भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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संतोषबोध

( १५७ )

धर्मदास वचन

साहेब कहो भेद टकसारा । जेहिते जिवका होय उबारा ॥ नौ तत्त्वनको भेद बताओ । सकल कामना मोर मिटाओ ॥ पाँच तत्त्व जाने सब कोई । चारि तत्त्वकी खबरि न होई ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व रहे कौन ठिकाना ॥ कहाँ तत्त्वनको भोजन केता । ताके चेत आगम है चेत ॥ इनका सतगुरु कहो बिचारा । कहो केता तत्त्व करै अहारा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं अगम बताऊँ । नौ तत्त्व को भेद लखाऊँ ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व ब्रह्मांड ठिकाना ॥ छठवाँ अग्नि तत्त्व जो होई । नैना वीच रमै पुनि सोई ॥ दोयदल कमल वरणहै चारी । बैठे निरञ्जन आसन मारी ॥ ताहि कमलको नाम बताऊँ । चारि वरणका रूप दिखाऊँ ॥ लखै शब्दसो जाने भेदा । राता पीरा श्याम सपेदा ॥

साखी—ताहि कमलको छाड़िके, कीजै शब्द विचार । पाँच तत्त्व संभारिहो, उतरो भव जल पार ॥

चौपाई

निशि बासर की स्वांसा जेती । कहूँ विचार चले दम तेती ॥ छःसै स्वास इक्कीस हजार । येते निशिदिन दमहि सुधारा ॥ ताको भोजन सबमिलि पावे । जो सतगुरु यहि भेद बतावे ॥ बीस सहस्र पंच देव पाई । ताको लेखो कहूँ समुझाई ॥ प्रतिदेव पाछे चार हजार । रहै जाप सोलहसै सारा ॥ छठवें तत्त्व निरञ्जन राई । जाप सहस्र तहाँ पहुँचाई ॥ सोलहसै मैं छःसै रहई । ताको भेद हंस कोह गहई ॥ जाप अठोतर जब रहि जाई । ताछिन शब्द सुरति मिलाई ॥