कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1357, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसुत्रा
( २०७ )
यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥ सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥ तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥ जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥
साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।
ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥
लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।
पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥
अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥
ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥
सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥
करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥
सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥
और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥
कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥
तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥
जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥
जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥
जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥
जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥
जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥