भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ५८ )

बोधसागर

संन्यास त्रिप्रार वर्णन

संन्यास त्याग तीनि गति होई । अनिष्ट इष्ट मिश्र गति सोई ॥ अनिष्ट नर्ककी योनी भुक्ते । देव योनिको इष्ट संयुक्ते ॥ मिश्र मानुषकी देह जो पावै । तीनों गति गीता बतलावै ॥

त्रिप्रकार क्रिया वर्णन

कहौ क्रिया तीनिहु समुझाई । ज्ञान कर्म कर्ता जो आई ॥

ज्ञान क्रिया त्रिप्रकार

प्रथमैं ज्ञान सुनौ चितलाई । ताकर लक्षण तीनि बताई ॥ जबही ज्ञान हृदयमें आवै । सर्व त्यागि प्रभुको लवलवै ॥ सर्व व्यापि जो ब्रह्महि जानै । सात्त्विक लक्षण ज्ञान बखानै ॥ राजस लक्षण जानै प्रभु न्यारा । न्यारा २ ब्रह्म विचारा ॥ तामस लक्षण एक ठौरहि जानै । मूरति प्रतिमा पूजा ठानै ॥ ताहि एहै ठाकुर है येही । परम पुरुषते नाहिं सनेही ॥ जेहि देवा कौ जो कोई ध्यावै । तेहि देवहि ठाकुर ठहरावै ॥ यह लक्षण तम गुण व्यवहारा । तामैं वास है नरक दुबारा ॥

कर्म क्रिया त्रिप्रकार वर्णन

दोसर कर्म लक्षण है तीनि । जानै कोउ साधू परबीनी ॥ कर्म करै फल चहैन ताको । पुत्र कलत्र असंग सदाको ॥ राग द्वेष जाके नहिं आवै । एतौ सत्त्वगुण कर्म सुभावे ॥ राजस कर्म सुनावौं मीता । करि २ कर्म कामना प्रीता ॥ कर्म अधिकार आपु ना होई । फल वांछै मन राजस सोई ॥ तामस कर्म सुनौ तुम भाई । तप स्नान औ जप लर जाई ॥ हठ करि कर्म करै बहु भाई । दुख सुख अह निशि लहै सदाई ॥ ता प्रकार क्रोधहु बहु होई । तामस नर्क वास है सोई ॥

कर्ता लक्षण त्रै प्रकार

तीसर कर्ता रूप बखानौं । कारण करण करै सोइ जानौं ॥