कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ९७ )
ज्ञानहि कहि २ कर्म हटावै । यज्ञ दान फिरि जन्म धरावै ॥ हम तौ कहौ अगोचर ज्ञाना । जाते होइ हंस निर्वाना ॥
छन्द—अगम अगोचर भेद सदगुरु साधु रहै समाइ कै । हंस होइ सत्यलोक आवै दरस सद्वरु पाइ कै ॥ पूरा गुरु जो पावई तौ मिटै यम फंद को । हंसको मुक्ताइ यमसो मिलै अच्युतानंदको ॥
सोरठा—ऐसा शब्द अपार, वार पार बिच भेद को । सत्य शब्द निर्धार, सद्वरु सोइ बताइया ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे योग-
सिद्धव्याख्यानो नाम सप्तश्लोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथ अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कहैं सुनो यदुनाथा । जो पूछौं सो कगै सनाथा ॥ सन्यास कर्म काहे सो कहिये । त्याग रूप सब वर्णन चहिये ॥
संन्यासको वर्णन
सुनु महाबाहु मैं कहौं बखाना । कर्म नाश संन्यास समाना ॥ कर्म धर्मको मारग छोंडै । ब्रह्म ध्यान अभ्यन्तर मांडै ॥ सब परपंचते न्यारा होई । कर्म संन्यास कहावै सोई ॥
त्यागरूप दर्शन
त्याग रूप है अगम अलेखा । कर्म करै नहिं आपु विशेषा ॥ निशि दिन कर्म धर्म जो होई । रहै अलिस लिस नहिं होई ॥ अपनेको कर्ता नहिं जानै । फल औ फल मनहिं नहिं आनै ॥ ताकहैं त्याग कहीये भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥