भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उपगीता

( ५१ )

अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

सुनौ संत तुम कुंतिकुमारा । पुरुषोत्तम मैं कहेउं विचारा ॥ अब दुइ योग मैं कहेउँ बखानी । दैव आसुरी ताको मानी ॥ दैव योग जो साथै प्राणी । दैवकी शरण लेइ पहिचानी ॥ ताको लक्षण कहि समुझावौ । भिन्न भाव करि बरणि सुनावौ ॥ दैव योग संपदा को वर्णक । ताको पूजि होइ जो शर्णक ॥ प्रथम अभय निर्भय होइ रहई । काहूकी कछु शंक न करइ ॥ सत राखै अभ्यंतर अपने । झूठ न व्यापै कबहीं सपने ॥ ज्ञान योगते मन थिर राखै । दम शाम कै काया में राखै ॥ दान पुण्य मैं चित अभिलाषै । योग युक्ति मैं बहु विधि भाषै ॥ नित्त नेम पठै गुरु मंत्रा । ताते काया होइ पवित्रा ॥ अरि औ मित्र एक सम जानै । इच्छा काहूकी मनन्हि आनै ॥ होइ अकोध जो त्यागे हठको । शीतल रूप जो साथे घटको ॥ जुगली चाली दूरि बहावै । दया भाव चित माहि समावै ॥ लव लिप्सन होई जिय जाके । कोमल वचन रहै सुख ताके ॥ लोक लाज तजि साधु सुभावै । चपल बुद्धि कह दूरि बहावै ॥ तेज तजै सत्क्रियाकी आसा । क्षमावंत होइ रहेउ उदासा ॥ धीरज मनमें सदा समाई । शुचि संयम करि युक्ति रहाई ॥ होइ अद्रोह द्रोहन्हि आवै । सदा देव संपद मन भावै ॥ मन इच्छा पूजै सब कामा । देव कर्म ताकर है नामा ॥

आसुरी संपदाको वर्णन

अब आसुरी को करौ बखाना । हृदयमें नहीं ज्ञान समाना ॥ दंभ करी करि लोक देखावै । अंतर्गतन्हि ब्रह्म समावै ॥ द्रव्य देखि फूलै अधिकारी । निशिदिन लवलिप्साचितधारी ॥