कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1261, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्थितिबाध
( १२१ )
इकोत्तरसे पुरुष तर जाई । इहि विधि रहन गहे चितलाई॥ नारि पराई चित मन देही । जन्म सात कुछी कर लेही ॥ नारि पराई अंग छुवावै । कशमल लगै तत्त्व घटि जावै॥ लाख वर्ष रहैं भूतकी खानी । भुगते नर्क घोर सो प्रानी ॥ बिना शब्द जो भुगवहि नारी । तो सब परै कालकी वारी ॥ बिना शब्द निरञ्जन लीन्हौं । ताते पुरुष माथ पुनि छीन्हौं॥ नर्कहिकी कहा बात जु कहिये । सुर नर सबै काम वश रहिये॥ धर्मदास सुनि लीजे हमसों । उत्पति सकल कही हम तुमसों॥ राजा युग घिर पास मैं गहिऊं । बालकरूप तहां पुनि रहिऊं ॥ घरन कुमार तासकी रानी । प्रीतभाव बहु सेवा ठानी ॥ पुत्र भाव उन हमकह जाना । कपट भाव नहिं तजौं निदाना॥ ज्ञान पुण्य वे बहुतहि करहीं । राज गुमान गर्व अति धरहीं ॥ शब्द हमार नहीं उन चीन्हौं । कुंजर देह जायसों लीन्हौं ॥ कनक सिंह तिनके सुत कहिये । राज तिलक उनके शिर रहिये॥ भाग्यवन्त भयेऊ बड़ राजा । पिता पीड करही सब साजा ॥ बहुतक दिवस तहां चलियऊं । एक दिवस कौतुक अस भयऊं॥ आधी रात बीति गइ जबही । राजा स्वप्न दीन्ह पुनि तबही ॥ कुंजर देह धरै तब आवा । कनक सिंह कहैं स्वप्न जनावा ॥ अहो पुत्र सुनु बचन हमारा । यहि घर आय तू सिरजनहारा॥ आतारूप उन्है जिनि जानो । सतगुरु आप लेव परमानो ॥ जब तुम भक्ति करो चितलाई । कुंजर देह छूटि मम जाई ॥ चटपट परत राति नियरानी । मीन करत जो पानी पानी ॥ प्रात आइ पद शीश लगाऊँ । हम नहिं चीन्ह तुम्हारा भाऊँ॥ चूक परी हमसे गुरु साई । मरम तुम्हार चीन्ह नहिं पाई ॥ आतारूप हम तुम कह जाना । तुम तो ब्रह्म आहु निरवाना ॥