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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानस्थितिबाध

( १२१ )

इकोत्तरसे पुरुष तर जाई । इहि विधि रहन गहे चितलाई॥ नारि पराई चित मन देही । जन्म सात कुछी कर लेही ॥ नारि पराई अंग छुवावै । कशमल लगै तत्त्व घटि जावै॥ लाख वर्ष रहैं भूतकी खानी । भुगते नर्क घोर सो प्रानी ॥ बिना शब्द जो भुगवहि नारी । तो सब परै कालकी वारी ॥ बिना शब्द निरञ्जन लीन्हौं । ताते पुरुष माथ पुनि छीन्हौं॥ नर्कहिकी कहा बात जु कहिये । सुर नर सबै काम वश रहिये॥ धर्मदास सुनि लीजे हमसों । उत्पति सकल कही हम तुमसों॥ राजा युग घिर पास मैं गहिऊं । बालकरूप तहां पुनि रहिऊं ॥ घरन कुमार तासकी रानी । प्रीतभाव बहु सेवा ठानी ॥ पुत्र भाव उन हमकह जाना । कपट भाव नहिं तजौं निदाना॥ ज्ञान पुण्य वे बहुतहि करहीं । राज गुमान गर्व अति धरहीं ॥ शब्द हमार नहीं उन चीन्हौं । कुंजर देह जायसों लीन्हौं ॥ कनक सिंह तिनके सुत कहिये । राज तिलक उनके शिर रहिये॥ भाग्यवन्त भयेऊ बड़ राजा । पिता पीड करही सब साजा ॥ बहुतक दिवस तहां चलियऊं । एक दिवस कौतुक अस भयऊं॥ आधी रात बीति गइ जबही । राजा स्वप्न दीन्ह पुनि तबही ॥ कुंजर देह धरै तब आवा । कनक सिंह कहैं स्वप्न जनावा ॥ अहो पुत्र सुनु बचन हमारा । यहि घर आय तू सिरजनहारा॥ आतारूप उन्है जिनि जानो । सतगुरु आप लेव परमानो ॥ जब तुम भक्ति करो चितलाई । कुंजर देह छूटि मम जाई ॥ चटपट परत राति नियरानी । मीन करत जो पानी पानी ॥ प्रात आइ पद शीश लगाऊँ । हम नहिं चीन्ह तुम्हारा भाऊँ॥ चूक परी हमसे गुरु साई । मरम तुम्हार चीन्ह नहिं पाई ॥ आतारूप हम तुम कह जाना । तुम तो ब्रह्म आहु निरवाना ॥

( १२२ )

बोधसागर

पिता हमार कुंजरहि भयऊ । आधी रात खबर मोहि दयऊ॥ क्षमा अपराध कीजिये स्वामी । कृपा सिंधु हो अंतरयामी ॥ साहब दया करौ अति भारी । सकल जीव हैं शरण तुम्हारी॥ दाया करि दीजै वर सोई । जाते आवागमन न होई ॥ जिहिमो होय मोर निस्तारी । सो प्रभु करिहों तब बलिहारी॥ तब हम उनपर दाया कीन्ह । संधिक नाम उनहि कह दीन्ह॥ विधिपर भक्त कीन्ह चितलाई । धनकर मनकर तनकर भाई ॥ सतरहसै रानी परवाना । कर्मनि काहु कहा नहि माना ॥ कइक उहागिल हती जो रानी । सोउठि चली शब्द पहिचानी॥ सकल रूप कर चली सिंगारा । भक्ति हेत कारन पग धारा ॥ लीलावती नाम तिहि केरा । सो हम जीवन कीन्ह उबेरा ॥ सोरह रानी सत्रहों राजा । पहुँचे लोकहि पुरुष समाजा ॥ सोई कथा कुंजर में आई । धर्मदास परखो चित लाई ॥

साखी--यह गुन ज्ञान स्थितिहिके, सेव शब्द निजसार । या विधि हंस करनी करै, उत्तै भवजल पार ॥

सजेको शब्द

साखी--अक्षय नामके सेजपर, हंसा पारस दीन्ह । कालमें यम लूटिके, हंस आपन कर लीन्ह ॥ अक्षय सुख सेज आदी बानी । जापर हंसा पारस आनी ॥

साखी--जो हंसा पारस परसि, कहे कवीर सत बोल । ताकहँ चोर डहके नहीं, युग २ आहि अमोल ॥ ते हंसागये अमर लोककहँ, अक्षय अंक हमपारसलीन्ह । कहै कवीर सतलोक बैठकर, जीमें चीन्होती दीन्ह ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

धर्मदास चित सेवा ठाने । दोइ कर जोरि चरण लपटाने ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२३ )

कठिन वेद साहेब तुम कहेऊ । जीवन मर्म न काहू लहेऊ ॥ ब्रह्मा विष्णु शंकर मिलि भाई । अलख निरंजन ध्यान लगाई॥ सुर नर मुनिकी कौन चलावै । पच्च २ मरै पार नहिं पावै ॥ तवन भेद साहेब मोहि दीन्हौ । हंस उबारि लोक कहैं लीन्हौ ॥ अब प्रभु मोही कृतारथ कीजै । लोक दिखाय दरस प्रभु दीजै॥ यही देहसों लोक दिखावो । हे दयाल मम तृषा बुझावो ॥ चित चकोर तब होइ अनंदा । दिखे अघाइ लोक सुठि चंदा ॥

साखी-धर्मदास विनती करै साहब सुनो चितलाय ।

जबही मम संतोष होई, पुरुष दर्श दिखाइ ॥

चौपाई

सद्गुरु वचन

तब साहेब कहि बचन प्रमाना । धर्मदास तुम मन पतियाना ॥ तुम जग पंथ चलावहु जाई । हमकह चिह्न पुरुषकह पाई ॥ हमहि पुरुष कहु अंतर नाही । सुरती छाया संग रहाही ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास न्यौछावर कीन्हौ । भये कृतारथ दर्शन दीन्हौ ॥ अब साहब मोहि लोक दिखाऊ। तुमहि छांड़ि दूजा नहि भाऊ॥ बिनदेखे सुस्थिर नहिं होई । कृपा करहु निज राखो गोई ॥ जैसे कृपण द्रव्यकी आसा । बिन पाए बहु होवै त्रासा ॥ दरस करत तन तपत बुझाई । जैसे रंक महानिधि पाई ॥ बिन देखे व्याकुलचित भारी । पुत्र मरे जिमि मात दुखारी ॥ दरश विना नाही चित लागा । हे प्रभु मोकहैं करहु सुभागा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भाल कीन्ह विचारा । अब तुम बचन सुनौ टकसारा॥ काया अवधि पुरी जब आही । तब लेजाव पुरुषके पाही ॥

( १२४ )

बोधसागर

सुरति शब्द डोरी हट धरहू । छूटै देह तर्स तब करहू ॥ तब लगि पंथ चलावहु जाई । हटता मानि करौ गुरुवाई ॥ मिथ्या वचन तुमहिस्सों करिहे । यमकी डगरि जाय सो परिहे ॥

धर्मदास वचन

मूर्छित होइ चरण चित लागे । जल बिनमीनप्राण जिमित्यागे ॥ बिन देखे नहि होय अनन्दा । चिडिया व्याकुल है अतिफन्दा ॥ तुम साहेब अस बचन उचारा । कंप्पो जीव त्रास भवसारा ॥ हम दरशन विनु हैं अति चोरा । तुम प्रसाद हम पाइत बोरा ॥ अंतरध्यान भए प्रभु जवहीं । सात दिवस बीते पुनि तबहीं ॥ सात दिवस लग अन्न न पाया । कबीर कबीर ध्यान मन लाया ॥ सदगुरु दया करी चित लाई । कच्छ देशते तब चलि आई ॥ कच्छ देश जब कीन्ह पयाना । अलीदास धोबी पहिचाना ॥ नाम पान ता कहैं समुझाई । धर्मदास कह आन जगाई ॥ छोड़हु हठ चित शब्द विचारौ । पंथ चलावहु हंस उबारौ ॥ जीवन अपनी बाँह चलावो । दै परवान हंस सुत्तावो ॥ तुम सब हंसनको सरदारा । जीव उबारि जाय दरबारा ॥ देही सहित जान तुम चाहौ । देह धरै कैसे निर्बाही ॥ लोक बैठि तब करिहौ राजी । काग कालकी टोरहु बाजी ॥ अपनी संशय तुम मत धरहू । जीव उबारनकी सुधि करहू ॥

साखी—देह धरेका यह गुण, देहसहित नहि जाव ।

सुखसागर तबहींमिलै, सुरति शब्द लौलाव ॥

चौपाई

धर्मदास उठि बिनती कीन्हां । नामसंधि साहब मोहि दीन्हां ॥ लोक दीपकी सुनी बडाई । ताते दरश परश चित लाई ॥ जब लगि नाहीं देखौ नैना । तब लगि नहि पतियाहूँ बैना ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२५ )

अन्तर ध्यान बहुरि प्रभु भयञ्जः। धर्मदास विलखत मन भयञ्जः॥ रुदन करत फिरै विलखाता । कहैं ना देखे साहब गाता ॥ मोहि अपराधी कस प्रभु छांङ्गा । विरह ज्वाल जरही मन भांङ्गा॥ हौ अपराधि करम कर हीना । साहेब तरस परै नहिं चीन्हा ॥ बिन देखे नहिं जियत न आऊँ । गुरुचरणामृत बिन पछताऊँ ॥ अपना दास दास प्रभु कीन्हा । अग्रिम पदार्थ हम कह दीन्हा॥ अब साहेब मोहि दर्शन देहू । तुम बिन कासो करब सनेहू ॥ दिवस आठ अन्नहि बिन बीता । बिना कबीर जीव नहिं जीता ॥ या विधि बारह दिन हो गयहू । तब साहब फिर दर्शन दियहू ॥

साखी-सजिव भये निजीवते, अति अनन्द उर बाढ़ि ।

धर्मदास मन हर्ष भा, सुख अनन्द हिय गाढ़ि ॥

चौपाई

धर्मदास बिनती तब लाई । इतने दिवस दरस बिन जाई ॥ हम तो भ्रमर कमलके वासी । जल बिन मीन सुरतिज्यों प्यासी ॥

सद्गुरु वचन

तब साहब अस भाखब बैना । अब तुम देखो अपने नैना ॥ देखहु धर्म निरूप हमारा । हमही छांङ्ग और चित धारा ॥ हिरिणिरूप धरो प्रभु तबहीं । कोटिन भानु छिपाने जबहीं ॥ येहि रूप है आदि हमारा । हठ नियह जिन करब बिचारा ॥ जब तुम इतना कीन्हा उपासा । तब कह दरस पाइ हम पासा ॥

धर्मदास वचन

भये कृतार्थ दर्शन लीन्हा । धर्मदास न्यौछावर कीन्हा ॥ बहुरि दास उठि पायन परही । चरण टेक बिनती अनुसरही ॥ जबसे पावब नाम तुम्हारा । तबसे सुनब लोक व्यवहारा ॥ अब मनसौं अभिलाखा येही । सोक दिखावहु पुरुष विदेही ॥

( १२६ )

बोधसागर

मो कह लेहि चलौ प्रभु तहवां । सत्य लोक पूरुषही जहवां ॥ बिन परिचय नहिं मन पतियाई। विन दर्शन नहिं सुरति हद्दाई॥ तुम प्रसाद पाइब मैं भेदा । अब परसौ चित अमृत केदा ॥ सत्यलोक परसौ उजियारी । मैं अब बलि २ जाऊँ तिहारी॥

साखी—यम बंधन सब काटिकै, हंस लगावहु तीर । धन्य भाग्य वा हंसके, कहि नाम कबीर ॥

सदगुरु वचन चौपाई

तब साहब चित पाया आई । चलहुँ वेग मैं दर्श दिखाई ॥ प्रथमहि करौ नासिका बारी । फिर रक्षा मन है रखवारी ॥ पैठै नाहीं काल शरीरा । बहुरि कठिन होवे तब पीरा ॥ जब तुम करहु अग्र सनेहा । शब्द संधिसौं राखो नेहा ॥ उन मुन कर पवनहि अवराथौं। उलटे ते सुलटा करि साथौं ॥ सोहं सोहं होइ सवारा । छोड़हु देह चलो दरबारा ॥ चले जो हंस पवनके तेजा । पहुँचे निमिष मांह जहां सेजा ॥ पलैंग साठ राह हम कीन्हों । साहिब खैंचि पलकमों लीन्हों ॥ राह माह एक नाचहि दूता । शब्द बान मारेय अजगूता ॥ छिनमें साहब लैगये तहँवा । पुहुप दीप पूरुष रह जहँवा ॥ सुरजन पीप जाइ भे ठोढ़े । देखत दरस हरष अति बाढ़े ॥ धर्मदास सत बिनती कीन्हों । साहब सुरति घटहिमों चीन्हों ॥ लेकर सुररति चले पुनि तहां । हंस सुजन बैठे जहां ॥ करी प्रणाम दण्डवत कीन्हों । हंसन कुशल पूछि सब लीन्हों ॥ केहि बिधि तुम रक्षा मन आयहु । कौन शब्दसों अमृत पायहु ॥ यमको जोर पहुँचत है प्रचण्डा । कैसे कदि आये नव खण्डा ॥ कौन प्रसाद पाय तुम भाई । कौन वस्तु बल इहवां आई ॥ पिछली सुरति कछु तुम आनौं । रक्षा हंस आप कह जानौं ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२७ )

धर्मदास तब वचन प्रकाशा । आये इह कबीरकी आशा ॥ नाम संधि उन मोहि हटाई । तिहि प्रसाद सेवा तुम पाई ॥ आरतीकर परवाना पावा । काल फाँस सबहीय नशावा ॥ सुरति निरति भूल गये जब ही । भवसागरमों ठाढे तब ही ॥ साखी-लोक वेद सब भूलिहू, भूला आपनु भाव । बलिहारी सतगुरुनकी, जो ल्याये इहि ठाव ॥

चौपाई

तबहि सुजन जन पूछी बाता । कहिब कहा है हमरे आता ॥ तुमरे दीप माँहि वे ठाढे । हम पूरन उनहीके बाढे ॥ तब सुरजन जन आये तहँवा । आइ कबीर बैठे हैं जहँवा ॥ चरण लगाइ अंकमहँ लीन्हों । भले गुसाईं दर्शन दीन्हों ॥ सिंहासन साहब बैठारी । सुरजन हंस विराजे भारी ॥ आज्ञा साहब दीन्ही जबही । धर्मदास ठाढे भये तब ही ॥ पुरुषहि तबहि वचन उचारा । सुकृत अंश लावो सठिहारा ॥ आरति साजि हंस सब आये । चलिए सुकृत पुरुष बुलाये ॥ तब सुकृत चित आये तहँवा । पुहुपदीप पुरुष रहि जहँवा ॥ पुहुपदीप नहिं बरनो जाई । जगमगज्योति सदा अधिकई ॥ दामिनि दमक होय अति भारी । कोटिन भानु जाय तहाँ वारी ॥ हंस जाय तहाँ करै अनन्दा । कालजाल व्यापै नहिं फन्दा ॥ पंख बेहु नभचर तहाँ फिरही । अगिन बेहुते दीपक जरही ॥ बिन करताल मुदंग जो बाजे । चित्र विचित्र बीन कर छाजे ॥ बीना सुर तहाँ शब्द पुकारा । बीना श्रवण सुनत झनकारा ॥ बिना नालके कमल अन्तूपा । तामध्ये है पुरुष स्वरूपा ॥ करतहि दरश हरष उर आनी । सतगुरुवचन सत्य कर मानी ॥

साखी-अति अनंद उर ऊपजो, बाजत अनहद तूर ।

हीरा लाल मणि जग मगै, अमृत शोभा भरपूर ॥

( १२८ )

बोधसागर

चौपाई

धर्मदास मन भये अनन्दा । जिमिरविदरश फूलि अरविदा॥ शोभा दरश हरष अति भाऊ । उभयसुरखगतिबरणि न जाऊ॥ तब सुरजन जन जाइ जनावा । साहेब धर्मदास यह आवा ॥ इच्छा अधिक करै दर्शनको । पुरुष चरण हियमो परसनको॥ ये दोइ रूप तुमहि उत्पानी । सद्वरु सुकृतै नाम बखानी ॥ तब ही पुरुष बचन फरमाया । सुरजन हंस जबै बुलवाया ॥ लेहु बेगि सुकृत तुम अंशा । पुरुष दरश करीब निःशंसा ॥ दंडवत अष्टांगहि कीन्हौ । धर्मदास आगे पग दीन्हौ ॥ पायर दीप ठाढ़ भै जब ही । अमृतकला देखत भै तब तब ही॥ पर धर्मदास हि सुरझाई । देखि रूप अब मति अधिकाई॥ कोटिन कला सूर्य औ चन्दा । हीरा रतन गिने को गन्दा ॥ जगमगज्योति अधिकतहाँराजे । चितवनदृष्टि डगत गुनराजे ॥ हग संपुट अंबुज सम आही । दरशहरशच्छबिहियहि अघाही॥ आनन्दरूप मूरछा आई । तब सुरजन तन कीन्ह उठाई ॥ सुचित चित्त होऊ धर्मदासा । आभारूप करि शब्द निवासा॥ उठिकर बाह निछावर करही । शीश नवाय चरण रज धरही ॥ दंड प्रणाम कीन्ह बहुभांती । सीप अघाइ पाइ जिमि स्वाती॥ तबहि पुरुष असआसन दीन्हौ । शब्द सहाय हमही तुम चीन्हौ॥ तब सुरजन जन बचन उचारा । सुकृत अंश कीन्ह दीदारा ॥ पुरुष दीन सिंहासन टारी । हंसहरम्मर बैठो झारी ॥ पुरुष तबहि यह वचन उचारा । केहिके अंग आहि दरबारा ॥ धर्मदास कैसे तुम आये । को वहियां जिनधरि पहुँचाये ॥ काहेके बल कालहि जीता । कौन शब्दसे राखब प्रीता ॥ तब सुकृत बिनती अनुसारी । साहब बचन प्रीति उर धारी ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२५ )

ज्ञानी अंश शब्द मोहि दीन्ह। उनकी बाँह गौन हम कीन्ह। ॥ करता देत छेकि जब बाटा। शब्द बाँह श्रोता कह काटा ॥ कालहि जीति अंशलै आवा। उनकी बाँह दरस हम पावा ॥ सुरजन अंश वचन उच्चार। सुकृतघटमें कवि सम्हारा ॥ देखहुँ लोकहि दृष्टि पसारी। ज्ञानी अंश कहां अनुसारी ॥ कौन दीप कहवाँ अस्थाना। कौन रूप ज्ञानी कर जाना ॥ धर्मदास घट कीन्ह विचारा। पुरुष वचन दृष्टि उजियारा ॥ लोक दीप देखो सब ठावा। ज्ञानी अंश नजर नहिं आवा ॥

साखी—लोक दीप सब देखिया, अंश नजर नहिं आय।

पुरुष कबीर घट एकहै, दूजा नहीं लखाय ॥

चौपाई

धर्मदास दुबिधा बिलगाना। पुरुष कबीर एक पहिचाना ॥ रूप रेख सब एकहि देखा। दूजा भाव अन्य नहिं लेखा ॥ धर्मदास तब चकृत भयऊ। पुरुष कबीर एकही भयऊ ॥ कीन्ह बन्दगी शीस नवाई। क्षमा अपराध कीजिये साई ॥ तुम प्रभु आप अवसर नहिं कोई। बकसडु चूकि मोर कछु होई ॥ ब्रह्म अखंडित अन्तर्यामी। कृपासिंधु प्रभु पूरण स्वामी ॥ लज्जावान अविगति अविनाशी। लोक दीप सब कीन्ह प्रकाशी ॥

पुरुष वचन

धर्मदास तोहि दाय। कीन्हौ। अवगति रूपदरश हम दीन्हौ। ॥ ये दोह कला भिन्न नहिं जानो। पुरुष कबीर एक पहिचानो ॥ एक रूप हम हंस उबारा। एक रूप त्रैलोक मझारा ॥ तुम्हरे शिर जीवनको भार। भवसागरके तुम कटियारा ॥ यासे परखो दीन्ह बताई। यह रमती घट देवरि गाई ॥ जो तुमरे घटते नाहिं जाती। तो सब जीवन माँह समाती ॥

नं. ८ कबीरसागर - ५

( १३० )

नोधसागर

यह हुरमत मनमहँ जो धरही । फिर २ भवसागरमें परही ॥ पुरुष कबीर एक जिन जाना । हंस हमारा सोइ पहिचाना ॥ के काल निकट नहि आई । नाम कबीर कहो चितलाई ॥

साखी—अब तुम जाइब जगतमें, हंसन करो उबार । हंसराज तुम अंश मम, भुगवो सुखहि अपार ॥ प्रलयकालके अंतमें, जीव जन्तु सब तार । दरस परस सब मिलि करे, अस्थिर रूप अपार ॥

चौपाई

पुरुष रूपसे ज्योति निकारा । नाम कबीर देह तब धारा ॥ धर्मदास ढिग बैठे आई । जौन रूप धरि गये लेवाई ॥ चीन्हो सुकृत रूप हमारा । अब तुम घटमें भव उजियारा ॥ चलहु बेगि जिन लावहु बारा । जीवनाथ देव टकसारा ॥ चले सुकृत तबही शिरनाई । ज्ञानी लीन्ह संग लगाई ॥ निमिष एक नहि लागी बारा । पहुँचे सहज शून्य मझधारा ॥ धर्मदासकी काया जहँवाँ । पहुँचे ज्ञानी आये तहँवाँ ॥ चारी दूत देह ढिग आवा । पैठन केर उपाय लगावा ॥ घटमें पड़ि देह ले जाऊ । धर्मदास फिर कहँवाँ आऊ ॥ साहब शब्द बानसे मारा । दूतहि मारि हंस पैठारा ॥ धर्मदास कहा महँ जागा । रोम २ आनंद बहु पागा ॥ गुरु कबीर कह निज कर चीन्हों । तन मन धन न्योछावर कीन्हों ॥ बहुत अनन्द कीन्ह गृह माँहीं । चरण शरण मन लीन्ह सदाँहीं ॥

साखी—यह गुण ज्ञान स्थितहिके, कहै कबीर विचार । धर्मदास दीदार करि, आए जगत मँझार ॥

चौपाई

धर्मदास हियमें अति हवैं । गढ़द गिरा नैन जल ववैं ॥

ज्ञानस्थिति बोध

( १३१ )

मम हियतिमिर आहि अधियारा । महर पतंग कीन्ही उजियारा ॥ मन अहि तपत कबहुँ नहि धीर । वचन अंग शीतलमलयागीर ॥ तेहिपर सत त्रिय ताप बुझानी । अमी असन त्रियत्रिपतअघानी ॥ पायउ दरश कृतारथ आजू । दरसन देखेव हंस समाजू ॥ अब गुरु मोकहैं देव लखाई । पुहुप दीप कैसे निरमाई ॥ अंबुदीप कौन विधि भयऊ । धर्मराज कैसे निर्मयऊ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास पूछी भलवानी । सो सब कथा कही बिलछानी ॥ पुरुष विदेही देह निमासा । श्वासा सारते पुहुप प्रकाशा ॥ सत्रह शंख पंखुरी कीन्हौ । ताहि मध्य वासा प्रभु लीन्हौ ॥ अंबुदीप तबही जो कीन्हौ । सहज पुत्र कह बैठक दीन्हौ ॥ सवा शंख पंखुरी राजै । जग मग शोभा तहां विराजै ॥ आठ पुत्र तहँसे उत्पानी । तिनसों आठों सिद्धि बखानी ॥ जोति सरूपी पाया आई । ज्योति रूपके काल बनाई ॥ उत्पत करै प्रलय संहारा । तउना उपजै काल अहारा ॥ सहज धर्मसों गुण परकासा । ज्योति सरूपी ज्योति निवासा ॥ धर्मरायको बल परकाशा । माया जाल जीव सब फाँसा ॥ आपुन रहियब सुनी मझारा । वहाँ बैठि सब कीन्ह पसारा ॥ पुहुप दीप आवन नहि पावा । जानै साहब नाहि रहावा ॥ धर्मराय माया उपजाई । ज्योति स्वरूप जीव अरुझाई ॥

साखी-पुरुष पार नाहीं लहेउ, अटके ज्योतिहि मूर्ति । ज्योति भई है प्रकृतितें, प्रकृति बनी है मूर्ति ॥

चौपाई

इह कारण वह दीप सम्हारा । धर्मनि पाव वही बैठारा ॥ पुहुप दीप जब सिरजन लीन्हौ । समसर पवन वास तहैं कीन्हौ ॥

( १३२ )

बोधसागर

ज्योति ओट यह बोलत बानी । सबको जानै पुरुष निसानी ॥ काल दुष्ट जीवन छलि राखा । ज्योतिहिओट वचनमुख भाखा॥ उत्पति प्रलय याहिसों भयऊ । भूल भुलाय सबनको दयऊ ॥ पुहुप दीपको सुमिरन करई । ज्योति स्वरूप नहिं सो परई॥

साखी--इह गुन ज्ञानस्थितिके, पुहुपदीप अनुसार ।

एहि दीप बासा करै, आवा गवन निवार ॥

चौपाई

पुहुप दीपमें समसर कीन्हौ । समसर पवन खास तहाँ लीन्हौ॥ अमर वासना येही आहे । इहँहि बैठि सब करी कथा है ॥ थाह न जानत मूढ़ गवँरा । लुब्ध रहेव जयमाल पसारा ॥ पुहुपदीपको सब दीप निवासा । जहाँ वह पारब्रह्मकर बासा ॥ येहि शब्द तुम लेव बिचारी । पुहुप दीप कीन्हौ बहु बारी ॥ पुहुपदीप दीपनमें सारा । जो बूझे सो उत्तरहि पारा ॥

साखी--येहि सुरति ले राखहु, पुहुप दीपके पास ।

सत्य पुरुष जहाँ आप है, अमृत सिंधु निवास ॥

चौपाई

तहँको हंस करहि पैठारा । जब मिलि है सद्वरु कइहारा॥ हंस जाय पुरुषहिं दरबारा । अविचलनामकोमरहि सद्धार॥ सत्य कमलपर बैठक दीन्हा । बैठे हंस अतिहिं सुख लीन्हा ॥ सुधा अहार अमर भै काया । आदि नाम अविचल मन भाया॥ कोटिन कोटि दंडवत लीन्हा । धनि सत्य सुकृतनामजो दीन्हा॥ पुरुष शब्दजिनि आपु बतावा । आवा गौन रहित घर पावा ॥

साखी--येहि गुण ज्ञान स्थितिके, पुहुप दीप निजु बास ।

कहे कबीर वह शब्द गुन, हंसा करहि विलास ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब सेवा ठानी । सुरति भेद पूछनको आनी ॥

ज्ञानसिग्धनिबोध

( १३३ )

सो सद्गुरु मोहि कहो बखानी । जासो आदि अन्त पहिचानी ॥ जौन सुरति साहब तुम साथी । सो मोहि कहिये मिटत उपाधी ॥ जेहि सुरति प्रथम जो आहे । वही सुरति मिलि सबको थाहे ॥ बिना सुरति नहिं गुरुको पाही । बिना सुरति नहिं लोके जाई ॥ सुरति होइ तब ज्ञान उचारे । सुरति होय तब ध्यान सम्हारै ॥ सुरतिहि पैठि पवन को गहे । बिना सुरति वह प्राणी डहे ॥ सुरति होइ तब अगम जानी । भला बुरा सबही पहिचानी ॥ बहिनभानजी सुरतिहिजानी । माता पुत्री सुरति बखानी ॥ मोह न नारि सुरति कहैं देखौ । धर्म पाप सब सुरति बिसेखौ ॥

साखी--जो कुछ है सो सुगति है, साहब दे बतलाय ।

सुरति भाव जब चीन्ह है, तब हंसा घर जाय ॥

सद्गुरु वचन

तब सद्गुरु अस वचन उचारा । धर्मदास पूछव मत साग ॥ बिना सुरति पुनि कुछ अनपाई। सुरति विहूँ नहिं आवहि जाई ॥ सो अब तुमसों कहां बुझाई । सात सुरति सब देव लखाई ॥ पुरुष सुरति आपहि उपराजा । विहँगसुरतिप्रथमहि किय साजा ॥ बीस आठ प्रकृति जो कीन्हौ । जो जनमें तस भुगने लीन्हा ॥ जैसे योग मनहिं रहाई । तैसे बुद्धि शरीरहि सोई ॥ प्रथम कहौ अब सुरति विचारी । पुरुष एक उत्पन किय नारी ॥ जेठी सुरति तबहि उच्चारी । चारहु लोक कीन्ह बिस्तारी ॥ विहँग सुरति ताही सो कहिए । ब्रह्म सुरति मूल वह लहिए ॥ निरति सुरति ये स्थूलहिछाजा । हरषत सुरति विदेही साजा ॥ बाढी सुरति नाद गुन गहे । धीर सुरति नाद गुण गहे ॥

साखी--सुरति पुरुष अंगहि बसी, फूट अंडके भाव ।

बीजमूल गुण प्रकट है, देखै ते सच पाव ॥

( १३४ )

बोधसागर

चौपाई

सुरति शब्द अब कहौं बखानी । धर्मदास लीजो पहिचानी ॥ सुरति शब्द भाखिब हम तुमसे। सुरति प्रसन्न होय तब हमसे ॥ सुरतिहि माहि रच्यो संसारा । सुरति करै तब उत्तरे पारा ॥ जेठौं अंश सुरति जो आही । पुरुष संग वह सदा रहाही ॥ बिहंग सुरति पुरुष जब कीन्हौं। रचना सपत सोप तब दीन्हौं ॥ अबही कहौं सुरती कर मूला । उपज्यो अग्र शब्दसो स्थूला ॥ जबही पुरुष कीन्ह है इच्छा । तब इह प्रकट भई सब शिक्षा ॥ सुरति शब्द पुरुषहि उपजाई । सुरति प्रसन्न लोभ रच आई ॥ सुरति निरति सुख देह अनन्दा। मेटत सुरति सकल दुख द्रंदा ॥ सुरति निरति जब एके होई । तब साहेब कह देखे सोई ॥

साखी—कहै कबीर वह सुरतिते, सब कछु भयो प्रकाश ।

शब्दहि सुरति बिहंग है, लीन्ह अग्रमो बास ॥

चौपाई

धर्मदास सुनियो चितलाई । घट भीतर लीजो निरताई ॥ सुरति रूप देखो निरधारा । मन बुद्धि चित्त पवनसे न्यारा ॥ पाँच तत्त्वकी रचना येही । इनते सुरति जो आहि विदेही ॥ ब्रह्म अंगसे प्रकटी आई । तोनि अंग गुण कला धराई ॥ सत्यरूपसे सुरति बखानौ । चेतन अंग निरति कहैं जानौ ॥ आनंद सदन शब्द पहिचाना । सत्य सुकृत दोइ नाम बखाना ॥ सुरति रूप चैतन्य समाई । चेतन रहित शब्द लौ लाई ॥ सुरति समुद्रहि मठी हुवारा । हंसा पैठि देखि निर्धारा ॥

साखी—कहै कबीरहि सुरति बल, अपने पुरुषहि देख ।

मन बुद्धि चित्त समेटि के, चेतनरूप विशेष ॥

अक्षय वृक्षकी सुरतिमें, हंसा लेहि बसेर ।

कहै कबीर लै निबहि है, जात न लागे बेर ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १३५ )

अबु दीपकी सुरतिपर, हंस होय असवार । कहै कबीर लै निबहिहौं, कोटि बसैं बटपार ॥ गृहदान रोके नहीं, सुरति हंस लै जाय । कहै कबीर यम हारियो, काल पैठि पछिताय ॥ इह गुण ज्ञान स्थितिहिके, गहे शब्द चितलाय । कहै कबीर यम हारिया, काल बैठि पछिताय ॥

धर्मदासवचन-चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसारी । तुम साहब हम दास तुम्हारी ॥ गुरु शिष्यकी रहनी कैसी । सो समुझाय कहौ गुरु तैसी ॥ योग अयोग मोहि समुझावो । हे दयाल मम त्रिखा बुझावो ॥

सद्गुरु वचन

सद्गुरुवचनहि विहँसि उचारी । अगुण सगुण विच गुरु अचारी ॥ शिष्य पूछि गुरु भए उदासा । सो गुरु उठि आए धर्मदासा ॥ जिमि बालक रोवै बिछाई । मात पिता बहु बोध कराई ॥ येयाविधि गुरु शिष्य हैं मोई । जगमें अमृत पीवैं वोई ॥ शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरुपारस शिष्य लोह समानो ॥ गुरु मलयागिरि शिष्य भुजंगा । गुरु पारस शीतल होय अंगा ॥ गुरु समुद्र है शिष्य तरंगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥ शिष्य चकोर गुरु शशि जानौ । गुरुरविकमल शिष्यविकशानौ ॥ इह सनेह शिष्य निहचै लहई । गुरुपद परस दर्श हिय गहई ॥ जब शिष्ययाविधिध्यानविशेषा । सो वह सीख गुरु समलेखा ॥ गुरुन गुरुनमों भेद विचारा । गुरु गुरु कहै सकल संसारा ॥ गुरु सोई जिन शब्द लखाया । आवा गौन रहित दिखलाया ॥ गुरुहि सजीवन शब्द लखाया । जाके बल हंसा घर आया ॥ वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु औ शिष्यमताएक आही ॥

( १३६ )

बोधसागर

साखी—गुरु शिष्य एके भए, भिन्न न कबहुँ होय । दुर्मति दिलसो मारिकै, सुरति शब्द चित पोय ॥

धर्मदासबचन--चौपाई

धर्मदास तब बिनती कीन्हौ । चरण पकरिके विन्ती लीन्हौ ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । केहिविधि उपजे सो कहि भेवा ॥ चारि मुक्तिको भेद बतावौ । सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावौ ॥

सत्गुरु बचन

सदगुरु बचन विहसि कर बोले । मुक्ति भेद कहुँ परदा खोले ॥ आदिहि पुरुष निरञ्जन कीन्हौ । माया आदि ताहि कह दीन्हौ ॥ तिहि संयोग भये त्रिय बारी । ब्रह्मा विष्णु महेश विचारी ॥ चार मुक्तिके वे हैं राजा । पँचइ मुक्ति भिन्न उपराजा ॥ प्रथम मुक्ति सालोक बताई । मारग वाम ताहि कर आई ॥ दूजी मुक्ति समीप कहावा । निर्वाण मार्ग हो ताकहँ पावा ॥ तीसरि मुक्ति स्वरूप बखानी । अघोर मार्गही ताकर जानी ॥ चौथी मुक्ति कहिये सायोजा । सर्मग मार्ग कलमा पढ़ रोजा ॥ चारों मुक्ति निरञ्जन लीन्हौ । तिनके बसहि जीव सबकीन्हौ ॥ अब सुन पांचइ मुक्ति विचारा । धर्मदास परखो मतसारा ॥ जीवनमुक्ति दरस तब लहये । मृतकदसा होय नामहि गहिये ॥ सत्य वचन मुखसो उच्चरई । नाम सार हृदये महाँ धरई ॥ नियम धर्म षट्कर्म अचारा । त्रिगुण फंदसों रहै निन्यारा ॥ सुरति निरति नामसों राखै । सद्गुरु बचन सत्यकर भाखै ॥ लोभ मोहसों रह निह न्यारा । करम क्रोधते आप उवारा ॥ दुख सुखकी कछु संशय नाही । पाप पुण्य नाही चित माहीं ॥ अरथ द्रव्य मिथ्याकर मानै । जीवन जन्म नाम पहिचानै ॥ दया क्षमा कुल टूट कहावा । विषमें हरषन चितमें लावा ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १३७ )

सो जिव उतरहि भवजल पारा । जो यह चाल चले निर्धारा ॥ अर्ध ऊर्धका करहि विचारा । सत्यनाम हृदये मर्हधारा ॥ उलटि कमल सुलटा जब करई। मनहि समेटि सुरति चित धरई॥ समसर पवन योगि कह तारै । पवन डोरि स्वासा निरुवारै ॥ सोहं तार घडहिमें देखे । स्वेत भँवर गहि शब्द विशेषे॥ भँवर गुफामहँ जगमग जोती । वा घर बरवै माणिक मोती ॥ निहकामी निरवानी जानी । निहरूपी निश्चितहि बखानी ॥

सारखी—आदि सुहंग बखानऊ, स्वर्ग पताल भरि ठौर ।

कहे कबीर धर्मदाससों, वही हंस शिरमौर ॥

चौपाई

सुरहि कमल याजीकर छोरा । सुरति करै तब देखि निहोरा ॥ ऐसी सुरति निरति मन राखै । सांचै दरश पुरुषके भाखै ॥ जबही दरश परश पुनि होवै । जन्म जन्मके कश्मल धोवै ॥ जीवन मुक्ति होइ पुनि तबही । संधिक नाम आव घट तबही ॥ कागरूप सब चाल मिटाई । गुरुप्रसाद हंस गति पाई ॥ निर्मल जीव हंसगति भयऊ । नाम संधि हृदयेमहँ लहेऊ ॥ वंश प्रताप साँचकर चीन्हा । नाम सार अमृतसर लीन्हौ ॥ जीवनमुक्ति देहमहँ पाई । हिम्मर रूप धरे सो आई ॥ जाती बरन पलटे सब अंगी । सद्वरु साँचे मिलि बहुरंगी ॥

सारखी—मलयागिरकी वास ज्यो, दीपक ज्योति पतंग ।

पारस छुइ कंचन भया, स्वाति सीपके संग ॥

चौपाई

स्वाती सीप नाम मिटि दोई । मुक्ता हल तेहि कह सब कोई॥

धर्मदास वचन

धर्मदास गुरु चरण न परई । शीश नवाय दण्डवत करई ॥ धन्यभाग्य दर्शन प्रभु दीन्हौ । अधम जीव पावन कर लीन्हौ॥

( १३८ )

बोधसागर

साहब दया दास पर कीजै । विदेह मुक्ति कर भेद जो दीजै॥ विदेह मुक्ति किम देह समाई । कौन भांति हंसा लखि पाई ॥ छुच्छी नदी रैन अति भारी । सलिलप्यासकिम मिटे दुखारी॥ पाँचो तत्त्व पाँच गति संग। त्रिगुणफंद जीव यह रंगा ॥ नऊ नाटीक कहे घटमाहीं । स्वासारूप जीव सँग ताहीं ॥ मनकी कला अनेक पसारा । काम क्रोध तृष्णा अधिकारा ॥ लोभ मोह चिन्ता अतिभारी । जड़ता गर्भ कुटिल विस्तारी ॥ इनके संग काग गति पाई । हंसवरण किमि होय गोसाँई ॥ यही अंग मन चितवन कीन्हौ । केहिविधि साहब तुम कह चीन्हौ॥

साखी-धर्मदास बिनती करै, साहब बंधन छोर । सब अंगमें भरि रहै, विदेह अंगको चोर ॥

सद्गुरु वचन

सद्गुरु वचन सुनो धर्मदासा । अगम भेद तोहि कहों प्रकाशा॥ विदेहमुक्ति तुम पूछिब आई । सो सब कथा कहो ससुझाई ॥ पुरुष विदेह कमलमों रहेऊ । सुरति विदेह शब्द जौ ठयऊ॥ लोक दीप सब सुरतिहिं कीन्हौ । तेहि पाछे मन उत्पन कीन्हौ ॥ विदेह मुक्तिकी डोरी चीन्हौ । शब्द सुरतिके हाथहिं दीन्हौ ॥ मनहिं समेटि सुरति पहिचानी । सुरति जाय तब शब्द समानी॥ शब्द सुरतिकर बांधो भेला । भवसागरसे दीन्हों हेला ॥ शब्द विदेह गुरूकर बासा । सुरतिस्वरूपी शिष्य निवासा॥ सुरति शब्दमें लीन्हो बासा । सुरतिस्वरूपी शिष्य निवासा॥ मायाजाल कृत्रिम सब लेखो । अग्रझलक नैननमें देखो ॥ कूप झांकि हो वचन विदेही । अग्नी जार उठावै सेही ॥ अग्र शब्द तबही लखि पावै । मृतक दिशा हो सुरति समावै॥ शीतल तपत स्वाद नहिं जानै । जन्म मरण शंका नहिं आने ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १३९ )

चलते फिरत वचन अस भाखा । चेत अचेत बोध नहीं राखा ॥ पुत्री पिता बंधु नहीं जानै । माता बहिन नाहिं पहिचानै ॥ श्रीहि अभूषण धरै न अंगा । तृषा क्षुधा नहीं स्वाद उमंगा ॥ ऊंच नीचकी नाहिं बिचारी । धर्म अधर्म दोऊसे न्यारी ॥ दुख सुख सब एकहि करिजानी । विदेह अंग ऐसे पहिचानी ॥

साखी-काया सीप सम जानिये, स्वातिशब्द पट आन । परख नेह संपुट बँधौं, मुक्ताहल उतपान ॥

चौपाई

धर्मदास इह भेद विदेहा । इह धन धन्य और सब खेहा ॥ जस चकोर चंदा कह ताकै । याविधि लिप्त नामके नाकै ॥ कमलचक्र है मनको रूपा । स्वप्नरूप भर्मित वह भूपा ॥ पाँच पचीस कठिन बिकारा । देह बीच इन राज पसारा ॥ सेमर फूल जस किरुवां आवा । देखि फूल बहु हरष बढ़ावा ॥ जुंगल गारत सुआ उड़ानो । रोम रोम मिथ्या कर जानो ॥ जाना नहीं विवेक बिचारा । ठोक कपार चलो झँखमारा ॥ मायारूप आहि इमि भाई ! जिमि फूल सेमर सुन्दरताई ॥

साखी-नारीरूप नर देखिके, कूकर सम लिपटाय । बिषय वासनाँ बँधि रहि, विदेहमुक्ति किमि पाव ॥

चौपाई

घरी घरी मन काम जगावै । ज्ञान भुलाय नाम विशरावै ॥ स्वप्न माँहि सोई छल करई । गुप्तवासना हृदये धरई ॥ कूद कूपके अगिन मँझारा । राखै कौन जीव निजु सारा ॥ सम्मुख आय बाघके कोई । भक्षण यतन करै वह सोई ॥ रक्षक शब्द जाहि तन गाजै । उलटो काल तहाँसों भाजै ॥ यही शब्द घट राखि समाई । माया ताहि खान नहीं पाई ॥

( १४० )

बोधसागर

सारवस्तु घटमों पहिचानौ । रोम रोम अस्थिर ठहरानौ ॥ काया सकल कालकी बारी । निसदिन ध्यान शब्द चितधारी ॥ देही सकल कालकी जानै । विदेह अंग आपहि पहिचानै ॥ देह विदेह नेह गुण जानै । आपा मेटि आदि गुण ठानै ॥ याविधि मनमों रहनी करई । आपा मेटि आदि गुण धरई ॥

सारखी—कहै कबीर वह आपहै, नहिं सुमरन नहिं जाप ।

धर्मदास लिखि लीजियो, अकह अगोचर छाप ॥

चौपाई

अकह अंश जब कहत रहावा । पांचतत्त्व गुणतीन समावा ॥ चलत हँसत बोलत बहुबानी । आपुन राजा रंक समानी ॥ माता पिता धरणि घर कीन्हे । आपुहि योग भोग सब चीन्हे ॥ गृह निकरे पुत्रहिं उपजावे । अपहि षट्कर्मन कह सावे ॥ भूख प्यास तृष्णा बहु सहिया । दुख सुखको संगीसोहिरहिया ॥ अर्थ द्रव्य सुमिरण सों राखै । मिथ्या सत्य आप सुख भाखै ॥ सुमिरण भजन आपही करई । अकला बै अकला संचरई ॥ भली बुरीको करत बिचारा । आपहि पाप पुण्य बिस्तारा ॥ कबहुक संत असंत कहावे । मनके भाव अनेक दिखावे ॥ आपही सेवा करै करावे । खीझे हँसे मनहि पछितावे ॥

सारखी—आप आपही रमि रहो, आत्मरूप परवान ।

यासों रहित अपार है, परमात्म सुस्थान ॥

चौपाई

तब साहब अस वचन उचारा । रहित मुक्ति सब इनसो न्यारा ॥ रहित भाव जो घटमें देखो । आवा गौन रहितई लेखो ॥ रहित पुरुष कह तबही पावे । अस्थिर ज्ञान चित्तमहैं लावे ॥