भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पञ्चसुत्रा

( २०७ )

यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥ सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥ तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥ जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥

साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।

ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥

लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।

पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥

सुक्ति वचन-चौपाई

हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥

अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥

ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥

सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥

करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥

सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥

और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥

कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥

तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥

जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥

जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥

जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥

जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥

जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥