भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( १११ )

तबहि सुकृत बिनवे करजोरी । कृपासिंधु सुनि बिनती मोरी ॥ प्रथम तत्त्व प्रभु भाषव तुमहीं । सो सब बूझ पुरैगी हमहीं ॥ पाँच प्रगट गुप्त हैं पाचा । प्रगट समझि लीन्हें हम साँचा ॥ पाँच गुप्तको कहिये लेखा । पाँच प्रगट ये सब हम देखा ॥ पृथ्वि तेज जल पवन अकाशा । सो प्रभु मोहि कहो परकाशा ॥ जिहिं विधि ए प्रभु प्रगटे आई । सो प्रभु भाव कहेउ समझाई ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम जो कछु बूझा । सो सब भिन्न २ हम सूझा ॥ पृथ्वी रही गुप्तके नेहा । बहुरि प्रकट हुये शब्द सनेहा ॥ पृथ्वी अंग वैराटहि जानी । पाँव पताल शीस अनुमानी ॥ इच्छा सुरति शक्ति उपजाई । वैराट रूपमें जाय मिलाई ॥ अलख निरंजन यासों कहिये । यहीरूयाल अविगतको लहिये ॥ मन माया जब एके भयऊ । सकल सृष्टि उत्पन्नै लयऊ ॥

साखी-जब दोई एके भये, भयो लीन मन ठौर ।

नाभिकमल ब्रह्मा भए, सब रचनाको मौर ॥

चौपाई

धर्मदास अब कहों बखानी । तुम हिरदै कीजो बिलछानी ॥ पाँच तत्त्व जे गुप्त रहावा । सो सब भेद तोहि समझावा ॥ पाँचहि अमी पुरुषने कीन्हों । पाँच तत्त्व ताही सो चीन्हों ॥ अचल अमी जो अकाश बखानी । शब्द अमी वायु उत्पानी ॥ अजर अमी सो तेज पसारा । अकह अमी जलतत्त्व सम्हारा ॥ रंग अमी सो पृथ्वी भयऊ । रचना सब याही पय ठयऊ ॥ पाँचों अमृत तहँवा छाजै । पाँचतत्त्व तासों उपराजै ॥ पाँच तत्त्व सों देह सँवारी । तीनों गुण तामें अनुसारी ॥