कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबोध
( १०३ )
जबसे दीन्ह मुक्तिकर बीरा । तीन ताप मिटि गई अधीरा ॥ साहब कहिये शब्द अनन्दा । जाते यमकर छूटै फन्दा ॥ चरणामृत कैसे कर लीजे । तौन शब्द मोसों कहि दीजे ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहों विचारी । चरणामृत शब्दहि निरवारी ॥ यहि पाये निज करहि अहारा । जासों यमकी छूटै धारा ॥ प्रथम भोर मुख उठिके धोवे । काल कष्ट यमद्वार बिगोवे ॥ फेर करहिं शब्दको आशाना । वही शब्दसो मुक्ति निदाना ॥ बहुरि हिये महाँ नामहि आने । नाम विदेह दरश पहिचाने ॥ नाम विदेही कठिन अपारा । ताहि चीन्हि कर करहुँ अहारा ॥ ध्यान बीज गुरुचित महाँ आने । सुरति निरति पुरुषहि पहिचाने ॥ बहुरि शब्द आनंदित भाषे । मुख महाँ धोइ नाम रस चाखे ॥
साखी—इह गुण ज्ञानस्थितहिके, शब्द भेद निजसार ।
गुरुचरणामृत लेहि तब, होवे हंस उवार ॥
स्मरण
श्वेत मिठाई श्वेतहि पाना । श्वेत शब्द लेखनि परवाना ॥ योग सत्य इन दीन्हो बीरा । मनको उलटि खोज लै हीरा ॥ बीरा खाय भयो मुख भारी । प्रथम पुरुष ऊपर उजियारी ॥ दूसर सत्य गुरु नाम जो भावा । तीसर लक्ष्मी लै घर आवा ॥ चौथे जन्म मरण नहिं होई । जो चरणामृत पावै कोई ॥
साखी—कालफाँस नहिं आवही, तन्त्र मंत्र क्षयमान ।
वचन कबीर गुसाँइको, संत्य हि शब्द प्रमान ॥
मंत्रसम्पूर्ण
धर्मदास वचन
चरण टेक कर विनती लाई । कीन्ह कृतार्थ मोकहँ आई ॥