कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
धीरज तामस सपना देखै । भय अभय सकलौ में पेखै ॥ शोक विषाद बसै मन माहीं । तामस धीरज लक्षण आहीं ॥
त्रिप्रकार सुख वर्णन
अब सुख लक्षण कहौ जो सोई। तीनि भांति सुख व्यापक होई॥ प्रथमहि सात्त्विक सुख सुनु भाई। सुख कहैं विषके जानै सोई ॥ सुखसो कबही हेत न जानै । विष समान ताकह पहिचानै ॥ अंत समय विषसो सुख होई । सात्त्विक लक्षण बरनौ सोई ॥ दूसर इन्द्री सुख संयोगा । परनारी सो करै जो भोगा ॥ यही प्रकार महा सुख करई । सो सुखी अंत जो विषसो होई॥ राजस सुख लक्षण यह भाई । दुख बहुतक व्यापै जाई ॥ तीसर तामस सुखहि बखानो । विवेक विचार हृदय नहि अनो॥ आलस निद्रा बहु सुख मानै । सपने कबहीं राम न जानै ॥ तामस सुख यह कहिये भाई । जाते नर्क सदा भर्माई ॥
वर्णका वर्णन
चारि वर्ण अब वर्णौ भाई । तिनके ये गुण प्रगट सुनाई ॥ ब्राह्मण सत्त्वगुण रूप विराजै । कर्म स्वभाव ताहि तन छाजै ॥ शम दम तव शून्या सो करई । ज्ञान विज्ञान सत्य मन धरई ॥ स्थिर मनमें कठोर तन होई । ब्राह्मण कर्म स्वभाव जो सोई॥ क्षत्रिय सत्वरज दुइ गुण धारी। शूरबीर दाता अधिकारी ॥ तीक्ष्ण धीरज बुद्धि हे जागी । युद्ध करत कबहूँ नहि भागी ॥ वैश्य राजसी कहौ बुझाई । कृषी गऊ रक्षक है भाई ॥ वणिज व्योहार बहुत संसारा । यह तौ लक्षण वणिज व्यवहारा॥ शूद्र वर्ण सेवकाई करई । सेवक होइ भवसागर तरई ॥ सेवा फल है अगम अपारा । आवागमनते होई निनारा ॥ जो अभिमान तौ जन्म गवाँवै । सेवा विना नहीं बनि आवै ॥