भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ११२ )

बोधसागर

देही गति काहू नहिं पावा । देह धरै यम काम सतावा ॥ आतमरूप रंग जिन जाना । प्रफुलित होय कमल विकसाना ॥ हर्षित भयउ बुन्द जो ठारा । परै अगाध सिंधु मझधारा ॥ परतहि बुंद रंग सब छाजा । जलतरंग जल रंग विराजा ॥

सारखी—यह गुण ज्ञानस्थितिहिके, जलतरंग उपजाइ ।

जलसों सब जग ऊपजो, जलधौं कहा समाइ ॥

चौपाई

नाम तत्त्वजल तत्त्वहि कीन्हा । अस्तुति जलहि रंगकर लीन्हा ॥ जल ऊपरहि कूर्म उपराजा । कूर्मपीठि वाराह विराजा ॥ पीठ वराह शेष जो रहई । शेषहि फनपर पृथ्वी धरई ॥ कूर्म सुरति पुरुषकी अहई । उनको अंश कूर्म इह लहई ॥ महापुरुष आसन जहाँ आई । स्वासा शब्द पुरुष उपजाई ॥ बहुरि तेज पुरुष परकाशा । सुरके घर हो तेज निवासा ॥ आनंद रूप लोचन जब कहे । तेज हर्षपर घट हो चहे ॥ हरष तेज सूर्य उतपानी । सो सब जगमें कीन्ह पयानी ॥ तेज अंग सूर्य कर रूपा । शीतलता शशिके रसरूपा ॥ या विधि दो अंश उतपानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥ अंग सूर्य शशि लयो बनाई । तेज हर्ष गुण उभय बताई ॥

सारखी—कूर्म उदरसों प्रगट है, रहे जगतमें छाय ।

बिन सतगुरु नहिं पावही, कहे कबीर समझाय ॥

चौपाई

जो अज्ञान ज्ञान नहिं जाना । तासों भेद न कहब सुजाना ॥ बहे बाये मन थिर नहिं जेही । सार शब्द कहा करै सनेही ॥ स्वासासार पुरुष उपजाई । सुरहो थासहि समसर छाई ॥ समसर भेद जानि नहिं कोई । अग्र थास तेहि कहिए सोई ॥