भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानस्थितिबोध

( १४५ )

संधिक नाम पाइ सुख होई । बिना छाप खातिर नहिं होई ॥ तब सतगुरुने साज मँगावा । कदली खम्भ आनि गडवावा ॥ चौका सोरह सुतकी कीजै । मान सिखावन हमरी लीजै ॥ धर्मदास सोई बिधि कीन्हौ । जो सद्गुरु कृपा करि दीहौ ॥ सोरह हाथ सूत्र तनवाई । सोरह धोती आनि चढाई ॥ सोरह नरियल ले परवाना । लौंग इलाची धरि मिष्ठाना ॥ मेवा अष्ट जुगुतिसो लाई । चौका चंदन कीन्ह बनाई ॥ बासन पांच धातुके धरिया । वांछा सहित गाय अनुसरिया ॥ आरति ज्योति कीन्ह परकाशा । वाजत शंख झाल तमनाशा ॥ धर्मदास औ आमिन आवा । सद्गुरु चरण हिये लव लावा ॥ चरण परखारि चरणामृत लीन्हौ । तन मन धन न्योछावर कीन्हौ ॥ षोडश शब्दहि कीन्ह उचारा । मोरत नरियर भौ उजियारा ॥ धर्मदास परवाना लीन्हौ । शिरिहि नवाय बंदगी कीन्हौ ॥ तारपीछे आमिन चलि आई । कीन्ह बंदगी शीस नवाई ॥ तब सद्गुरु दीन्हौ परवाना । आमिन हिय बहु हरष समाना ॥ धर्मदास गुरु बंदन कीन्हौ । साहब शब्द नाम जो दीन्हौ ॥ सम्भवत पन्द्रहसो चालीसा । भादों शुक्ल पाँचदिन तीसा ॥ पूर्णमासी पूर्ण जानौ । गुरुवासर शरणागति आनौ ॥ तब सद्गुरुने दीन्ह अशीसा । मुक्तिराज दीन्हो बखशीसा ॥ मुक्तामणि निज अंश हमारा । आमिनि घट लेहे औतारा ॥ उनके वंश बयालिस होई । जक्त जीव मुक्तावै सोई ॥

कहे कबीर धर्मदाससों, हम तुम दूजा नाहिं । शब्द विवेक विचार कर, जो देखा घटमाहिं ॥ शब्द सुरति औ निरति है, कहिबेको है तीन । निरति लौटि सुरतिहि मिली, सुरति शब्द लखिलीन ॥