कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ५९ )
सात्त्विक कर्ता जो कछु करई । आपु मेटि प्रभुको चित धरई ॥ आपुको कर्ता नहिं जानै । कर्ता पूरण पुरुष बखानै ॥ ऐसी रहनि रहै जो दासा । नर्क स्वर्गकी ताहि न आसा ॥ सो सत्त्व गुण लक्षण है भाई । जाते कहिये साधु सुभाई ॥ राजस कर्ता आपुको जानै । दाराहित सुत आपको मानै ॥ बहुतै हर्ष शोक तेहि भावै । थोर करै बहुतै फल धावै ॥ तामस कर्ता लक्षण भाई । आलस निद्रा बहुत रहाई ॥ आपु अयोग चाहै पुरुषारथ । ह्वै अधीन नहिं चाहै स्वारथ ॥ कारज होइ गये अब जाको । दिन औ राति बतावै ताको ॥ भोर होइ सो दिवस बतावै । तामसकर यह सदा सुभावै ॥
त्रिप्रकार बुद्धिको वर्णन
तीनि प्रकार बुद्धि है भाई । प्रथमैं सुमिरन मैं ठहराई ॥ निवृत्ति प्रवृत्ति जो मारग जानै । करै विचार धर्म पहिचानै ॥ काज अकाज न बंध न मोक्षण । सो साध्वी है सात्त्विक लक्षण ॥ दुसरी बुद्धि तो धर्म अधर्मा । काज अकाज जाने सब पर्मा ॥ राजस बुद्धि लक्षण यह भाई । मनमें सहा विचार कराई ॥ तामसबुद्धि अब सुनहु सुजाना । क्रोध लिये मन विषय सुजाना ॥ धर्महि सो अधरम करि जानै । करै अधर्म धर्म पहिचानै ॥ ता अधरम कह धर्म जो कहई । सदा तामसी बहु दुख सहई ॥
त्रिप्रकार धीरज
सात्त्विक धीरज वरणि सुनाऊ । संशय तोर जो सकल मिटाऊं ॥ पांच तत्त्व मन संयम साधै । सकल कामना यह अवराधै ॥ इंद्री सकल एक सम कराई । सात्त्विक ऐसो धीर धराई ॥ राजस धीरज है परसंगा । पारस लागे धर्म उमंगा ॥ कर्म करै संगति ते सोई । औ फल चाहै राजस होई ॥