कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1242, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १०२ )
बोधसागर
गुरु महिमा प्रारम्भः
चौपाई
गुरु होहि वहि ताहि लखावै । गुरु बिन अंत न कोई पावै ॥ जिन गुरुकी कीन्हरी परतीती । एक नामकर भव जल जीती ॥ गुरु पुरुष जिय करहि मराला । गुरु सनेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु प्रगट है गुप्त अधारा ॥ गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थलमहँ कीन निवासा ॥ चंद्र सूर्य गुरु सब संसारा । गुरु गंधर्व गुरु सब व्यवहारा ॥ गुरु ब्रह्मा और विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चराचरहि जहँ लगि सब देखा । गुरु बिना कछू और नहिं पेखा ॥ उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्हे गुरु शरिष्ठा ॥ ये सब जीव गुरुमय जानो । गुरुसे भिन्न अन्य नहिं मानो ॥ कहैं कबीर सो हंस पियारा । येहि भांति गुरु दरश निहारा ॥ साखी-सो गुरु निशिदिन बंदिये, जासों पाये नाम । नाम बिना घट अंध है, ज्यों दीपक बिन धाम ॥
चौपाई
गुरु चरण जे राखे ध्याना । अमर लोक वह करत पयाना ॥ अमर कमल ज्यों रहैं लुभाई । या विधि गुरु चरणन लपटाई ॥ तन मन धन न्योछावर राखे । दर्शहि पशं अमी रस चाखे ॥ चरण धोय चरणामृत पावै । पुरुष समीप पहुँच सो जावै ॥ गुरु बिहून अमृत नहिं दीजै । अमृत छांड़ि विषय रस लीजै ॥
साखी-महा पुरुषको नाम है; जा घट मांहि समाय । सोई सद्गुरु जानिया, अरु कृत्रिम सब पाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाहि बलिहारी ॥