कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ६१ )
चारि वर्णको कर्म सुनाई । अर्जुन तोहि कहौं ससुझाई ॥ जो कोइ अपने धर्महि चाहे । प्रीति भाव सदा चित लाहे ॥ भला जानि पर धर्म न लेई । आपन धर्म छांड़ि नहि देई ॥ निज कुल छांड़ि ऊंच मन धरई । सो पुनि भवसागरमें परई ॥ कुलके कर्म सदा सुख पावै । नवनिधि लक्ष्मी ता घर आवै ॥ ताते तोहि कहौं ससुझाई । युद्ध करो तुम अर्जुन भाई ॥ कहा हमार चित नहि धरिहौ । हमरे कहे युद्ध नहि करिहौ ॥ तौ अब कर्म रेख उठि धावै । तोसो युद्ध अनेक करावै ॥ तब तुम करो युद्ध संग्रामा । करो मारि क्षत्रियके कामा ॥ तब तोहि रोख अधिक होइ भाई । हमरी प्रीति भंग होइ जाई ॥ जो नीका सो करो सुजाना । ज्ञान अज्ञान सब करेउँ बखाना ॥ यह गीता मैं कहि जो सुनावा । पै कछु भेद और ससुझावा ॥ गीता मता गुप्त है भाई । चारिहु जनको कहि ससुझाई ॥
चारि अवर्णको वर्णन
भक्ती हीना तपसो हीना । सेवा बिना नहीं आधीना ॥ निद्रा रूप सदासों रहई । तासो गीता कबहु न कहई ॥ तासों संगति कबहु न कीजे । इच्छा प्रभुकी गहिकै लीजे ॥ गुप्त ज्ञान है कथा पियारी । तहाँ कहो जहँ होइ हितकारी ॥ भक्त साधु जहँ हरि यश गावै । गीता कथा तहाँ अर्थोवै ॥ सुनत सुनावत बहु सुख होई । कोटिक अश्वमेध फल होई ॥ अर्जुन गीता तुम्है सुनावौं । ज्ञान कथा कहि बहु ससुझवौं ॥ मोह तुम्हार छूटि की नाही । सो तुम बोलौं हमरे पाहीं ॥ जो कछु तुम्हरे मनमें होई । करो जाइ तुम अर्जुन सोई ॥ अर्जुन सुनत दंडवत कीन्हा । विनय भांति ते बहु सुख दीन्हा ॥ मोह मोरि सब दूरि परानै । वचन तुम्हार ज्ञान करि मानै ॥ अन्न लीन तब हाथ उठाई । महा कोप होइ धनुष चढाई ॥