भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०६ )

बोधसागर

कछु संक्षेप मैं देऊँ बताईं । कहाँ कहीं कछु वर्णि न जाईं ॥ कोटि कल्प युगजाय सिराईं । मुख अनन्तसो वर्णि न जाईं ॥ ये कछु सूक्ष्म रूप लखाऊँ । कछु कछु शोभा वर्णि सुनाऊँ ॥ अब मस्तकको बणों भेषा । मानों अनंत भानु शशिलेखा ॥ जगर मगर मस्तक उजियारा । वर्णत बने न रूप अपारा ॥ अब नेत्रनको कहीं प्रमाना । मानो अनन्त भान शशि जाना ॥ जिमि कोटिन दामिन लपटानी । जोत अनंतनकी जिमि खानी ॥ वर्णत बने न ताको रंगा । कहाँलग कहीं तास प्रसंगा ॥ नासारूप कहीं प्रचंडा । मानो अन्न अनन्त ब्रह्मंडा ॥ पोहप बास तहांति प्रकटाईं । ब्राण अनंत योजन लग जाईं ॥ श्रवणरूप मैं कहीं बखानी । अनंत सिंध मानो समानी ॥ ता मह कमल अनन्तन फूला । साखा पत्र डार नहीं मूला ॥ ताको शोभा वर्णि न जाईं । कमल रूप तहां अधिक सुहाईं ॥ अब मुख शोभा कहीं बखानी । पिंड ब्रह्मांड तेहिमाहिसमानी ॥ नौ शून्य जहां लग बासा । सो मुख भीतर कीन्ह निवासा ॥ लोक अनंत देखिये ताही । सर्वाकार रूप है जाही ॥ पुर्ररूपका बणों भाईं । वर्णत बने न होय दिठाईं ॥ पुरुष शोभा अगम अपारा । मुख अनंत नहीं पावे पारा ॥ चिकुर शोभा कहीं बुझाईं । कोटिन रवि शशि रोम लजाईं ॥ कोटिन चंद सूर प्रकाशा । एक एक रोम अनन्तन भासा ॥ पुरुष अंगका करौ बखाना । रचना कोट तासुमों जाना ॥ श्वेत अकार पुरुषको अंगा । फटकबर्ण देहीको रंगा ॥ शब्द स्वरूप पुरुष है भाईं । वणों कहा वर्ण नहीं जाईं ॥ जहां लग जीव बुन्द है भाईं । ताकर भेद कहीं समुझाईं ॥ जीव अनन्त बुन्द सम जानो । अमी सिन्धु पुरुष पहिचानो ॥