भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आत्मबोध

( २७ )

ज्ञान चौकस कहे सैन चौथे गहे, सीस सतनामकी छाप ठाने ॥ कनक अरु कामिनी रेख माहीघणी, भायतृष्णातनीमीटिनाहीं । कहैं कबीर सब झूठ ही बोलना, आप है कालकी डाढ माहीं ॥ पवनको साधि करिकरतउपाधिनर, बासना बीजतो नाहिँछीजै । दूध अरु भातफिर ओगरामागता, दास मनोहरका लाडकीजै ॥ कहत है योग अरुभोगको गहत है, योग को मूल तो हाथ नाहीं। कहैं कबीर नर करत आजीवका, खान अरु पान है चित्त माहीं॥ दर्दमन्द दर्दके चोटको जानि हैं, वे दर्दको चोटकी खबर कैसी । पीवकी चोटको विरहनी जानिहै, रैनदिन पीवमें सुरति बैसी ॥ श्रवणअरुनयनसुखवैनमें बसत है, पीवविन और नहिं बात आवै। कहैं कबीर यह विरहनी अंग है, रैनदिन निरखता पंथ जावै ॥ नीर विनुमीनअरुचन्दचकोरविन, सीपकोस्वातिकीएकप्यासा । धरणिके नीर नहिं नेह पपीहरे, विरहिनी एकयों राम आसा ॥ नारिसे पुरुष अरु पुरुषसे नारि है, सुरतिकीडोरज्योंएक होवै । कहैं कबीर यह विरहनी अंग है, रैनदिन पीवका पंथ जोवै ॥ योगकी युक्तिको रोगिया नाल है, रोगकी खानितहां योगनाहीं । कूडिया कंथिया काज सीजै नहीं, कहत कपूर अरुहींग खासी ॥ नाम निर्वाणतहां कामकहाँपाइये, कामनाकुबुधितहांनामकैसा । कहैं कबीर नर जहरको खात है, शब्द अनुभव करेफूलिबैसा ॥ योगकी युक्तिकोरागिया नाल है, रोगकी खानि तहां योग कैसा। कनकअरुकामिनीखानगहिरीखरी, तासुके ऊपर जीव बैसा ॥ मूलिया खायकरि करतउदगार नर, कहत कपूरकी बासआवै । कहै कबीर एका दृष्टि देखये, कनक अरु कामिनीजहर खावै ॥ शब्दको मानिहै कौन पर्माण है, वेदांत सिद्धांत तहां एकमेला । त्याग वैराग अरु शीलसंतोषविनु, करतज्योंठेलियाबालखेला ॥

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