भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( ९३ )

अमी तत्त्वकी देह बखानी । अजर तत्त्वमूल पहिचानी ॥ साखी-अमरपुरीको यह गुन, अमर हंस होजाइ । कबीर ज्ञान स्थिति बिना, जीव प्रलय तर जाइ॥

चौपाई

नाद प्रकट बिंदुहिं सो भयऊ । बिन्दु प्रकट नादहि जो लहिऊ॥ शब्द भेदते श्वास जो जानी । श्वासरूप शब्दहि पहिचानी ॥ नाद बिंदु जब नाहीं रहिया । तबकी बात तुमहिंसों कहिया॥ अमी अघर कीनी जब ग्रामा । नीर ब्रह्म लीनो विश्रामा ॥ नाद निरञ्जन प्रगटे जबही । श्वास प्रेम गुरु कीन्हो तबही ॥ बिन्दु सकलसे भयो पसारा । देह बिदेह सो रहत न न्यारा ॥ जब नहिं धरती नहिं आकाशा । तब नहिं सहज कूर्म परकाशा॥ चकित अण्ड चौँकरे मुचंदा । हमें देखि करि सहज अनंदा ॥ सारशब्द कबीरहि जाना । अंगहि अंग आहि बिहराना ॥ फूटा अंड कटे तब अंशा । योग जीत उपजे निःसंशा ॥ नहिं तब धरती नहिं आकाशा । साखी शब्द नहीं परकाशा ॥ तबही पुरुष कहां धौं रहेऊ । कौन तत्त्वमें वासा लहेऊ ॥ गुप्तहि तत्त्व गुप्त अस्थाना । गुप्त वस्तुमें रहे निदाना ॥ गुप्त हते तब प्रकटे भयऊ । अमर दीप उच्चारण लयऊ ॥ शब्द उचारो अमर अखंडा । बीरा सार बिदेही पंडा ॥ तादिन पुरुष आप जो रहते । कौन पिंडमें वासा करते ॥

साखी-राईभसा जो वस्तु थी, राई मर अस्थूल । लहर लहर दिल अंदरा, तहाँ पुरुषको मूल ॥

चौपाई

जब नहिं हते कूर्म नहिं कामा । आदि पुरुष कीन्हो निज नामा ॥ नाम सार हंसा जेहि पावा । वो जन चार काल पहुँचावा ॥