भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1234, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1234

( ९४ )

बोधसागर

पहुँचावतमें कछु दिल मोरा । वारी लांघि सकै नहिं चोरा ॥ जो बोले तो शिर छिन जाई । खूट गहे तो अंग नशाई ॥ सारनाम सतगुरुने दीना । ताते धर्म शीस पर लीना ॥ जो कोइ करै नाम महाँ वासा । ताकहँ होइ न काल तरासा ॥ नाम प्रताप काल नश जाई । काले खेले पुरुष जाई ॥ नौ दल गुप्त हृदयमें टीका । अमर मोक्षपद पावै नीका ॥ नौदल नाम जो कहौं बिचारी । षट्दल काटि जो बाहर डारी ॥ शुभ दल शुभचित बन भरमा । भये दल क्रोध संत तज करमा ॥ अस्थित दल राखे निज मनको । पहुँचे हँस लोक सुरजनको ॥

सार्वी-यहि गुण ज्ञान स्थितिहिमें, शब्द सिंहासन सार । केहे कवीरा नाम बल, पहुँचि पुरुषके द्वार ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनवे कर जोरी । साहब कहौं नामकी डोरी ॥ अगम निगम शारद औ शेशा । तुम दातामांगन सब देशा ॥ कहो बचन प्रभु हृदय विचारी । कैसे कूर्म लीन अवतारी ॥ आदि ब्रह्मका कहौं निवासा । केहिविधि लीन कमलमें बासा ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास मैं कहौं बुझाई । अकथ कथा कछु कही न जाई ॥ आदि अन्तको नाहिं निवासा । आसा सार पुरुष परकाशा ॥ बिना नालको कमल अनूपा । पूरुष तामहँ कही सरूपा ॥ तबही भई अधर सों बानी । बिन रसनावह अगम निशानी ॥ बिनहि बिन्दु जिद एक कियऊ । अजय अपार सरोवर लियऊ ॥ अष्ट कमल तहां कीन्ह प्रकाशा । अष्ट पुत्र को तहां निवासा ॥ अष्टताल सुत नाम धरावा । अब मैं कहौं नाम परभावा ॥ मनसा बुद्धि निरञ्जन कीन्हा । सहज सुरतिसों उत्पति लीन्हा ॥