भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1395, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1395

आत्मबोध

( १९ )

ये सदानिर्द्वन्द्व कोइ द्वन्द्वव्यापेनहीं, गुरुदेवकेशब्दतेस्मृति लागी॥ तत्त्वस्मृति अरुगत सबगुण किया, प्रकटी अग्नि सब भर्म भागा । कहैं कबीर संसार सब गलत है, नहीं ज्ञानका ओढना सदा नागा । नरकका जीव सब नरकमें मिलरहा, नरकविन और नहिं बात आवै । नरकमें उपज्या नरकमें खपेगा, रैन दिन नर्कके माहिं ध्यावै ॥ शील अरु साँच संतोष सूझै नहीं, इन्द्रिया द्वार रस जहर पीवै । कहैं कबीर नर सही सो मरेगा, बिना हरि आसरे कहाँ जीवै ॥ नाम गुरुदेव अरु शिष्य है नारिका, कपिज्यों नाचता फिरत भाई । देत है ठान तब करत उनमाद नर, बन्दगी करत है चित्त लाई ॥ करत सँघार अरु खानको देत है, गुड अरु सूठ बूरा विसाई । कहैं कबीर यह अकिल अज्ञानकी, कहत गुरुदेव नहीं लाज आई ॥ बारहि बार मन पवनको सोधि नर, पाँच प्रमोधि करि नाम लीजे । भांग अरु तमाकू खाय अफीमको, कालके जालमें न्याय छीजे ॥ भांगकी तोरमें रैन दिन फूलिया, भजन प्रतापका सुख नाहीं । कहैं कबीर सुनु शब्द साँचा कहूं, समझविचार करि देख माहीं ॥ कहनको साथ अरु व्याध छूटैनहीं, कोटिमें पाव या देख भाई । खेत अरु कुवा फिर व्याज बाढो करै, बलधिया हाँक करि देत खाई ॥ नामको फेरि करि जगत धूता सबै, नागिनी नारि घर बार पूरा । कहैं कबीर मन माहि फूला फिरै, काल शिर बाजि है देख वूरा ॥ प्रतिग्रह झेलता डरता नाहिं है, कौन गति होइ है जीव थारी । होयगा ऊंट अरु बाड़िको चरैगा, सो डरता फिरैगा बन सारी ॥ पायकी पोटको डारिरे पापिया, पछै भी भार तलब है भारी । कहैं कबीर नर अंध चेतै नहीं, बात सांची कहूं लगे खारी ॥ साधु जो होय तो व्याधको नाश कर, व्याधके नाशते साधु होवै । वासना व्याधि सब जीवको दहत है, बिना गुरुदेव कह कौन खोवै ॥