कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अथ बड़ा सन्तोषबोध प्रारंभ
चतुर्विंशतिस्तत्रंगः
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धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास पूछे चितलाई । तत्त्व भेद कहिये समुझाई ॥ कौन तुरीके योजन दौरा । भाषो साहेब हम हैं भौरा ॥ तत्त्वनके स्थान चिन्हाओ । बाहर भीतर भाषि सुनाओ ॥ विनय करूं कीजे प्रभु दाय। धर्मदास गहे दोनू पाया ॥
सदगुरु वचन
धर्मनि सुनो तत्त्व व्यवहारा । निशिवासर का कहूँ विचारा ॥ तत्त्वतत्त्वका स्थान चिन्हाऊँ । कहि करि वाहर भीतर दशाऊँ ॥ स्वासासंग होय आवे जाई । तत्त्वभेद सुनियो चितलाई ॥ लालतुरी योजन परवाना । मुशकी कोजन डेठ सिधाना ॥ हरीतुरी योजन दाय जाई । पीला योजन तीन चलाई ॥ हंसा योजन चारहि ध्यावे । फिरिके दण्ड तबै ले आवै ॥ मूल कमल है तेज ठिकाना । षट दल तत्त्व अकाश बखाना ॥ कमल अष्ट दल है तत्त्वबाई । द्वादश दल पृथ्वी सु रहाई ॥ षोडश दल जलतत्त्व बखाना । धर्मदास गहि राख ठिकाना ॥ याविधि पाचौ आवै जाई । अपनी मनजिलको सुन भाई ॥ गौचतुरी रथ एक सर्वा। ता उपर मन जिव असवारा ॥ जाव पडचो है मनके हाथा । नाच नचावे राखै साथा ॥ क्षण भीरत क्षण बाहर आवै । सतगुरु मिलतो साधिलखावै ॥
साखी—अष्टपांखुरी कमल है, ता ऊपर जिव बास । ताकर मनको आसना, नख शिख तनके पास ॥