कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानस्थितिबोध
( ९९ )
अरध ऊर्ध्वबिच कमल अपारा । दामिनि कोटि होत उजियारा॥ पाजी नाम पंच दिल राखो । हंसा उबारन कहि यह भाखो॥
आकाशपाँजी
आदि अजर अदलीनिर नामा । सप्तसिन्धु है जियको कामा ॥ सप्तसिन्धु पाजी ले नामा । सो यह परब्रह्मको धामा ॥ यही नाम जियको रख वारा । खोलो कुंजी कुलफ केवारा ॥ हंस ले गए पुरुष दर्बारा । झिलमिल ज्योति झलक उजियारा॥ नाभि मण्डल पवन किवारा । दुरे सुनीरी मूलके द्वारा ॥ भए निरन्तर थकित शरीरा । धर्मदास कह मिले कबीरा ॥ धर्मदास यह दिलकी पाँजी । यही नाम धरि बहुऐ साँजी ॥ पिंड नाम सो दिलमें मूला । येहि नाम पहुँचे अस्थूला ॥
सार्वी-ज्ञानस्थितके यह गुन, पुरुष पाजी निज सार ।
यह पाँजी जब पावही, हंस होइ निस्तार ॥
चौपाई
हो सद्गुरुमें तुम बलिहारी । मिटि गइ तिमिर भई उजियारी॥ हों पतंग तुम भुंग गुसाई । आप सरीख कीन्ह एहि ठाई॥ सप्त सिन्धु पृथ्वीमें आहीं । सकल जगत इनहींके माहीं ॥ सप्त सिन्धु जो रहे पताला । सातनाल प्रभु कहौं रिसाला ॥ सातौ नाल कवन विधि हेरा । जामें सुषुमण होइ निवेरा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास यह अकथ कहानी । बिरले हंस कीन्ह पहिचानी ॥ अगम विचार कीन्ह व्यवहारा । जासों भया सकल विस्तारा ॥ जबहीं हंसा तजे शरीरा । शब्द प्रताप होय गंभीरा ॥ सप्त सिंधु नर पावै कोई । सप्त सिंधुमें जाय समोई ॥ सप्त सिंधु आरम्भ न करई । त्यागि शरीर हंस गति धरई ॥ जाय करै मुख सागर बासा । मान सरोवर करहिं निवासा ॥
( १०० )
बोधसागर
सप्त सिन्धुके नाम सुनाऊं । भिन्न भिन्न सब तोहि लखाऊं ॥ सप्त सिन्धु अब लखि पावे कोई । समता सिन्धुमें रहे समोई ॥ योग सिन्धु अब कहों बखानी । अजांवन सिन्धु लेव पहिचानी ॥ अमर सिन्धु हंसा लखि पावे । अकह सिन्धुमें जाय समावे ॥ सुखहिं सिन्धुहि कीन्ह पैठारा । सप्तहि सन्धुहि नाम उचारा ॥
साखी-ज्ञान स्थितको पायके, मन सुस्थिर हो जाय । कहे कबीर धर्मदाससों पुरुष नाम समुझाय ॥
चौपाई
पुरुषहि नाम कहौं समुझाई । धर्मदास हिय गहो बनाई ॥ याही कारण अजपा कीन्हा । जीवन संधि परी नहिं चीन्हा ॥ पुरुषहते तब मूलके ठाऊं । तब नहिं दीपलोक अवगाऊं ॥ चौबिश पुत्र तबे नहिं रहिया । तबही वचन अम्र जो कहिया ॥ ता पाछे ओंकार जो कीन्हा । ओंकार सो सब रचि लीन्हा ॥ साहब वचन सत्य फरमाया । सत्य शब्द अक्षर निर्माया ॥ कबहुँ नाहिन अस्थिर होई । बरा बार मन देह बिगोई ॥ काया भीतर आप लखावा । ताते अजपा नाम कहावा ॥ याहि शब्दसे सुद्ध शरीरा । याहि शब्दसे मिले कबीरा ॥ याहि शब्द हृदय सुख होई । निर्मलहोहि विशहिं सबखोई ॥ अस्थिर मनकर प्रफुलित राखे । नाम संधि हृदये महाँ चाखे ॥ निर्मल हंस होत है तबही । अमरलोक पहुँचि है जबही ॥ सातों सुरति तबहि परकाशा । पुरुषहि को राखे विश्वासा ॥ उत्पति शब्द जबे निर्मावा । सो अक्षरमिलिशिवहिं कहावा ॥ शिवहि शब्दसों जीव कहावा । जीव नाम संसार कहावा ॥ सातों नाल वाहिके अंगा । जिहि जग मीतर माडो रंगा ॥ अक्षर शब्दसे शिव जो आवा । वाही अक्षर गुरु कहावा ॥
ज्ञानस्थितिवोध
( १०१ )
काशी मध्य मरे जो कोई । होहि पखान रूप तब सोई ॥ चौरासीसे रहित जो होई । पाहन रूपहि जन्म विगोई ॥ शब्द संपूरन शिव जो जाना । त्यों सुकृतके बहुत परवाना ॥ अक्षत ले आरति कर सोई । उन कर मंत्र कहत सब कोई ॥ तारक मंत्र वयसको नाहीं । पण्डित शब्द गहत मनमाहीं ॥ यही मंत्र कहत सब कोई । साहब चरण न पावैं सोई ॥ क्षमा गुरु निश्चय जो पावा । सद्गुरु शब्द अहर्निश लावा ॥ क्षमा गुरु कहिए अविनासी । मानसरोवर तटके वासी ॥ रचना भेद ले शिव कह दीना । यहि विश्वास मनहि कर लीना ॥ भवसुर केहि शिखावन एहा । सनकादिक कर चरण सनेहा ॥ यही प्रणालि गही सब कोई । गुरु निर्गुणकर भेद समोई ॥ याहीमें सब परै भुलाई । दृढ़तही जग करूप बिताई ॥ जो चाहे सुकृत कर लेखा । आप आप सो करै विवेका ॥ उनकर चीन्हि अमरपद पाई । सूक्ष्म मुक्ति नाम गुण गार्ई ॥
साखी—यह गुण ज्ञानस्थितिके, जो पावैं निज नाम । अजपा जपै कबीरको, सो पहुँचे निज धाम ॥
चौपाई
शब्द पाय लोक जिन चीन्हा । नाम अखण्डित जब धरलीन्हा ॥ मुक्तामणि निज नाम हमारा । हंस उबारहि भवसे पारा ॥
साखी—सोहं नाम हृदय धरै, और जपे नहिं जाप । मूल शब्दही रटन कर, मूल शब्द हो आप ॥ करै निरूपण शब्दको, कहै कबीर बखान । मूल ध्यान गहि पावही, सुख सागर अस्थान । मूल शब्दके येह गुन, अमी दीपक कहैं जाइ ॥ कबीर ज्ञानस्थित बिना, मूल नाम नहिं पाइ ।
( १०२ )
बोधसागर
गुरु महिमा प्रारम्भः
चौपाई
गुरु होहि वहि ताहि लखावै । गुरु बिन अंत न कोई पावै ॥ जिन गुरुकी कीन्हरी परतीती । एक नामकर भव जल जीती ॥ गुरु पुरुष जिय करहि मराला । गुरु सनेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु प्रगट है गुप्त अधारा ॥ गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थलमहँ कीन निवासा ॥ चंद्र सूर्य गुरु सब संसारा । गुरु गंधर्व गुरु सब व्यवहारा ॥ गुरु ब्रह्मा और विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चराचरहि जहँ लगि सब देखा । गुरु बिना कछू और नहिं पेखा ॥ उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्हे गुरु शरिष्ठा ॥ ये सब जीव गुरुमय जानो । गुरुसे भिन्न अन्य नहिं मानो ॥ कहैं कबीर सो हंस पियारा । येहि भांति गुरु दरश निहारा ॥ साखी-सो गुरु निशिदिन बंदिये, जासों पाये नाम । नाम बिना घट अंध है, ज्यों दीपक बिन धाम ॥
चौपाई
गुरु चरण जे राखे ध्याना । अमर लोक वह करत पयाना ॥ अमर कमल ज्यों रहैं लुभाई । या विधि गुरु चरणन लपटाई ॥ तन मन धन न्योछावर राखे । दर्शहि पशं अमी रस चाखे ॥ चरण धोय चरणामृत पावै । पुरुष समीप पहुँच सो जावै ॥ गुरु बिहून अमृत नहिं दीजै । अमृत छांड़ि विषय रस लीजै ॥
साखी-महा पुरुषको नाम है; जा घट मांहि समाय । सोई सद्गुरु जानिया, अरु कृत्रिम सब पाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाहि बलिहारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०३ )
जबसे दीन्ह मुक्तिकर बीरा । तीन ताप मिटि गई अधीरा ॥ साहब कहिये शब्द अनन्दा । जाते यमकर छूटै फन्दा ॥ चरणामृत कैसे कर लीजे । तौन शब्द मोसों कहि दीजे ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहों विचारी । चरणामृत शब्दहि निरवारी ॥ यहि पाये निज करहि अहारा । जासों यमकी छूटै धारा ॥ प्रथम भोर मुख उठिके धोवे । काल कष्ट यमद्वार बिगोवे ॥ फेर करहिं शब्दको आशाना । वही शब्दसो मुक्ति निदाना ॥ बहुरि हिये महाँ नामहि आने । नाम विदेह दरश पहिचाने ॥ नाम विदेही कठिन अपारा । ताहि चीन्हि कर करहुँ अहारा ॥ ध्यान बीज गुरुचित महाँ आने । सुरति निरति पुरुषहि पहिचाने ॥ बहुरि शब्द आनंदित भाषे । मुख महाँ धोइ नाम रस चाखे ॥
साखी—इह गुण ज्ञानस्थितहिके, शब्द भेद निजसार ।
गुरुचरणामृत लेहि तब, होवे हंस उवार ॥
स्मरण
श्वेत मिठाई श्वेतहि पाना । श्वेत शब्द लेखनि परवाना ॥ योग सत्य इन दीन्हो बीरा । मनको उलटि खोज लै हीरा ॥ बीरा खाय भयो मुख भारी । प्रथम पुरुष ऊपर उजियारी ॥ दूसर सत्य गुरु नाम जो भावा । तीसर लक्ष्मी लै घर आवा ॥ चौथे जन्म मरण नहिं होई । जो चरणामृत पावै कोई ॥
साखी—कालफाँस नहिं आवही, तन्त्र मंत्र क्षयमान ।
वचन कबीर गुसाँइको, संत्य हि शब्द प्रमान ॥
मंत्रसम्पूर्ण
धर्मदास वचन
चरण टेक कर विनती लाई । कीन्ह कृतार्थ मोकहँ आई ॥
( १०४ )
बोधसागर
सब विधि धर्मदास पर दाय। मुक्ति मुक्ति गुरु सबै बताया ॥ साहिब कहिये शब्द उचारी । जौन शब्द मुखधोय निहारी ॥ सोइ शब्द गुरु कहो बखानी । जाते जरै कालकी खानी ॥
साखी--काल जरै कंटक जरै, राखौ चितमें नाम । मनसा वाचा कर्मणा, जाय हंस निज धाम ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास यह शब्द उचारी । याही शब्दसों हंस उबारी ॥ काल जँजाल मिटत है जबही । शब्द लेय मुख धोवै तबही ॥ काया शुद्ध होइ निज वारा । मुख धोवै मोहे संसारा ॥ दिन दिन मुख उज्ज्वलतेहिकेरा । रविसमान मुख होय उजैरा ॥ अब मैं शब्द कहत मुख बानी । धर्मदास लीजे पहिचानी ॥
स्मरण
सिंधलद्रीप हंस कहां रहियऊ । पहले पार कबीर कहियऊ ॥ बसले पानी मुख धोय । चंदन काटिके धोय मुख ॥ सुरति करहि अस्नान।तेतिसकोटि सुरदेवता लखे अभ्यंतरधरिध्यान मुख धोवे मनमोही । औ देह नहि जान ॥ मनमें ध्यान कबीर कहिये । रखे चित्त पहिचान ॥ मोरे माथे मन वसे । अवरहुँ मदिल कोइ ॥ सिंधलद्रीप दिग वैठके । कबहुँ न जाय विगोइ ॥
साखी--ज्ञानस्थितिके यह गुण, मुख धोवे सुर ज्ञान । कहे कबीर विचारिके, हंस होहि निर्बान ॥
चौपाई
धर्मदास यह धर्म अपारा । जासों होत दिगंबर भारा ॥ दिगंबर देह होत जब भाई । स्नान शब्द जब गुरुसों पाई ॥ यही शब्द धुंधलको दीन्हा । धुंधल राव मानि शिर लीन्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०६ )
मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥ स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥ यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥ जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥ लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥ जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥ कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥ नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥
स्मरण
साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।
काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥
पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥ सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥ पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥ याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥ धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥
स्मरण सम्पूर्ण
आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥ मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥ मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥ मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥ कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥ मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥ चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥ सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥
( १०६ )
बोधसागर
तन मन शीस न्योछावर डारै । तब गुरु शिष्य हृदय संचारै ॥ रंचक कपट हियेमहैं राखे । गुरुसनेह रस कैसे चाखे ॥ मुखसे बातें मीठी करहीं । अर्थद्रव्य मन कृत्रिम धरहीं ॥ गुरुलोभी शिष्यलालचि जानी । परमारथ नहीं पहिचानी ॥ कैसे ताकर होय उबारा । बूढ़हि भवसागरकी धारा ॥
साखी-युक्ति मुक्तिकी को कहे, नरकहु नहीं ठोर । पिशाचरूप भरमत फिरै, बाँधे यमकी पोर ॥
चौपाई
धन्य भाग्य तुम हमको चीन्हा । तन मन धन न्यौछावर कीन्हा ॥ यहि कारण मैं कीन्हो नेहा । मूलशब्दसों करहु सनेहा ॥
साखी-कहियत वचन विचारिके, तुम सुनियो चितलाय ॥ धीरज दृढता ठानिके, अमृत पिये अघाय ॥
चौपाई
जब प्रभु हते मूल अस्थाना । हंस सुजन जन नहिं उत्पाना ॥ सो निज ठांम लखावों तोही । धर्मदास जो पूछै मोही ॥ तब ना हतो अग्रको मूला । तब ना हतो विदेह स्थूला ॥ तब नहिं हंस सुजन जनकीन्हों । तब यह हंस बास कहाँ लीन्हों ॥ तब साहब समसर उपराजा । समसर अग्र कीन्ह सबसाजा ॥ दश ग्यारह नहीं ब्रह्मंडा । तब नहिं हते लोक अरु अंडा ॥ तब नहिं अमी अमी रस छंदा । तब नहिं दिवस रैन अरु चंदा ॥ सो अब कहौं मूल नहिं कन्दा । मूल विदेह नाम आनन्दा ॥ कहेउ भेद लहेउ निज नामा । जासों पूरण है सब कामा ॥ जैसे जलमें दिनकर ज्योती । यों घट भीतर लखिये मोती ॥ धर्म नाम असंभव नाऊं । निरालम्ब अग्रिम है गाऊं ॥ निरालंब आलंब ठिकाना । याविधि साहबको पहिचाना ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०७ )
सोमैं देखि तोहि समझाऊँ । यह तुम राखो हिय छिपाऊँ ॥ वह प्रभु निरालंब बतलाई । नाम प्रभाव पुरुष लखिपाई ॥ सार नाम जिन हिये समोई । काल जाल सब जाय बिगोई॥ निरालंब है अधर अकाशा । पृथ्वी पवनहि माँहि निवासा॥
सारखी-निरालंबहि प्रभाव यह, सकल सृष्टि बिन नाम ।
अजर अमर विनसे नहि, बिन थूनी बिन धाम ॥
चौपाई
सो विधि ताको मैं समुझाई । अविनाशी या विधि प्रगटाई ॥ बिना तत्त्व तत्त्व जो भयऊ । बिना प्रतीति भेद किमि लहेऊ॥ करि प्रतीति तजि अन्य उपाई । आनंद गांव अनंद कराई ॥ तब हंसा आनंद हो जाई । आनन्द शब्द हृदयलों लाई ॥ जीवतही नर मुक्ति होई । अक्षर गहि निर अक्षर होई ॥ येहि प्रताप अग्रको लहिए । स्थूल विदेह वाहिमो कहिए ॥ निरालम्बसो सो भए अलंबा । शब्द सरूप सृष्टि सब थंभा ॥
सारखी-निरालंबके खोजमें, सब जग परो लुभाइ ।
जब सतगुरु दाय़ा करै, तबही परै लखाइ ॥
चौपाई
धर्मदास जो विनती करही । चरणि पकरि शिर ऊपर धरही॥ तुम समर्थ मैं दास तुम्हारा । चरण प्रसाद भयो बिस्तारा ॥ एक विवेक कही समुझाई । वचन सुधा सुनि तृषा बुझाई॥ अब साहिब कहिये व्यवहारा । मृतक जीव गुरुड संचारा ॥ जेहि विधि जीवहिगुरुडजियावा । सोई भेद गुरु मोहि बतावा ॥ मूलशब्द अक्षर पहिचानी । अगमहि नाम अकाशे जानी ॥ सो कहिए प्रभु भेद बखानी । बाल जिवाइ गुरुड नहि आनी॥
( १०८ )
बोधसागर
सद्गुरु वचन
धर्मदास बूझा व्यवहारा । यहै भेद अति कठिन अपारा ॥ योगी जंगम रहे लखाई । याहि भेदको अंत न पाई ॥ कलियुग महमदको अवतारा । तिनसो होय म्लेच्छ अपारा ॥ वेद अथर्वनको मत लावहिं । मानस मारिसाख बतलावहिं ॥ पीर पैगम्बर अजमत धारी । जीव दया नहिं कीन्ह विचारी ॥ अनकठ वचन कहे दिन राता । माता पिता पूछे नहिं बाता ॥ येहि वचन सुनि हृदय लगावो । समझि बूझिके गुप्त छिपावो ॥ आपा माडि थाप सब कीन्हा । आतम संधि कृष्णकहि दीन्हा ॥ अंबुजते अमृतहो आवा । अंबुजते जल पृथ्वी ठावा ॥
सारखी—कहै कबीर विचारिके, धर्मदास सुनि लेव । दृढ़ हो अमृत पीजियो, सब जीवन कहि देव ॥
स्मरण
ॐअकार न्याव सों सारा । अजब अतीत अचिन्त व्यवहारा ॥ अजर अहार अती है उज्ज्वल । स्थित उत्पन्न वही है निर्मल ॥ अर्थ ऊर्ध्व याहिमें सही । बर्कत फर्क याहिमें कही ॥ भयो अलखते सब संसारा । लयो अर्थ ऊर्ध्व पर भारा ॥
सारखी—अर्थ ऊर्ध्व आलेख सब, मैं मैं रहैं समाय । कहै कबीर धर्मदाससों, सोहि रहे घर आय ॥
बोल अडोल आप जो कहेऊ । दीप अदीप एक नहिं रहेऊ ॥ अष्ट मुष्टि कहि पंच प्रभाऊ । ये सब वाहीसो होइ आऊ ॥ कस नहिं जीव मुक्तिको लहेऊ । एक घरीक जो बोल कहेऊ ॥ करि प्रणाम देहमें आवा । अजर अमर अटल घर पावा ॥ पुरुष संयोग जो सेय बिछावा । अर्थ ऊर्ध्व ऊपर सच पावा ॥ रसना पाय अमृत जब चापे । तब उठि जीव वचन मुख भापे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०९ )
साखी—यह गुन ज्ञानस्थितिके, जीव जीव तन आव ॥ कहे कबीर धर्मदास सों, अर्ध ऊर्ध्व संभाय ॥
सम्पूर्ण स्मरण—चौपाई
भाषों जो प्रभु अमृत कीन्हैं । जेहि विधि अमृत सिरजेलीन्हैं॥ धर्मदास यह कहों बुझाई । जेहि विधि अमृत कीन्ह बनाई॥ आपहि आप अधर जो आवा । अमृत वही कर्म जो पावा ॥ कर्म जाय रीति जेहि बैठ। धर्म सहितसों कीन्हों पैठा ॥ सहज निरंजन भेद बतावा । भाषो भेद बरण सब पावा ॥ धर्मराय कूर्महिपर आए । कूर्मनाथ जहाँ अग्र रहाए ॥ मस्तक काटिय पेट विदारा । कूर्म दुखित भए शक्ति निसारा ॥ प्रकट समुद्र तभीसों भयऊ । जबही पेट विदारि लयेऊ ॥ अमृत धर्मराय कछु पावा । कछु गिरपरा समुद्र समावा ॥ अमृत विष्णु तबही जो लीन्हा । जबही मथन समुद्रहि कीन्हा ॥ अमृत तबहि निरंजन पावा । सोई अग्र सुकृतहि समावा ॥ धर्मशील काट्यो है तबही । विषम सरोवर उपजो जबही ॥ धर्मराय अमृत जो पावा । तेहि कारणसों अलख कहावा ॥ अग्र शीश कूर्मके पाई । ब्रह्मा विष्णु तबै उपजाई ॥ जीव जंतु पृथ्वी उपजावा । यह बल विष्णु राजसों पावा ॥ इंद्र जाय तब सेवा करहीं । भांति भांतिके सुख अनुसरहीं॥ तृप्त कीन्ह देवन सब अंगा । विष्णु दया कीन्ही परसंगा ॥
साखी—सूक्ष्म इंद्र दया करी, इंद्र साजि विस्तार ।
ब्रह्मा विष्णु महेश मिलि, कीन्हों सकल पसार ॥
चौपाई
धर्मदास जो बिनती लावा । गुरुड़ अमृत केहि कारण पावा ॥
सतगुरु वचन
पूर्व कथा अब कहों बखानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥
( ११० )
बोधसागर
नागहि लोक इंद्र जो गयऊ । सुधा हेतु कारज तेहि ठयऊ ॥ डारेउ नाग फाँसते तबहीं । कौन छुड़ावे याते अबहीं ॥ नागदेवके मात रहीया । गरुड मातसोंहीं छल करिया ॥ माथे लीन्ह गरुड़की जीती । छलसों भई दयाकी रीती ॥ गरुड़ मात कहि वचन सुनाई । दासी भाव कहां तुम पाई ॥ तब उठि माता वचन उचारा । सुनो पुत्र एक भेद हमारा ॥ नाग मात मोहि वचन हरावा । यातें दासी भाव रहावा ॥ पीतबरण शशि हम कहि सोई । श्याम बरण उन करो विलोई ॥ यह छल जानि परा नहीं मोही । सुनो तात समुझावों तोही ॥ कोपि गरुड तब गये पताला । नागलोक जहाँ विषकी ज्वाला ॥ देखत गरुड नाग सब भागे । मातासो छल कीन्ह अभागे ॥ माँगो सो हम तुम कह देही । हम कहैं त्रास देव जिन एही ॥ गरुड अहिन तब वचन उचारा । अमृतकुण्ड देव सब धारा ॥ नाग आइ तब कीन्ह निहोरी । गरुड इंद्रकी बंधन छोरी ॥ अमृत लेइ दर्शनको गयऊ । नाग गरुड पहुँचावत भयऊ ॥ गरुड मात नाग जब देखा । दासहि भाव तजब तुम रेखा ॥ अमृत पाइ गरुड बरियाना । तब छल इंद्र गरुसों ठाना ॥ गरुड महाबल सुख लहलीन्हां । बोई बंबूर अमृत किमि चीन्हां ॥ ज्यों मलयागिरि निकट रहावा । तास्वरूप काहू नहीं पावा ॥ कूर्म उदरसे सो चलि आवा । सुधा समुद्र मथे तब पावा ॥ गुरु द्रोहसों जन्म बिगोई । नाम पाइ अस्थिर नहीं होई ॥ चंचरीक चंचल है बहई । मलयागिरिकी सुगँध न लहई ॥ मलयागिरिको यहि प्रकाशू । विष नहीं बेधे वास सुबासू ॥
साखी—मलयागिरिके वाससे, सब दुम होइ सुवास ।
बासन कबहुँ बेधही, सदा रहत है पास ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १११ )
तबहि सुकृत बिनवे करजोरी । कृपासिंधु सुनि बिनती मोरी ॥ प्रथम तत्त्व प्रभु भाषव तुमहीं । सो सब बूझ पुरैगी हमहीं ॥ पाँच प्रगट गुप्त हैं पाचा । प्रगट समझि लीन्हें हम साँचा ॥ पाँच गुप्तको कहिये लेखा । पाँच प्रगट ये सब हम देखा ॥ पृथ्वि तेज जल पवन अकाशा । सो प्रभु मोहि कहो परकाशा ॥ जिहिं विधि ए प्रभु प्रगटे आई । सो प्रभु भाव कहेउ समझाई ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम जो कछु बूझा । सो सब भिन्न २ हम सूझा ॥ पृथ्वी रही गुप्तके नेहा । बहुरि प्रकट हुये शब्द सनेहा ॥ पृथ्वी अंग वैराटहि जानी । पाँव पताल शीस अनुमानी ॥ इच्छा सुरति शक्ति उपजाई । वैराट रूपमें जाय मिलाई ॥ अलख निरंजन यासों कहिये । यहीरूयाल अविगतको लहिये ॥ मन माया जब एके भयऊ । सकल सृष्टि उत्पन्नै लयऊ ॥
साखी-जब दोई एके भये, भयो लीन मन ठौर ।
नाभिकमल ब्रह्मा भए, सब रचनाको मौर ॥
चौपाई
धर्मदास अब कहों बखानी । तुम हिरदै कीजो बिलछानी ॥ पाँच तत्त्व जे गुप्त रहावा । सो सब भेद तोहि समझावा ॥ पाँचहि अमी पुरुषने कीन्हों । पाँच तत्त्व ताही सो चीन्हों ॥ अचल अमी जो अकाश बखानी । शब्द अमी वायु उत्पानी ॥ अजर अमी सो तेज पसारा । अकह अमी जलतत्त्व सम्हारा ॥ रंग अमी सो पृथ्वी भयऊ । रचना सब याही पय ठयऊ ॥ पाँचों अमृत तहँवा छाजै । पाँचतत्त्व तासों उपराजै ॥ पाँच तत्त्व सों देह सँवारी । तीनों गुण तामें अनुसारी ॥
( ११२ )
बोधसागर
देही गति काहू नहिं पावा । देह धरै यम काम सतावा ॥ आतमरूप रंग जिन जाना । प्रफुलित होय कमल विकसाना ॥ हर्षित भयउ बुन्द जो ठारा । परै अगाध सिंधु मझधारा ॥ परतहि बुंद रंग सब छाजा । जलतरंग जल रंग विराजा ॥
सारखी—यह गुण ज्ञानस्थितिहिके, जलतरंग उपजाइ ।
जलसों सब जग ऊपजो, जलधौं कहा समाइ ॥
चौपाई
नाम तत्त्वजल तत्त्वहि कीन्हा । अस्तुति जलहि रंगकर लीन्हा ॥ जल ऊपरहि कूर्म उपराजा । कूर्मपीठि वाराह विराजा ॥ पीठ वराह शेष जो रहई । शेषहि फनपर पृथ्वी धरई ॥ कूर्म सुरति पुरुषकी अहई । उनको अंश कूर्म इह लहई ॥ महापुरुष आसन जहाँ आई । स्वासा शब्द पुरुष उपजाई ॥ बहुरि तेज पुरुष परकाशा । सुरके घर हो तेज निवासा ॥ आनंद रूप लोचन जब कहे । तेज हर्षपर घट हो चहे ॥ हरष तेज सूर्य उतपानी । सो सब जगमें कीन्ह पयानी ॥ तेज अंग सूर्य कर रूपा । शीतलता शशिके रसरूपा ॥ या विधि दो अंश उतपानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥ अंग सूर्य शशि लयो बनाई । तेज हर्ष गुण उभय बताई ॥
सारखी—कूर्म उदरसों प्रगट है, रहे जगतमें छाय ।
बिन सतगुरु नहिं पावही, कहे कबीर समझाय ॥
चौपाई
जो अज्ञान ज्ञान नहिं जाना । तासों भेद न कहब सुजाना ॥ बहे बाये मन थिर नहिं जेही । सार शब्द कहा करै सनेही ॥ स्वासासार पुरुष उपजाई । सुरहो थासहि समसर छाई ॥ समसर भेद जानि नहिं कोई । अग्र थास तेहि कहिए सोई ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११३ )
वहे गुप्त यह प्रकट बताई । यामें फर्क न जानहु भाई ॥ समसर पवन है सकल सुगंधा । ता बिन जगत आय सब धंधा ॥ गंध विगंध रची यह देही । समसर पवन सुगंध सनेही ॥ समसर अंग अग्रको आहे । समसर गहे पुरुषको लाहै ॥ अग्ररंग बाँए उपराजा । उनसों होत रंगको साजा ॥ रंग रेख सब उनसों होई । मृतकर रंग डार उन खोई ॥ रंग बाँएसे हरियल कीन्ह । हरियल रंग जात सब लीन्ह ॥ जीव जन्तु औ कीट पतङ्गा । दुम औ बेली सबके सङ्ग ॥ घास पात जिव सकल बिहङ्ग । हरियल राखो सबके अङ्ग ॥
सारखी-यह नहिं होतो जगतमें, मरत सकल कुम्हलाय ।
ज्ञानहि अस्थित पुरुषकी, कहै कबीर समुझाय ॥
चौपाई
एहि वायु हरियर जो कही । हरियर वायु तुहांसों सही ॥ अकाशमंदिरमें कीन्ह निवासा । जेहि मंडलते उपजी खासा ॥ याविधि उपजन भौ सब ठौरा । संसारी भेद कहां कहु औरा ॥ कालफंद फाँसी बड़ डारी । तासों परै न वस्तु विचारी ॥ जब स्वासा साहँहि उठाई । मूल दीक्षा प्रथम कहाई ॥ जब बालकको दीक्षा दीजे । बीरा देकर अस्थित कीजे ॥ सार नाम तब देव लखाई । जरा मरण सुस्थित घरपाई ॥ जो निज करै नाममें बासा । जासो स्वासा नाम प्रकाशा ॥ बिना नाम कालकी फाँसी । दीक्षा मूल यही परकाशी ॥
सारखी-मूल दीक्षा संग इह, लेहु संत चित लाय ।
धन्य भाग्य वा हंसके, नाम संधि जो पाय ॥
बिना शब्द संधी बिना, काहु न पाई बास ।
संधि नाम हंसा गहै, करै काल नहिं त्रास ॥
( ११४ )
बोधसागर
सत्य सुकृतकी रहनि रहि, गंह अर्जमन नाम । कहै कबीर धर्मदाससों, सत्य शब्द परमान ॥ सत्य सुकृत लों मेंड़ है, ग्यान ध्यान धर धीर । शब्द अजानन है वही, सोई संत कबीर ॥ अजर अमर वह पुरुष है, सत्यनाम बैधि छोर । कहे कबीर धर्मदाससों, थाह शब्द शिरमोर ॥
चौपाई
अब मैं कहौ अकाश बिचारा । जिहिबिधि भयव तासु विस्तारा ॥ अकाश अंड मध्य जो रहेऊ । अकाश भेद बिरले जन रहेऊ ॥ अकाश अंग सो सब निर्मावा । शून्य मंदिरतें नाभी आवा ॥ पृथिव अकाश योग अब कीन्हौ । शब्द हेतु काहु बिरले चीन्हा ॥ तालमृदंग अकाशते होई । रहित शब्द पुनि सुनी समोई ॥ अकाशबीच असहोय गुजारा । बिना मृदंग शब्द झनकारा ॥ अकाश पेट अकाशहि चीन्हा । सुरति सुनी आकाशहि दीन्हा ॥
सखी—कहै कबीर अकाशगुण, बूझत बिरला कोय । लीलारंग अकाशका, सुनिनो सत्य बिलोय ॥
चौपाई
जो मंदिर अकाश नहि देखे । तबलगि शब्द रहत अनपेखे ॥ पाँच अकाश तबै लखिपाई । जबै मंत्र गायत्री आई ॥
सारखी—भेदाकाश गुण अधरहै, ज्यों लखि पावै कोइ ॥ नहिं अक्षर लखि आवही; पहुँचे निज सोइ ॥
मंत्र गायत्री
धर्मदास विनवे करजोरी । भाषों शब्द गायत्री डोरी ॥ भेद गायत्री बालकको दीजे । प्रेम सुफल बालकको कीजे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११५ )
यापर कीरत कैसे जाई । प्रकृति अंग मायाको भाई ॥ माया अंग अष्टांगी कीन्हौं । अष्टांगी गायत्री चीन्हौं ॥ यह शब्द हम कहो बुझाई । लीजो संतो शिरहिं चढ़ाई ॥ बारा योजन बुड़े जाइत्री । पल पल छूटे इहीठों गायत्री ॥ भ्रमनाको आगो यह टूटे । ब्रह्म कथौ हिरदय रस लूटे ॥ जार बार कालहिकर छीरा । करकर निर्मल अंग शरीरा ॥ बास अमरपुर शब्द संधाना । कहै कबीर काल पछिताना ॥
सम्पूर्ण
न्यास
रक्षा प्रथम न्यास जो करई । सुर गंधर्व न्याससों डरई ॥ कालजाल निज बंदन होई । निर्मल रहै काल कहैं खोई ॥ भूतहि प्रेत वीर वेताला । वायु बतास और सैताला ॥ साठ तीनसौ ऊखत कहिये । हगन्यास कर एक न रहिये ॥
साखी—यह गुन हग अन्यासके, कहै कबीर बखानि ॥ प्रथम रक्ष या कह पढे, बढ़ि हितचित्त पहिचानि ॥
चौपाई
दुष्टनको बंधन है येही । हंस मुक्त मन मुक्ति सनेही ॥ हगन्यास प्रथम जो पढ़ई । तब रक्षा मन शब्दहि दृढ़ई ॥ हगन्यास बालकको चाही । संशै अंश रहित हो ताही ॥ यही शब्द मैं कहों बखानी । यही भेद बिरले पहिचानी ॥
साखी—उत्तम मध्यम अधम जो, सबहि करै निर्वाह ॥ हगन्यासके यह गुण, कुशल क्षेम प्रवाह ॥
धर्मदान वचन
धर्मदास बिनती उठि कीन्हा । पुरुषहि भेदसकल हम चीन्हा ॥ निश दिन चरण चित्त तव धरहूँ । अन्य उपाय सबै परिहरहूँ ॥
( ११६ )
बोधसागर
येहि वचन प्रभु कहो बुझाई । जाते काल दंड दुख जाई ॥ इंडुमती कह काल सतावा । रहि सचेत शब्द लखि पावा ॥ सो मोहि भेद बतावहु स्वामी । करहु कृपा गुरु अन्तयार्मी ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल पूछन कीन्हौ । सो अब भेद तोहिकहि दीन्हौ ॥ रानी काल कीन्ह जब त्रासा । तब हम शब्द कीन्ह परकाशा ॥ साधु संत सेवा चित धरहीं । भक्ति प्रेमबहु बिधि सों करहीं ॥ हमहिं छोड़ि नहि जाने दूजा । कुलकरनीकीं छोड़े पूजा ॥ तजि कुल करनि अमरपदपावा । येही सात नाम चित लावा ॥ तोसों शब्द विरहुली भाखी । तव कारण हिरदेमें राखी ॥ येही शब्द लेहु शिर मानी । मनसा वाचा निश्चय जानी ॥
विरहुली
आदि अन्त तब न हते विरहुली । भूमि अकाशहु न हते विरहुली ॥ तब विष नहि अवतार विरहुली । विषकीकयारितुमबाहिबिरहुली ॥ बिषका कीन्ह अहार विरहुली । सवा लक्ष पर्वत थे विरहुली ॥ तहाँ विषको अवतार विरहुली । गड़िगड़िशंकर बोह विरहुली ॥ पर्वति डारेउ पानि विरहुली । सोविष संतहि खाइ विरहुली ॥ विष माटि होय जाय विरहुली । मउरी संसय करिय विरहुली ॥ आफूयों हरतार विरहुली । सबसों शब्द निरंत विरहुली ॥ भागु विषपैठि पताल विरहुली । बनहि कंदविषविकल विरहुली ॥ पोस्त धतूरा भाँग विरहुली । गुरु वचन धरि बाँध विरहुली ॥ विष न संचरे अंग विरहुली । उदमदविष मदराज विरहुली ॥ यह विष बिरलैसम्हारबिरहुली । जब नहि स्वर्ग पताल विरहुली ॥ तबविष नहि अवतारबिरहुली । दूत भूत सब भगे विरहुली ॥ जहाँ बसे साधू संग विरहुली । भोगा कीयो तैं कहां विरहुली ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११७ )
कहाँ ये डसवत आये बिरहुली । सास्वी नामकी चले बिरहुली ॥ सब दुख तुरत नशाये बिरहुली । नामकी कहाउतपाति बिरहुली॥ सबहि तुच्छ कह जाय बिरहुली । वचनादिके अकार बिरहुली ॥ मन विष दूर पराय बिरहुली । तनसों दूर है जाय बिरहुली ॥ शब्दमुनत विष जाय बिरहुली । हरि प्रकटै संसार बिरहुली ॥ साहिब कीयो संसार बिरहुली । दूत भूत सब हारि बिरहुली ॥ पहुँचे सत्य कबीर बिरहुली । भई यम जिय पीर बिरहुली ॥ इन तन विषन समाय बिरहुली । उत्तर रानी पाय बिरहुली ॥ उठिके आसन दीन्ह बिरहुली । विरहुली दुःख नशाय बिरहुली॥ वार वार शिरनाय बिरहुली । कबीर गुण गाय बिरहुली ॥
बिरहुली संपूर्ण
धर्मदास वचन
धर्मदास फिर विनती करहीं । सतगुरु चरण शीश पर धरहीं॥ अब प्रभु कहिए लोक सुरूपा । दीन दयाल कृपाल अन्नापा ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास मैं कहाँ बुझाई । विना भेद लोके नहीं जाई ॥ अंधी सुरति शब्द बिन जानौ । लोक दीप कैसे पहिचानौ ॥ शब्द पाय जब सुस्थिर होई । थान मुकाम लखै पुनि सोई ॥ जो लखि पावै थान मुकामा । सुरति चले तब पावै नामा ॥ विना नाम नहीं ठौर ठिकाना । अंध सुरति हो रहे ठगाना ॥ सोहंगत सब छहौं बखानी । एक चित्त है गहे जु प्रानी ॥ पुहुप दीप सब दीप निवासा । छब्बिस दीप रचौ तेहि पासां ॥ कंचन दीप पाहु पर सोहै । रत्न अन्नाप कोटि रवि मोहै ॥ तहां पुरुष पर कीर्ति विराजै । उत्पति प्रलय तेहिपर छाजै ॥ लीलगर दीप पुरुषको वासा । जहां पहुँचे न कालकी त्रासा ॥
( ११८ )
बोधसागर
कालहि गमी वहाँ नहिं आवै । सहज पुरुष जहाँ बैठि रहावै ॥ विनती सहज कीन्ह कर जोरी । जीवन बंध वेगि प्रभु छोरी ॥ बीज शब्दमें सोहं वीरा । यह उत्पति गुरु कहै कबीरा ॥ यहाँ गमी कोऊ नहिं पावै । जहाँ लीलगर द्रौप रहावै ॥ तहाँ सुजन जन बैठे ज्ञानी । सत्य सुकृत दोई अगवानी ॥ अब मैं कहौं दीपकर लेखा । जाविधि रचिव रंग औ रेखा ॥ बीज शब्दमें सोहं बीरा । ये उत्पन्न सुन धरौं शरीरा ॥ जगमगज्योति सदा उजियारा । शब्दरूप काया कर प्यारा ॥ शब्दहि हेत वचन है वोटा । रत्न शिला चहुँ दिशि है कोटा ॥ लोक नाम है लोक अनन्दा । उडगन महाँ सोहत जस चन्दा ॥ आस पास कंचनकी बारी । हीरा लाल रत्न अवतारी ॥ कहा कहीं मंदिर कर रेखा । खम्भा कंचनके आहि विशेषा ॥ सिंहासन अति तहाँ विराजै । कंचन जडित लाल बहु छाजै ॥ लगै कोटि वहुँ दिश रूपा । चन्द्र प्रकाश ही जान स्वरूपा ॥ तेतिस कोटि सूर्यकी पांती । बीच बीच देखो अस क्रांती ॥ तापर सोहत अधर अटारी । हीरा मोती बहुत सँवारी ॥ ता ऊपर शोभित कस रेखा । कोटि रत्न दमकत जनु लेखा ॥ मोतिक चौक पूर जनु डारी । शोभित चौक कलित विस्तारी ॥ ता ऊपर जु रंग अस सोहै । मानहु रत्न मणी मय होवै ॥ जगर मगर सोहै उजियारी । उपमा बरण सके को प्यारी ॥ बहुत हि उपमा को कह दीजे । कोटिन भाग सूर्य शशि कीजे ॥ पालँगरूप काकहिके बखानी । हीरा रतन बीच बिच खानी ॥ सेजरूप शोभित शशि खानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥ चन्द्र सूर्य नाहीं वह तारा । नाहिं रत्न कञ्चन महि भारा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके यह गुण, पुरुष रूप उजियार । पलमें इच्छाते भए, लोक दीप विस्तार ॥