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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आत्मबोध

( १९ )

ये सदानिर्द्वन्द्व कोइ द्वन्द्वव्यापेनहीं, गुरुदेवकेशब्दतेस्मृति लागी॥ तत्त्वस्मृति अरुगत सबगुण किया, प्रकटी अग्नि सब भर्म भागा । कहैं कबीर संसार सब गलत है, नहीं ज्ञानका ओढना सदा नागा । नरकका जीव सब नरकमें मिलरहा, नरकविन और नहिं बात आवै । नरकमें उपज्या नरकमें खपेगा, रैन दिन नर्कके माहिं ध्यावै ॥ शील अरु साँच संतोष सूझै नहीं, इन्द्रिया द्वार रस जहर पीवै । कहैं कबीर नर सही सो मरेगा, बिना हरि आसरे कहाँ जीवै ॥ नाम गुरुदेव अरु शिष्य है नारिका, कपिज्यों नाचता फिरत भाई । देत है ठान तब करत उनमाद नर, बन्दगी करत है चित्त लाई ॥ करत सँघार अरु खानको देत है, गुड अरु सूठ बूरा विसाई । कहैं कबीर यह अकिल अज्ञानकी, कहत गुरुदेव नहीं लाज आई ॥ बारहि बार मन पवनको सोधि नर, पाँच प्रमोधि करि नाम लीजे । भांग अरु तमाकू खाय अफीमको, कालके जालमें न्याय छीजे ॥ भांगकी तोरमें रैन दिन फूलिया, भजन प्रतापका सुख नाहीं । कहैं कबीर सुनु शब्द साँचा कहूं, समझविचार करि देख माहीं ॥ कहनको साथ अरु व्याध छूटैनहीं, कोटिमें पाव या देख भाई । खेत अरु कुवा फिर व्याज बाढो करै, बलधिया हाँक करि देत खाई ॥ नामको फेरि करि जगत धूता सबै, नागिनी नारि घर बार पूरा । कहैं कबीर मन माहि फूला फिरै, काल शिर बाजि है देख वूरा ॥ प्रतिग्रह झेलता डरता नाहिं है, कौन गति होइ है जीव थारी । होयगा ऊंट अरु बाड़िको चरैगा, सो डरता फिरैगा बन सारी ॥ पायकी पोटको डारिरे पापिया, पछै भी भार तलब है भारी । कहैं कबीर नर अंध चेतै नहीं, बात सांची कहूं लगे खारी ॥ साधु जो होय तो व्याधको नाश कर, व्याधके नाशते साधु होवै । वासना व्याधि सब जीवको दहत है, बिना गुरुदेव कह कौन खोवै ॥

( २० )

बोधसागर

कतरनी कपटदिलबीचते दूरिकरि, सांचकी नापनी हाथ लीजै । कहैं कबीर यों होय निर्बासना, निर्मला तत रस नाम लीजै ॥ मगनहोयविश्वासधरिध्यानअलेखको, लिखाहैलेखसोमिटैनाहीं । किया है कृत कहु मेटिको करिसकै, दुखअरुसुख या देहमांही ॥ टहलुवा संग दोय टहल करबो करै, आपनी आपनी बेरि आवै । कहैं कबीर यों जानि निर्भय रही, किया है कृत सो कहा जावै ॥ कियासो हुआ अरु करै सो होयगा, जीव क्यों कल्पताफिरैभाई । लिखाहै अंकसो मेटिको करिसके, बिनाहै रिजक सो दियाजाई ॥ गहो विश्वास एक समरत्थ धनीका, आनको छाड़ि अलेखधावो । कहै कबीर सब कल्पना दूरिकरि, पैसिदिलमाहि दिलदारपावो ॥ जीवको जक नहीं रैनदिन पचतहै, करमकी रेख सोई पाइहै रे । तनकी भूख सहल है बावरे, मनकी मेर नहीं धायहै रे ॥ आपना कृत तो दृष्टि नहिं देखता, पारके भागको रोयहै रे । कहैं कबीर यों रतनको खोय करि, जीव अज्ञानमें सोयहै रे ॥ आपनी अग्निमें आपही जलतहै, दोष कहो कौनको दीजिये रे । संत तो चन्द्रज्यों अंगशीतल सबै, जीवआपही आपमें छीजियेरे ॥ नीरके पीयेते प्यास मिटि जात हैं, डूबि मरै तो दोष कैसा । कहैं कबीर ये दोष कहु कौनको, जीव पाताल लै न्यायबैसा ॥ कामकी अग्निमें जीव सब जरत हैं, ज्ञानविचार कछुनाहिंबूझे । खोय प्रतीत अरु बोय बाजीदई, शब्द मानै नहीं काल सूझे ॥ झूठको थापि करि सांचको उत्थपै, झूठकी पक्षको गहेगांठी । कहैं कबीर नर अंधचेतै नहीं, कालकी चोट यों खाय डाठी ॥ कामबलवानजगमाहिं योद्धासबल, बीजविस्तार तिहुँलोककिया । स्वर्गऔमृत्युपाताल सबघेरिया, जीवजलथल सब मारिलिया ॥ खंडब्रह्माण्ड सो जीव सारागया, रहा कोइ एक जो कोटि माहीं ।

आत्मबोध

( २१ )

कहैं कबीर गुरु शरण गहि ऊबरा, सो विषधारमें बहा नहीं ॥ करै प्रतीत सो खाय खोटा सही, रहै निर्भय तहां चोर लागै । अग्रिके संगमें ज्योंधीवपिघला चले, कामिनी संग यों कामजागै ॥ काम बलवान सब जीव अंधा किया, पडा।मनस्वार्थी संग झूले । कहैं कबीर कोइ संतजन ऊबरे, नाम निर्वाण नहि पलक भूले ॥ नैनकी चोट तो बहुत करडी बहै, चोटसूं ऊबरे संत कोई । शील सन्नाह करि ज्ञानको खड्ग ले शब्दगुरुदेवके सुरति पोई ॥ शब्द विचारका कोट नीका किया, तासुके ऊपर चोट नहीं । चोट तो तासुको लागिहै आत्मा, कपटकी कतरनी रहैमाहीं ॥ जीवके बांधने एक नारी बनी, दूसरा और नहीं बन्ध है रे । ज्योंचोरको रोकने एक खोडा घना, नहिंकाठविना दूसराफंदहैरे ॥ ऊबै एककोई कोटिमें संत जन, कीलको काटि हरिनाम लागै । कहैं कबीर फिर फन्दमें ना पड़े, शब्द गुरुदेवके सुरति जागै ॥ तीनही लोक तहाँ एक नारी बनी, स्वर्ग अरु मृत्यु पाताल माहीं । चारहुँ खानका जीव परबस पड़ा, नारिविन दूसरो फन्दनाहीं ॥ मृत्तिका एक और घट बहु भांतिके, मोहिनी सकलमें एक दीसै । कहैं कबीर कोइ सन्त जन ऊबरे, दूसरा जीव सबकाल पीसै ॥ नारिभगद्वारमुख बिन्दुनहिंदीजिये, जगतकीकस्ताननहिं जोरभाई । ज्ञान वैरागि अरु भक्तिसो पलटिये, एकदिन काजसो सिद्धपाई ॥ पांचको उलटि मन अरु पवनको, संत अनेक यों पार हुआ । सहजही सहजदरिआवमाहींमिला, कहैं कबीर ते नाही जूआ ॥ दास मनोहर नहीं यकरंग रहत है, करै किरकंट ज्यों रंग केता । गहै वैरागअरु चढे आकाशको, गिरे धरनिमाहिं फिर नाहिं चेता ॥ मानकीतानमें खायगोतासही, कांचअरुस्फटिक ज्यों फूटिजावै । कहैं कबीरजनहीर कहैं पाइये, इन्द्रियाद्वारमनउलटि आवै ॥

( २२ )

बोधसागर

मिहरकरमिहरकरमिहरकर महाबली, जीवकूं शरणअब राखतेरी । पिसनपांचप्रबल सोबसि मेरे नहीं, सन महानंतकी सबल फेरी ॥ तरसअब कीजियेसुख मोहिदीजिये, दयाकरिजीवकोराखिलीजै । दासकबीरकी बिन्ती साम्भलौ, देवकरुणा मई दरश दीजै ॥ साईं बारही बार मैं कहतपुकारिके, दरदसों दरसदेओ नाम तेरा । पाचको नाथि करि साथराखौसही, विनादीदार दुखप्रानमेरा ॥ काल अकरालकी चोटजोराबहै, विनानिज देवकहो कौन राखै । दास कबीर यह बीनती करत हैं, बारहीबार रस राम चाखै ॥ तुही तू तुही एकसमरथ धनी, तुम विना और कोइ नाहिं मेरे । काम अरु क्रोधमदलोभ वैरी सबल, रैन दिनजीवको रहैं घेरे ॥ त्राहि पुनि त्राहिमें रैन दिनकर हूँ, मेहरिकरि आपनीशरणलीजै । दासकबीर यह बीनती करत है, देवकरुणा मई नाम दीजै ॥ होय निरपक्ष सबपक्षकूं त्यागकरि, रहै मस्तान गुरुज्ञानमाहीं । शील अरु सांच संतोष हृदयधरै, कपटकरतूतके निकट नाहीं ॥ कपटकरतूति तहाँ रामराजी नहीं, सांचकरतूति सब साधु गावैं । कहैं कबीर यक सांचको ले रहो, वेद कितनैं सब साँच गावैं ॥ जगत् अरु भेषके पक्षमें ना पड़े, रहैनिर्पक्ष सोइ युक्ति योगी । फेरिमनपवनको घेरि पांचोपिसन, प्रेमसुखधामजहांप्राणभोगी ॥ जहाँ आयो तहाँ दुख है बहुघना, पक्षकीलाय सब जीव छीजै । कहैं कबीर कोइ सन्तजन सूरमा, होय निर्पक्ष रस अगम पीजै ॥ राम निर्पक्ष निर्पक्षही साधु है, होय निर्पक्ष निर्पक्षही माहीं । साँचको परसि अरु झूठको त्यागिये, साँचकी पक्षकहुँदागनाहीं ॥ साँच सहजैतिरे झूठमें बह मरे, झूठ प्रपंच सू जगत भाता । कहैं कबीर कोई संतजन जोहरी, छाड़ि प्रपंच निजनामराता ॥ भेषको पहरिकरि भर्म भूलैमती, भेष पहिरे कछु सिद्धि नाहीं ।

आत्मबोध

( २३ )

काम अरु कोध मदलोभमाहीघणा, शीलअरु सांचसंतोष नाहीं॥ कपटके भेष सो काज सूझे नहीं, कपटको भेष नहीं राम राजी । कहैं कबीर नरसांच करनी विना, कालकी चोट पौखायताजी ॥ भेष अवधूत अरु धूत माही वसे,जीवकूँ बावला करि दिआरे । नहिंबोलनेसुधिअरुचालनेखबरिनहीं,बशिनहींतहाँपांचवलझियारे॥ घाटियांदोयतहांतहुत साधनी, सांकरीतासुकेबीचमेंउलझियारे । कहैंकबीरनरपन्थको भूलि करि, सुरतिका सूतनहिं सुलझियारे ॥ तिलकमाथे दियाहाथमें लाकड़ो, भजनका भेदतो नाहिं पाया । शीलअरुसांचसंतोषअन्तरनहीं, कनक अरु कामिनीजहरखाया ॥ गूदड़ीपहिनकरिबगआसनकिया, माछलीगटकनेकोसुरति भारी । कहैं कबीर जब काल गढ़घेरिहै, कौन गति होयगी जीवथारी ॥ हाथके माहि तो सुमरनी फिरत हैं, जीभहूँ फिरतहैं सुखमाहीं । दास मनोहर तो चहुँदिशफिरत है, मनअरु पवनकी गमनाहीं ॥ निरखता भीति अरुगोरडीछतरडी, नागिनी माहिंफौंकारमेले । कहैं कबीर यह भजन कैसे करै, नीदके आश्रय जीव खेले ॥ शील अरुसांचसंतोषकाभेष करि, क्षमा अरुदयादिलमाहिधारो । झूठ अरु कपट दिलते दूरि करि, सत्यका शब्द सुखते उचारो ॥ साँचका भेष यह देख सतगुरु कहा, संत अनेक यों पार हूआ । कहैं कबीर सुखधाममाहीं मिला, बहुरि विषधारमें नाहिं मूआ॥ भेषकूँ पहिरि करि जगतधूता सबै, नामका आसरा नाहिं नेरा । औषधोंबूटियांलागिभर्मत फिरै, क्यों छूटिहै जीवका भर्म फेरा ॥ मारता धातु हरताल तांबे सुरा, यंत्रा मंत्रा बुधि खोई । कहैं कबीर नर स्वांगकोपहिरि करि, अंतको बेरियोंचलया रोई॥ भेषकोपहिरिकरिजगतधूतासबै, एकनामनिर्वाणउर नाहिं आशा । औषधो बूटियांलागिभर्मत फिरै, क्योंछूटिहैं जीकाकाल फाँसा ॥

( २४ )

बोधसागर

और डहकायकरिआप डहका फिरै,जीवका भलाकयौहोय भाई । कहैं कबीर नरस्वांगकोपहरिकरि, साधुकी राह नहिं हाथ आई ॥ संत पूरा मिलै जीवको तारि है, वासना जीवकी खोवे । नाम उपदेश अरुभर्मनादूरिकरि, पाचको पलटि भवपार होवै ॥ मिलै अध बेसरा इन्द्रिया स्वार्थी, जीवबहकायकरि टूकरखावै । आपुभव सिन्धु औ जीवको लेवहै, कहैं कबीर नहिं पार पावै ॥ योगकी युक्ति तौ मूठ समझैनहीं, स्वांगकोपहरिकरि सिद्धहूआ । ज्ञान वैराग अरु दया जाना नहीं, वासना बीज तहां जाय मूआ ॥ मान मस्तान अरुद्रेष माहीघना, आंठि अभिमानकी नाहिं छूटी । कहैं कबीर सो पार कैसे लहै, माहिली वाहिली चारि फूटी ॥ अंधसाधुपदछाडिसंसारमेंघीसपडा, कौंडियॉरुयालमोरतनखोया । जन्म अरुमरनकादुखसिरपरसहा, योंमोहकेमहलमें जीव सोया ॥ अल्पही भोग अरु अल्पही जीवना, ज्ञानविचार कछु नाहिं कीया । कहैं कबीर यों बूडि विषधारमें, छाडि सुखसारको जहरपीया ॥ प्रेमके पंथको भूलि उलटा पडा, बँवनको खायकर फूलि बैठा । गयो वैराग अरु वन्दगी नाबन्यो, कर्मके कीचमें गला हैठा ॥ नरकमें जानकी टेक गाढ़ी गही, दोष निदौषको धार माही । कहैं कबीर सो सुखसार कैसे लहै, छांडिसुखसारकूं जहरखाई ॥ ताहि उगालकरि फेरले खात है, देख मनकूकरा पडत भारी । शब्द अरुचेसला कानिमाने नहीं शर्म सूझै नहीं होत ख्वारी ॥ जहाँका ऊपजा तहां फिरि आग्या, मायकारूप फिरिनारिकीया । काल अकरालकी चोट छूटै नहीं, कहैं कबीर धिरकार जीया ॥ नामनिज नीरविन पीर पावै नहीं, पाचसोरॉंचिकरिसांचखोया । शहदकी बुन्दके रस प्रवसभया, यो मोहके महलमें जीवसोया ॥ कामअरु कोथ मदलोभमाहीघना, कनक अरुकामिनीरंगराता ।

आत्मबोध

( २५ )

कहैं कबीर सोइपार कैसे लहै, कालकी चोटकूँ फेरि खाता ॥ अंध ज्ञानवैरागअरु भक्तिको कहत है, रहसतोएकनहिंहाथ आवै । फिरत कडछी जैसे पाकके बीचमें, रसके स्वादको नाहिं पावै ॥ ज्योटिलीको देखिकरिदिछीकीनकलकहै, तासुकीनकलकोइ और ठाने । कहैं कबीर कोइ भेद पावै नहीं, भेद तो देखने द्वार जानै ॥ वेद वेदांत अरु कथत भागवतको, अर्थ अनुभवतणांकरतनीका । ज्ञानवैराग अरु भक्तिको कहत है, रहतर नामविना सबै फीका ॥ कामिनीकुबुद्धिउरमांहिकांटाघना एकनामनिर्वाणउरनाहिंटीका । कहैं कबीर सो पार कैसे लहै, कनक अरु कामिनी हाथबीका ॥ रांडिया खेलेमें रांडिया होयगा, खेले अवधूतका होय न्यारा । खान अरु पान वशी ते जीवहै, कहो क्यों होय भौ सिन्धु पारा ॥ चालताजमीपैअरुकहत आकाशका, कहोक्योंमानिहैसाधु सोई । कहैं कबीर यह संतका शब्दहै, कहै ज्यों रहै अवधूत सोई ॥ कहत वैराग अरुराग छूटै नहीं, पांचसों राचिकरिजीव खोया । इन्द्रियास्वार्थी शब्दअनुभव कथै, पदसो बांधिकरिजीव खोया ॥ नाम निर्गुण किहै रहत है गुणमई, शिष्य शास्त्रातणी भूख भारी । कहैं कबीर जब काल गढ़ घेरिहै, कौन गति होयगी जीव थारी ॥ राग अरु द्वेष की चौतरा साजि करि, तासुके ऊपरे जीव बैठा । झूठको थापिकरि सांचको उत्थपै, अज्ञानकी केन्द्र गरकपैठा ॥ रागअरु द्वेषका चौतरा खोदिये, ज्ञानकूदाल सोढाह भाई । कहैं कबीर तब साधु पद पाइये, मुक्तिके महलमें सहज जाई ॥ पांच अरु तीनको करत निषेद नरमहलचौथा तणी बात गावै । रहत रजमा बिनाकहतर झूठी सबै, होय अवधूत तो कहत भावै ॥ जेनाम रसना रटैपापपलमें कटै, कनक अरुकामिनी त्याग दोई । कामअरु क्रोधमदलोभ को त्यागि नर, कहैंकबीरयोंसहज सोई ॥

( २६ )

बोधसागर

कहतको सूर अरु रहतको कूडहै, रहतबिनकहतकिसकामआवै । रहत रजमा विना कहत झूठी सबै, पांच फूटा फिरै काल खावै ॥ पांचको वसकरै नाम हृदय धरै, मुक्तिकी राह कयोंसहजि आवै । कहैं कबीर कोई सन्त जन सूरमा, कहत अरु रहत तब एकभावै ॥ ज्ञान वैराग विनु कूफ़फ़ंद टूटै नहीं, ज्ञान वैराग सोकुफ़फ़ंदटूटै । ज्ञान वैराग बिन जीव छूटै नहीं, ज्ञान वैराग सो जीव छूटै ॥ ज्ञान वैराग बिन पीव पावै नहीं, ज्ञान वैराग सो पीव पावै । ज्ञान वैराग बिन काज थावै नहीं, ज्ञान वैराग सो काज थावै ॥ बिनावैरागकहोज्ञानकिसकामका, पुरुषबिननारिनहिंशोभापावै । स्वांगते साहु अरु गति है चोरकी, करै तब चोरिया शिर कटावै॥ भेष तो साधुअरुकुबुधि माहीघणी,कुबुधिको कोथली नाहिं छूटै । शील अरुसाँचसंतोषअन्तर नहीं, कहैं कबीर तब काल कूटै ॥ कहनको साहु असगति है चोरकी,साहुजी कहत नहिं शर्मआवै। झूठही कहत अरु झूठही रहत है, रैन दिन झूठमें जन्म जावै ॥ मानके आसरे फूलकरि बैसिया, इन्द्रियास्वाद मनमाहिं भावै । कहैं कबीर ते साहु कयों बोलिये, यमरायके खेसले खूब खावै॥ ज्ञान वैराग बिन शब्द चालै नहीं, चढ़ कमान बिनु तीर कैसा । उज्वला दीसता द्रव्यखोटकारुपया, तासुकाकौनगनि देह पैसा॥ कठिन करतूतिपुनि कहाका होत है, रहतर जमाबिनाशब्दझूठा। कहैं कबीर जन काजतबही सरे, पाँच मन मनसा फिरै पूठा ॥ तुरंग रागातलै कान मोती झुलै, पाँच हथियार तहां बांधिसोई । मालमोतियातणीसौजआछावनी,पणिबिनाकारण रहे पुरुषकोई॥ नारि सुख नालहै गर्भ तो नारहै, बिना वैराग तो शब्द काँचा । कहैं कबीर ज्यों पुरुष हैहीजड़ा, बिनाकरतूतिनहिंपुरुषसाँचा ॥ शब्द अनुभव करै माहिप्रचोधरे, मन अरु पवनकी युक्तिआनै।

आत्मबोध

( २७ )

ज्ञान चौकस कहे सैन चौथे गहे, सीस सतनामकी छाप ठाने ॥ कनक अरु कामिनी रेख माहीघणी, भायतृष्णातनीमीटिनाहीं । कहैं कबीर सब झूठ ही बोलना, आप है कालकी डाढ माहीं ॥ पवनको साधि करिकरतउपाधिनर, बासना बीजतो नाहिँछीजै । दूध अरु भातफिर ओगरामागता, दास मनोहरका लाडकीजै ॥ कहत है योग अरुभोगको गहत है, योग को मूल तो हाथ नाहीं। कहैं कबीर नर करत आजीवका, खान अरु पान है चित्त माहीं॥ दर्दमन्द दर्दके चोटको जानि हैं, वे दर्दको चोटकी खबर कैसी । पीवकी चोटको विरहनी जानिहै, रैनदिन पीवमें सुरति बैसी ॥ श्रवणअरुनयनसुखवैनमें बसत है, पीवविन और नहिं बात आवै। कहैं कबीर यह विरहनी अंग है, रैनदिन निरखता पंथ जावै ॥ नीर विनुमीनअरुचन्दचकोरविन, सीपकोस्वातिकीएकप्यासा । धरणिके नीर नहिं नेह पपीहरे, विरहिनी एकयों राम आसा ॥ नारिसे पुरुष अरु पुरुषसे नारि है, सुरतिकीडोरज्योंएक होवै । कहैं कबीर यह विरहनी अंग है, रैनदिन पीवका पंथ जोवै ॥ योगकी युक्तिको रोगिया नाल है, रोगकी खानितहां योगनाहीं । कूडिया कंथिया काज सीजै नहीं, कहत कपूर अरुहींग खासी ॥ नाम निर्वाणतहां कामकहाँपाइये, कामनाकुबुधितहांनामकैसा । कहैं कबीर नर जहरको खात है, शब्द अनुभव करेफूलिबैसा ॥ योगकी युक्तिकोरागिया नाल है, रोगकी खानि तहां योग कैसा। कनकअरुकामिनीखानगहिरीखरी, तासुके ऊपर जीव बैसा ॥ मूलिया खायकरि करतउदगार नर, कहत कपूरकी बासआवै । कहै कबीर एका दृष्टि देखये, कनक अरु कामिनीजहर खावै ॥ शब्दको मानिहै कौन पर्माण है, वेदांत सिद्धांत तहां एकमेला । त्याग वैराग अरु शीलसंतोषविनु, करतज्योंठेलियाबालखेला ॥

( २८ )

बोधसागर

पीवको परसता कष्ट बहु होत है, पीवकी सेज नहिं खेलहांसी । कहैं कबीर रहत रजमा बिना, शब्दअनुभवकियाबांधिजासी ॥ त्यागवैरागअरुहरतरजमाबिना, शब्दअनुभव किया कौन मानै। नूर अरु तेज मन पवन कू कथतहै, महल चौथातणी बातठानै॥ खेतनिपेदे हुई चौडेही जानिये, शीलअरु साँच संतोष आवै । कहैं कबीर एता दृष्टि देखिये, वेदांत सिद्धांत सब साधु गावै ॥ सोवता होय तो जागि है बापुडा,जागता सोवता कहाँ जागै । मान मनमाहिं अभिमान ज्ञानी हुआ,शब्दअवधूतकाकहाँ लागै॥ कहतअरु सुनतसबअवधिपूरीभई, अनुपाइनीभक्तिनिहिहाथआई । कहैं कबीर ये ज्ञान सब थोथरा,जीवका भला क्यों होय भाई ॥ कहतअरुसुनत सबअवधिपूरीभई, उलझिसुलझिनहींएक आंटा । शीलअरुसांचसंतोषअन्तर नहीं, कामनाकुबुधिउरमाहिं काटा ॥ अग्निकेसंगज्योलारखपघिलतचलै, योशब्दकोसुनतटुकचेतहोवै । कहैंकबीरनरपढै जबआंतरा, लाल की लाखनहिं उलटि जीवै ॥ करत आचारअरुखबर तनकी नहीं, सदा नौ द्वारमें बहै आमैं । नाकमें रीट अरुआँमैंकीचड़ा, सदा ठेठी बहै कान तामैं ॥ हाडमुखलार अरु मूत्र विष्टा बहै,करत अभिमान तू देख जायैं। कहैं कबीर नर चेत सोवै कहाँ, होयज्योंपाकभजिसन्त नामैं ॥ फोड़िपाषाण को दूजी हरिबीच करि,आपकर्ता हुआ देखु दूजा । तोड़ि सरजीव अरु पूजिनिर्जीबको, कहो क्यों मानिहै रामपूजा॥ कर्म मार्ग चढै सांच बूझै नहीं, मानता है मैं करत पूजा । कहैं कबीर नर अंध चेते नहीं, फूटि चारो गई पडा दूजा ॥ जागती जोति तहाँ छूत लागे नहीं, छूत लागै तहाँ भर्म भाई । कर्म अरुभर्ममें जीव जूझै सबै, चार अरु असी कापडा खाई ॥ शोचके शब्द का भेद पावै नहीं, इन्द्रिया स्वादसब जीवलागा ।

आत्मबोध

( २१ )

कहैं कबीर तहाँ जागती जोति है, कर्म अरु भर्म सब दूर भागा ॥ हृदके जीव सो बोलना कौनसा, बात बेहदकी कहा जानै । प्रवृत्ति प्रपञ्चमें रैन दिन जूझना, शब्द अवधूतका कहा मानै ॥ दृष्टिदीसै तहाँ कालका जाल है, नामनिवांण नहीं हाथ आया । प्रेम प्रकाशका भेद पाया नहीं, कहैं कबीर तहाँ सहज विलाया ॥ आपनी आपनी खालमें सबमस्त है, चार अरु असीका जीवसारा । करत आचार तहाँ गरकमनहोयरहा, होय उदास नहीं होय पारा ॥ सूकरा कूकरा तनको पायकरि, झूकरा कूकरा भोग भावै । कहैं कबीर यों नर्कमें झूलना, बिना सतसंग नहीं पार पावै ॥ इशक साईं तहाँ तर्क वजूद है, इशकवजूद तहाँ नर्क साईं । योगिया यतियां शेष संन्यासियां, भेषहूं देखिये बहुत माही ॥ बिनाही बन्दगीविहिस्त पावैनहीं, बन्दगीकरत नहीं खेलहासी । कहैं कबीर ये इशक वजूद का, दोजरखकी राहको लिया जासी ॥ तर्क वजूद सो इशक साईं करो, छाड़ि बदफेल रस एक पीजे । मनीको मारिदिलमाँहि नेकी गहो, भिस्तिकी राहकूँसोधिलीजे ॥ सबआपपैदाकियाघटनहींफोड़िये, फर्जन्दसब आपका देखभाई । कहैं कबीर यह सतका शब्द है, विहिस्तके राह को सहज जाई ॥ मियाँजीजीवतामारिकरिकहत हलालहुआ, सुदीरनहीं खूबखाना । मिहरिको दूरिकरिकहर दिलमेंधरी, दोजरखकीराहको सहीजाना ॥ नफसके वास्ते कुफ बहुत करतेहौ, ज्वाब दर्गाहमें भरै कैसा । कहैं कबीर इन्साफ तब होयगा, मार दर्गाह में खूब वैसा ॥ मियाँजीराहकोछाड़िवेराहक्यों, चलतहौ ज्वाबदर्गाहमेंनाहिंआवै । करत बदफेल दिन चारिके वास्ते, देखि वजूद क्यों शाक खावै ॥ सुसलमानईमानसो पाककमालभरो, जीवकोमारिकरिनाहिंखाना । नकसशैतानको मारिकिरिदूरिकर, बावरे कहैंकबीरयोंभिश्तिजाना ॥

( ३० )

बोधसागर

मियाजीआबकानीपनाहक दर्गाहमें, पिशाबकानीपनाहकनाहीं । कहर कोडुरि मिहरदिलमें धरो, यो बन्दगी करत कबूल साई ॥ पांचबिसमिलकरो पाकरोजा धरो, गुस्सेका गला तूका भाई । कहैं कबीर यह सत्यका शब्द है,विहिस्तकी राहकं सहज नाई॥ जैनके मांहि तो खेन पैदा हुआ, खेनका रोग तो जाय नाहीं । कण बिना तूसडा कूटते हैं सदा,कर्ममें लीन नहिं सांच पाई ॥ दयाको कहै अरु सदा निर्दई रहै, तोडि सर्जीव नरजीव पूजै । कहैं कबीर यों जन्मका आँधला, सांच अरु झूठ नाहिं सूझे ॥ खेनके रोगते श्वांस बैठे नहीं, श्वांस बैठे बिना कहां साता । नामनिज औषधीनिकट न्यारीरही,छाडि निजऔषधी कर्मराता ॥ आपप्रकाश बिन कहा नहीं ऊपजे, कालके चक्रमें खाय फेरा । कहैं कबीर यों जैनमें खेन हैं, नाम निर्वाण नहिं निकट हेरा ॥ कौड़ियां कौड़ियां जोड़ी करि एकठी, खाय खचै नहीं मूलपापी । धरै घरमाहिं फिर व्याज बाढो करै, रैन दिन माहिले बुरीथापी ॥ दोयगा सर्प अरु भूत भर्मत फिरै, खाय खचै नहीं मूल भाई । कहैं कबीर जब ज्वाब कैसे भरे, यमराज के घेसले खूब खाई ॥ शब्द उपदेश मैं सबनकं कहत हूं, समुझिकरिआपनासूखलीजे । राग अरु द्वेषकूरूरिसब छोडिके, आपने जीवका भला कीजे ॥ आय सतसंगमें कुबुधिको दूरिकरि,सुबुधि सन्तोषउरमाहिंधारो । कहैं कबीर यह शब्द निर्दोष है, आपने जीवका काज सारो ॥ टेरि पुकारि सब जीवसों कहत हौं, सत्यका शब्द तुम गुनलोई । गुरुदेव करतूत गुरु देवही पाइये, शिष्यकरतूतसो शिष्य होई ॥ शिष्य दुर्बुद्धि गुरुदेव क्या दोषहै, शिष्य अवधूत गुरुवार वैसा । करै करतूति सो आपनी पाइहै, शिष्यगुरुदेवका काम कैसा ॥ शब्द सांचा कहूं गुप्तका कामना, सांचके शब्दको लाज कैसी ।

आत्मबोध

(३१)

आप अरु बाप गुरुदेव अरु शिष्य है, करै करतूतसो पायतैसी॥ सांचके खेलकूँ सांच मीठा लगै, कपटके खेलकूँ सांच खारा । कहैं कबीर ये एकठे ना रहे, दिवस अरु रैन प्रकाश न्यारा ॥ आपने आपने सांचसो खेलना, कपटका खेल नाहीं काम आवे। कपटके खेलसो काम कोई नासरै, अंतकी बेरदुख प्राणपावे ॥ बाहिरा भीतरा साफ दिलको करो, मैलको धोय रसराम पीजै । दास कबीर यों कहत पुकारिके, कपटकी कोथली दूरि कीजै ॥ सांच करणी करै सांच मुखऊचरे, दम्भ अरु कपटको दूरिडारे । शील अरु सांच संतोष हृदयधरै, कामअरुकोधमदलोभमारै ॥ कनकअरु कामिनी त्यागि साई भजै, रामतेजे जनाराम गावै । कहैं कबी जनपार तेही लहै, कालकी चोट फिर नाहिं खावै ॥ सांच करनी करै दम्भकूँ परहरै, सांच करतूतको संत गावै । सांच करनी रहै सांच मुखते कहै, सांच दर्गाहमें दाद पावै ॥ दया अरु शील संतोष सांचे गहै, झूठ दर्गाहमें दाद नाहीं । कहैं कबीर जन्म झूठहै जर्दरू, सांचके बीच है आप साई ॥ सांच करनी बिना काज सीझे नहीं, झूठप्रपंच सो जीव राजी । मानमस्तान अरु खानहै लूनकी, कालकी चोट यों स्वायताजी॥ शब्द चर्चा नहीं ज्ञानहै घेसला, देखि शैली करो पेट मोटा । कहैं कबीर यों जानि जड़होयरहो, सुमिरिसतनाममतखायखोटा॥ मिलै जो साधुतहाँ बोलना खूबहै, होय बकवाद तहाँ ज्ञान टूटै । साधुके बोलने प्रेम सुख होत है, मूढके बोलने काल कूटै ॥ रैनदिन चित्तकी वृत्तिकूँ घेरिये, युक्ति जाने तिको युक्त योगी । कहैं कबीर मनपवन कूँ फेरिकरि, सदाआनन्दरस नामभोगी ॥ सबकपटकूँ दूरिकरि सांचकरणीकरौ, कपटकरतूतिनिहिं पारपावे। कपटकरतूतसो काज कोई नासरै, सांचकरतूतसो काज थावे ॥

(३२)

बोधसागर

सांचकरतूतितहांआप हाजिर खड़ा, कपटकरतूततहां आपनाहीं । कहैं कबीर सब संतजन कहत हैं, वेद कितेबहु देख माहीं ॥ नामनिर्गुण कहैं रहत हैं गुणमई, सुखसूं कहत नहिलाज आवै । कामअरुकोधघटमाहियोधासबल, ज्ञानअरुध्याननहिरहनपावै ॥ जासुके झूपडे लाय लागेसहीं, झूपडा मांहि क्या रहै भाई । कोधसी अग्नि तहाँ देखु प्रकटभई, कहैंकबीर यह कैसी कमाई ॥ कहतभी खूब जो रहित रजमारहै, कहतभी खूब जो सांचबोलै । कहतभी खूब सबत्यागि साईभजे, कहतभी खूब मनमैल खोलै ॥ रहत रजमाविना नफा नाही कछु, कहा आकाशका शब्दबोला । कहैं कबीर सुनु शब्द सांचाकहूं, कहा जो प्याजकाछोतछोला ॥ सांचके शब्दको सुनत निंदाकरे, झूठके शब्दसूं प्यार होता । झूठ अरु सांचएकठे क्यों रहें, जमीं आस्मान नहीं एकहोता ॥ प्रवृत्तिप्रपंचसब जमींका खेलहै, गुणातीतअवधूतका खेलनाई । कहैं कबीर कोइ रीझभावेखीझिहै, कहांगे सांच नहिं झूठ भाई ॥ सांचके शब्दमें पक्ष कोई नारहै, पक्षतो सांचका शब्द कैसा । सांचके शब्दमें पाप लागे नहीं, झूठके शब्दमें पाप वैसा ॥ साधुकी चालतो सांच सबकहतहैं, झूठतो साधुकीचाल नाही । कहैं कबीर यह खेल आकाशका, साधुपद दूरकहूं निकटनाहीं ॥ सांचका शब्द तो एकही बहुत है, बारही बार नहीं बकनाजी ॥ पाषाणके बीचमें तीरलागेनहीं, यों मूढसों बहुत नहीं झकनाजी । रैनदिन होत घनघोर वर्षाघणी, चीकटे घडे नहिं पुनगलागै । कहैं कबीर तहाँ कर्मकी जोड है, जीवजड होरहा कहां जागै ॥ पाषाणके बीचमें तीर बेधेनहीं, बाहनेहार क्या दोष भाई । सुनतही सुनत सबअवधि पूरीभई, इन्द्रियाद्वार मनजहरखाई ॥ कर्मसत्राहकी कडीसजडी जड़ी, ज्ञानगोली तहाँ नाहिं लागै ।

आत्मबोध

( ३३ )

कहैं कबीर तहाँ कर्मकी जाड है, जीवघोर निद्रापड़ा कहाँ जागे ॥ आपनी २ बीज अंकूर है, करै करतृति सो पाय तैसी । बोई है आम तो आम्बफल खाइहै, बोई है बबूलतो सूलबैसी ॥ पापअरु पुण्य दोउबीज अंकूर हैं, वाहिसो बीजफल हाथआवै । कहैं कबीर ये संतका शब्द है, करै करतूतसो नाहिं जावै ॥ सदगति जीवको भलीमति ऊपजे, दुर्गतीजीवकी बुरी आवै । सदगति जीव सुखसार साई भजे, दुर्गतिजीवमिलिजहरखावै ॥ सदगतिजीव सतसंगजनबन्दगी, दुर्गतिजीव विषधार पैसा । कहैं कबीर ये बीज अंकूर है, बाहि है बीज फलखाय तैसा ॥ बुराभी आपना आपही करत है, भला भी आपना आप सारै । आपही आपको पारले ऊतरे, आपही आपको बोरि मारै ॥ आपही उलझिकरि बहेविषधारमें, आपहीसुलझिहरिनामलगौ । कहैं कबीर ये भाव सब आपना, आपही सोयकरि आपजागै ॥ जीव अज्ञान सबअंध चेतै नहीं, बहे विषधारमें खाय गोता । पाप करनी करै नाम उरना धरै, पापके बीचसों फिरै रोता ॥ यार आशनासूं प्रीतिअतिकरत है, रामके जनोंकी करतहांसी । कहैं कबीर नर ऊबरे कौनविधि, मारिहैं काल गलडार फांसी ॥ मोहके वृक्षमें जीव सब मगन है, देत हैं अंड तहाँ हर्ष माने । काल अकराल तहाँ रैनदिनतकतहै, चलतहै चक्रतहैं सकलभाने ॥ राव अरुंरकसबएकनाके चले, नहिंपावअरुपलककी खबरजाने । कहैं कबीर सोइ संतजन ऊबरे, रैन दिन रामही नाम गावे ॥ मोहिके माँहि सब जीव मस्तान हैं, खान अरुपानमें मगन हुआ । नारिसूंपुरुषअरु पुरुषसूंनारिहै, अरसअरु परसमिलि नाहिंजुआ ॥ नारिके रैनदिन ध्यान है पुरुषका, पुरुषको ध्यान है नारिकेरा । कहैं कबीर यों जीवसबउलझिया, कहौ क्यों छूटि है भर्म फेरा ॥

बो० सा० ९/

( ३४ )

बोधसागर

नारिकी बासना पुरुषकी मारिहैं, पुरुषकी बासना नारि खोवै । सुरतिमनपवनकोसमिति साईभजे, जन्मअरुमरनतबनाहिहोवै ॥ शीलअरुसांच संतोषकीसेहजले, क्षमा अरुदया दिलमाहिं धारे । नारि अरु पुरुषका काम कैसारहा, कहैं कबीर सो आप तारे ॥ जन्मअरुमरनतोभजनविनुनामिटे, कछुबांटकरिखायतोहाथ आवै । रावअरुरङ्ग सबएक गैले चले, विना हरिभजन सबवाद जावै ॥ बेगही चेतले बावरे मूर्खा, जीवते जीव कछु हाथ कीजै । कहैं कबीर नरचेत सोवै कहाँ, होयगा ढोड़ तब प्राण छीजै ॥ देह तो देख मिल जायगी खेहमें, देहसों काज कछु कीजियेरे । रामका भजन अरु जनोंकी बन्दगी, देहधरि लाहडालीजियेरे ॥ चालती घोड़ियाकाज कछुकीजिये, कौड़ियासाथकछुनाहिंजाई । प्राणके छूटते पलकमें पारकी, कहैं कबीर सुनुचित्त लाई ॥ बीचउजाड़के पुरुषसक भूलिया, सो भर्माता भर्माता कूपपाया । कूपके माहितहाँ नीर तिन देखिये, तिसनीरकेऊपर लीलछाया ॥ पीवना होय तो पीयले बावरे, यों विनशिहै नीर थिर रहै नाहीं । कहैं कबीर फिर नीरनहिं पायहौ, बहुरि बे बानके बीच जाई ॥ दौयदरियावके बीचएककाज है, तासुके बीच एक पुरुष ठाढ़ा । एक दरिआवमें सही सो झूलिहै, करो कोइ बन्दगी करो जाड़ा ॥ जाड़ितो जन्म अनेकके जीवको, बन्दगीकरतसोइ पुरुष पूरा । कहैं कबीर कोइ ब्रह्मदरियावमें, रहत भवसिन्धुते सदा दूरा ॥ घड़ीघड़ीनरकहत पुकारिके, पलकही पलक नरआव छीजै । चेतरेचेत अब अंध सोवै कहाँ, नामभजि नामभजि काज कीजै ॥ आगिलगायाअरुपाछिलाथिरनहीं, बहुरिउपजे सोइ फेरजासी । दास कबीर यों कहे पुकारि करि, नामभजनाम नहिं कालखासी ॥ अंधचेते नहीं अवधि सारीगई, शीसपर कालका हुआ डेरा ।

आत्मबोध

( ३५ )

पलटा साजका कोईनासरा, गिर्दसे कोट सब आइघेरा ॥ नहीं श्रवणसुने अरु नैनभी झरत है, चालता पाँवमें परत आटी। कहैं कबीरकोइकान मानै नहीं, जरा जब योगनी गद्दा माटी ॥ चेतरेचेत अबमूठ क्यासोरहा, सठसब अवस्था जाय बीती। आययमराज जबचहुँदिशिचेरिहै, होयगी तोहिमें बहुत फजीती ॥ देखऔसान यह फेरिपावैनहीं, सुमिरि हरिनामसबतज अनिती। कहैं कबीर संसारकुल स्वार्थी, नहीं परमार्थी छाड़ प्रीती ॥ चेतरेचेत अब अंध सोवै कहा, खोजगुरु ज्ञानमनजागमेरा। तात अरुमातसुनबन्धुयुवतीसखा, कहोकालकीचोटमेंकौनतेरा ॥ येमिलेसब स्वार्थी नाहिंपरमार्थी, तासुके बीचतैं किया डेरा। सबठगोंकावासहै झूठविश्वासहै, काटिमोहफांसीगहोनाममेरा ॥ कहैं कबीर निजनामको सुमिरिले, बहुरि नहिंहोय संसार फेरा। संतसब कहतहैं अंध चेतैनहीं, मोहके महलमें जीव सोवै ॥ देखहीरो जन्म फिरि पावै नही, काँचके राचने काह खोवै। वस्तुनहिं पाइहै बहुरिपछताइहै, सीखसुनि लेहु सतमान मेरी ॥ कहैं कबीरजबकालचपेटिहै, होय छिन एकमें खाक ढेरी। भर्माता भर्माताहाथहीरा चढा, सोकौडियामाहि नै काहि दीधौ ॥ देखहीरोजन्म फिरि पावै नहीं, बड़ीनिधि पायकैतै कहाकीधौ। विनशिहैं पलकमें आशनाहींकछु, रामभजुरामभजुकाज सीजै ॥ कहैं कबीर नरखायखोटामति, मोहके जालमें कहा छीजै। देखनिर्मौलको हाथहीरोचढ़्यो, चेतरे अंध अब कहाँ सोवै ॥ भजोभगवानअरुकरोजनबन्दगी, कौडियारुयालकणिकाहिखोवै। सुखसारहृदयधरोछारको परहरो, सुरतिसुरझाय जौ मुक्तिपावै ॥ कहैं कबीर नर चूक अवसानको, दावँको खोय करि कहाँ रोवै। खतामत खायतू चेतरे बावरे, शीस आई जरा नाम लीजै ॥

( ३६ )

बोधसागर

सत्यकाशन्दसब संतजन कहतहैं, काटिभ्रमजाल भजिरामजीतै॥ देहतो देख मिलजायगी खेहमें, ये मिले सब स्वार्थीसगी नाही । कहैं कबीर जब काल गढ़ घेरि हैं, तब आपने आपने पंथजाही ॥ देह तो देत है तोहिचिंताघणी, सुमिरिहरिनामअबचेत अंधा । करतबहुय नयहविनशिहैपलकमें, यादकरिपीवयमकाटिफन्द । दुःखको रूप अरुराशि औगुन भरी, यादकरहकसुखकहाभूल्यो । कहैं कबीर यादेहसोतरक करि सदा सुख सिन्दुके माहि झूलो॥ देह दुख रूप सुख लेश मात्र नहीं, देहसुखरूपजोनाहिलागै । जन्म अरु मरनकी त्रासतबहींमिटै, काल कांटासबैदूरिभागै ॥ धारि इस कामकोकरहरिबन्दगी, सुवाविषधारमें जीव सारा । कहैं कबीर कोइ कोटिमें ऊबरा, परसि निर्वाण पदहुआन्यारा ॥ गर्भ बासके बीचमें देख रक्षा करी, आबकी बून्दसो पिंडकीया । अन्न पानी सब भस्म हो जातहै, प्राण सूक्ष्म तहांराखिलीया ॥ उबत दशमास तहां पोना ले दिया, कौलकेबोलकरिजन्मपाया । कहैं कबीर नर फूलि संसारमें, बिसरि कर्ताको जहर खाया ॥ दीद बरदीद प्रतीत आवै नहीं, दूरिकी आशा विश्वास भारी । कथा अरु कबित श्लोक रसरी बड़ी, कथैबहुभांतिबूझेअनारी ॥ हृदय सूझे नहीं सन्धि बूझे नहीं, निकटकीबात ले दूर डारी । तत्त्वको छाडिनःतत्त्वको सब कथै, भर्ममें पड़े सब भेष धारी ॥ जटाधारी घने यती योगी बने, पहिर मुद्रा लिये कानफारी । एक मौनी रहै एकत्रक त्यागीरहै, एक दराडी रहै एकब्रह्मचारी ॥ एक नागा रहै सर्व लज्या तजै, एक छेद वजूदको नाथडारी । एक बांधिपगधैघरु निरत करता रहै, स्वांगकेने करे भर्मभारी ॥ एक आकाशद्रष्टा रहै मौनी रहै, एकउर्द्धबाहु रहै नखधारी । एक भोगी रहै भोग भोगत रहै, एक बजरकछोटी कसिकाम जारी॥

आत्मबोध

( ३७ )

एक पग बांधिके अद्द झूलत रहै, एक ठादेश्वरी कष्ट कारी । एकगर्भमरते रहे पञ्चाग्निपतारहे, एक बैठिजलसेज आसनआरी ॥ कहाँ लौं कहूँ बहु रूपकोपेखनो, आप आपनपौ सवनेपिसारी । एक अन्न भोजन तजै दूबरंगनरहै, एकदूध भोजनकरै दूधाहारी ॥ एक लूनछोड़िके भये अलूनिया, एक बैठिके गुफामैलायतारी । एकतिलकमालादियेटोपचोलालिये, एकगुदढीपहरिकरिडिम्भधारी । एक पूजिकै मूर्तीगर्भ भारिधरी, एक शंखधुनिआरतीजोति वारी । सेव कीन्ही सहीदेवचीन्हानही, आत्माछोड़िभये जड़के पुजारी ॥ पूजिपाषान अभिमान अंधाफिरै, सतचेतनसूं बीच यारी । योगी पण्डित बडे सर्वगीता पढे, भर्मकी भीति नहिं टरतटारी ॥ कहै कबीर कोइ सन्त जन जौहरी, मेटि यमफन्द उठे संभारी । इतने विटम्ब सो वस्तु न्यारी रही, ज्ञानकीसुरतिसोल्योविचारी ॥ अगमकोगमकरोध्यानहृदयधरो, चढशून्यकीशिखरकरजिकिरभाई । फिक्रकोत्यागिनिजनामसो लागिकरि, सुषुप्ता ताँत तूतू बजाई ॥ गगनअरुधरनिबिचरुयाल अद्वुतरचा, गैवकीकलासतगुरुलखाई । कहै कबीर अब भोग पूरन भाया, ज्ञानके मौज वैराग पाई ॥ दौडदौडरेबालकाखबरिकरदर्बारमें, अलमस्तअवधूतफकीरआया । जाकेछाप अरुतिलकगलमालमस्तकवना, सत्तकी एकआवाज आया । खोलिपटदेखले जगमगीजोतिहै, नादअरु बिन्दुगठजीतकाया । कहै कबीर सर्वांग अविगत मिला, भर्मको छाड़िगुरुज्ञानपाया ॥ उलटि यंत्र धरो शिखरआसनकरो, देखसो देव दर्गाह माहीं । जहाँ तेल बाती बिनाअधरदीपकबलै, युक्तिकी जोतसो घटैनाहीं ॥ जहाँ तालतांतीबिना रागरमतासुना, पावैबिन निरत झंकारखाहीं । हाथबिनपांवबिनशीसमस्तकबिना, हुकुमहथियारबिन फौजधाई ॥ जहाँ जत्रतेजी नहीं गैद छाजे नहीं, युद्धमंडा तहाँ घाव नाहीं ।

( ३८ )

बोधसागर

पातबिन पेड बिन वागडम्बररहे, पालिबिनसर्वहिलोलखाहीं ॥ नीरबिनकमलतहैफूलिनर्मलरहै, पोखबिनभैवरगुंजार खाही । नैवबिनमहलकेदशोछाजाबना, रूपबिन देव जहाँ मौज पाई ॥ कहैं कबीर कोइनिरतिलोनिरखियो, पपिलके पंथमें गयंदजाई । दरसबिनदीदपरतीति आवै नहीं, पार की कहैं नब झूठ झाई ॥ हकार सकार झनकार लागि रहै, बैठमनतख्त जहाँ तत्त पाई । रूपबिन रेख जहाँ राग रमतासुना, तालमृदंगपर टेर खाई ॥ अजरअरुअमरका अगम बासाबसे, नादअरुबिन्दकीखबरपाई । सोधि अस्थूलरहमान जबभैटिया, नामकी छापजबजायखाई ॥ जहाँ फूहिरि परबोकै अमीझरबोकै, प्रेमकी पुरीसो घटैनाई । आपकी तापधरि काललागै नहीं, कालकौमारि जंजालखाई ॥ शून्यकी ध्वजा जहाँ फरकखाबोकै, सेतही गगन गुंजारखाई । अगम अरु निगमका खूबछाजा बना, रूपबिनदेवजहाँगमपाई ॥ अखंड अपार जहाँ तारलागारहै, तारमें मिलै सो पार होई । भर्मको छेकि परब्रह्मको भैटिकरि, सुरतिको कोटिब्रह्मांड मोई ॥ कोटके कंगुरे ज्योति झलमलकरै, माझरी शून्यमें फरकखाई । दासकबीर निर्वानपद परसिया, मिटिगया झूठ झकझोर आई ॥ सतकबीरका सेतही घर रहै, श्वेतही शून्यमें रमै भाई । जहाँ यती औ सतीतो निरतकरबोकै, प्रेमरस पीवे सोघटै नाई ॥ ताल मृदंग अनहद लागा रहे, सुषुम्नासाधि संतोष पाई । विहंगमशब्दजहाँ फरक खावो करै, शब्दकीखोजकोइसंतलाई ॥ जहानकी टेक अस्मान लागी रहै, सहजमें भैवरगुंजार खाई । उलटिकरिपवनतहाँ गगनलागीरहै, लूमझरलाल आकाशलाई ॥ देखिधरिध्यान जहाँ इंद्र गवनीकरै, अमीका कुंड हिलोलखाई । शब्दका चांदना अगम लागारहै, उठै झनकार ब्रह्माण्डमाई ॥