कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबोध
( ९९ )
अरध ऊर्ध्वबिच कमल अपारा । दामिनि कोटि होत उजियारा॥ पाजी नाम पंच दिल राखो । हंसा उबारन कहि यह भाखो॥
आकाशपाँजी
आदि अजर अदलीनिर नामा । सप्तसिन्धु है जियको कामा ॥ सप्तसिन्धु पाजी ले नामा । सो यह परब्रह्मको धामा ॥ यही नाम जियको रख वारा । खोलो कुंजी कुलफ केवारा ॥ हंस ले गए पुरुष दर्बारा । झिलमिल ज्योति झलक उजियारा॥ नाभि मण्डल पवन किवारा । दुरे सुनीरी मूलके द्वारा ॥ भए निरन्तर थकित शरीरा । धर्मदास कह मिले कबीरा ॥ धर्मदास यह दिलकी पाँजी । यही नाम धरि बहुऐ साँजी ॥ पिंड नाम सो दिलमें मूला । येहि नाम पहुँचे अस्थूला ॥
सार्वी-ज्ञानस्थितके यह गुन, पुरुष पाजी निज सार ।
यह पाँजी जब पावही, हंस होइ निस्तार ॥
चौपाई
हो सद्गुरुमें तुम बलिहारी । मिटि गइ तिमिर भई उजियारी॥ हों पतंग तुम भुंग गुसाई । आप सरीख कीन्ह एहि ठाई॥ सप्त सिन्धु पृथ्वीमें आहीं । सकल जगत इनहींके माहीं ॥ सप्त सिन्धु जो रहे पताला । सातनाल प्रभु कहौं रिसाला ॥ सातौ नाल कवन विधि हेरा । जामें सुषुमण होइ निवेरा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास यह अकथ कहानी । बिरले हंस कीन्ह पहिचानी ॥ अगम विचार कीन्ह व्यवहारा । जासों भया सकल विस्तारा ॥ जबहीं हंसा तजे शरीरा । शब्द प्रताप होय गंभीरा ॥ सप्त सिंधु नर पावै कोई । सप्त सिंधुमें जाय समोई ॥ सप्त सिंधु आरम्भ न करई । त्यागि शरीर हंस गति धरई ॥ जाय करै मुख सागर बासा । मान सरोवर करहिं निवासा ॥