कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
करि अभिमान आपको जानै । और न दूसर चितमें आनै ॥ क्रोध सदा अभि अन्तर राखै । बहु कठोर कोमल नहिं भाखै॥ रहै अज्ञान ज्ञान नहिं भावै । जहां ज्ञान तहैं रोष उठावै ॥ प्रवृत्ति निवृत्ति पुण्य औ पापा । कर्म धर्म करि थापैं आपा ॥ शौच किया मानै नहिं आवै । निराचारमें मन चित लावै ॥ जत्नके अस्त सदा सुख मानै । जग कर्ताको कबहि न मानै ॥ यह व्यवहार आसुरी आही । कबहु न सुमिरे प्रभु जो ताही॥ ऐसे जीव सदा दुख पावै । नरक वास में जाइ समावै ॥ नर्क द्वार तीन हैं भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥
तीन द्वार नर्कको वर्णन
प्रथम द्वार जो काम बनावा । काम द्वारलै चित्त लगावा ॥ कामविषय निशिदिन लपटाना । नर्क वासमें जाइ समाना ॥ दूसर द्वार क्रोध कहावै । जाके क्रोध सदा चित भावै ॥ ताते नर्कवास में जाई । उपजत विनशत बहु दुख पाई॥ तीसर द्वार लोभ है भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥ लोभ लागि जो जन्म गवाई । वासा नर्क सदा सो पावै ॥ नर्क द्वार यह तीन बखाना । मूरख इनमें रहै समाना ॥ दैव आसुरी संपद नामा । अध्याय षोडशो कहेउँ बखाना॥
कवीर उवाच
कहै कवीर सुनु संत विवेकी । दोउ संपदा कहेउँ विशेषी ॥ पाप पुण्य हैं दोऊ बेरी । एक लोहे एक कंचन केरी ॥ बेरी पाय एक दुख होई । कंचन ते सुख अधिक न सोई॥ यह संसार फंद यम केरा । कैसे छूटै यम उर झेरा ॥ कर्म करै कर्ता न कहावे । पाप पुण्य शिर भार लेयावे ॥ सत संतोष हियेमें धरई । सहज सरूपी भवजल तरई ॥