भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1402, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1402

( २६ )

बोधसागर

कहतको सूर अरु रहतको कूडहै, रहतबिनकहतकिसकामआवै । रहत रजमा विना कहत झूठी सबै, पांच फूटा फिरै काल खावै ॥ पांचको वसकरै नाम हृदय धरै, मुक्तिकी राह कयोंसहजि आवै । कहैं कबीर कोई सन्त जन सूरमा, कहत अरु रहत तब एकभावै ॥ ज्ञान वैराग विनु कूफ़फ़ंद टूटै नहीं, ज्ञान वैराग सोकुफ़फ़ंदटूटै । ज्ञान वैराग बिन जीव छूटै नहीं, ज्ञान वैराग सो जीव छूटै ॥ ज्ञान वैराग बिन पीव पावै नहीं, ज्ञान वैराग सो पीव पावै । ज्ञान वैराग बिन काज थावै नहीं, ज्ञान वैराग सो काज थावै ॥ बिनावैरागकहोज्ञानकिसकामका, पुरुषबिननारिनहिंशोभापावै । स्वांगते साहु अरु गति है चोरकी, करै तब चोरिया शिर कटावै॥ भेष तो साधुअरुकुबुधि माहीघणी,कुबुधिको कोथली नाहिं छूटै । शील अरुसाँचसंतोषअन्तर नहीं, कहैं कबीर तब काल कूटै ॥ कहनको साहु असगति है चोरकी,साहुजी कहत नहिं शर्मआवै। झूठही कहत अरु झूठही रहत है, रैन दिन झूठमें जन्म जावै ॥ मानके आसरे फूलकरि बैसिया, इन्द्रियास्वाद मनमाहिं भावै । कहैं कबीर ते साहु कयों बोलिये, यमरायके खेसले खूब खावै॥ ज्ञान वैराग बिन शब्द चालै नहीं, चढ़ कमान बिनु तीर कैसा । उज्वला दीसता द्रव्यखोटकारुपया, तासुकाकौनगनि देह पैसा॥ कठिन करतूतिपुनि कहाका होत है, रहतर जमाबिनाशब्दझूठा। कहैं कबीर जन काजतबही सरे, पाँच मन मनसा फिरै पूठा ॥ तुरंग रागातलै कान मोती झुलै, पाँच हथियार तहां बांधिसोई । मालमोतियातणीसौजआछावनी,पणिबिनाकारण रहे पुरुषकोई॥ नारि सुख नालहै गर्भ तो नारहै, बिना वैराग तो शब्द काँचा । कहैं कबीर ज्यों पुरुष हैहीजड़ा, बिनाकरतूतिनहिंपुरुषसाँचा ॥ शब्द अनुभव करै माहिप्रचोधरे, मन अरु पवनकी युक्तिआनै।