । आदि पुरुषके दर्शन पावै ॥ प्रथमै रहनी हंस बखानो । निशि दिन रहै नाम लपटानो ॥ तीनों गुण है विषके मूला । ताते दुख सुख भये स्थूला ॥ दुइ गुण कबहीं चित नहिं धारै । रज तमको परंपच विसारै ॥ वासा करै सत्यके माहीं । आसा ताकी राखै नाहीं ॥ प्रकृति पचीस पंच तत्त्व रहई । तीनिउ गुण कारण यह वहई ॥ जो तीनिउ गुण वश करै आपै । पंच पचीस कोइ नहिं व्यापै ॥ तीनिउ गुणते न्यारा खेले । मनुआ सत्य सुमिरनमें मेले ॥ श्वास मुर्ति एक डोरी लावै । अजर अमर होइ हंस मिलावै ॥ मन पवना ले सुख मनि राखै । सोहं हंस अमीरस चाखै ॥ तहवां अनहद होइ झनकारा । विन दीपक मंदिर उजियारा ॥ अनहद सुने अकह गुप्त गावै । मन चित गहि २ सुरति लगावै ॥ तहवां रैन दिवस नहिं होई । पुरुष २ सो सुरति समोई ॥