भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1250, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1250

( ११० )

बोधसागर

नागहि लोक इंद्र जो गयऊ । सुधा हेतु कारज तेहि ठयऊ ॥ डारेउ नाग फाँसते तबहीं । कौन छुड़ावे याते अबहीं ॥ नागदेवके मात रहीया । गरुड मातसोंहीं छल करिया ॥ माथे लीन्ह गरुड़की जीती । छलसों भई दयाकी रीती ॥ गरुड़ मात कहि वचन सुनाई । दासी भाव कहां तुम पाई ॥ तब उठि माता वचन उचारा । सुनो पुत्र एक भेद हमारा ॥ नाग मात मोहि वचन हरावा । यातें दासी भाव रहावा ॥ पीतबरण शशि हम कहि सोई । श्याम बरण उन करो विलोई ॥ यह छल जानि परा नहीं मोही । सुनो तात समुझावों तोही ॥ कोपि गरुड तब गये पताला । नागलोक जहाँ विषकी ज्वाला ॥ देखत गरुड नाग सब भागे । मातासो छल कीन्ह अभागे ॥ माँगो सो हम तुम कह देही । हम कहैं त्रास देव जिन एही ॥ गरुड अहिन तब वचन उचारा । अमृतकुण्ड देव सब धारा ॥ नाग आइ तब कीन्ह निहोरी । गरुड इंद्रकी बंधन छोरी ॥ अमृत लेइ दर्शनको गयऊ । नाग गरुड पहुँचावत भयऊ ॥ गरुड मात नाग जब देखा । दासहि भाव तजब तुम रेखा ॥ अमृत पाइ गरुड बरियाना । तब छल इंद्र गरुसों ठाना ॥ गरुड महाबल सुख लहलीन्हां । बोई बंबूर अमृत किमि चीन्हां ॥ ज्यों मलयागिरि निकट रहावा । तास्वरूप काहू नहीं पावा ॥ कूर्म उदरसे सो चलि आवा । सुधा समुद्र मथे तब पावा ॥ गुरु द्रोहसों जन्म बिगोई । नाम पाइ अस्थिर नहीं होई ॥ चंचरीक चंचल है बहई । मलयागिरिकी सुगँध न लहई ॥ मलयागिरिको यहि प्रकाशू । विष नहीं बेधे वास सुबासू ॥

साखी—मलयागिरिके वाससे, सब दुम होइ सुवास ।

बासन कबहुँ बेधही, सदा रहत है पास ॥