कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1429, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैनधर्मबोध
( ५३ )
आयू कर्म बहुरि कहो, नाम कर्म पुनि भाष । गोत कर्म अंतराय कर्म, बरनौ तिनकी शास्त्र ॥ कर्म एकही जानिये, आठभांति सो दीस । प्रकृत जैन बानी कहै, एक सौ अरतालीस ॥
इति
अथ ज्ञानावर्नी कर्मकी पंच प्रकृति वर्णन--चौपाई
मति ज्ञानावर्नी जो कर्मा । सो आवरि राख्यो मतिधर्मा ॥ श्रुति ज्ञानी वरनी जब होई । शुभश्रुति ज्ञान फुरे नहिं कोई ॥ औध ज्ञान आवर्नी जबही । औध ज्ञान हिय होय न तबही ॥ मन पर्जय अबरन उगि आवै । सो मन पर्जय ज्ञान छपावै ॥ प्रकटे केवल ज्ञाना वरनी । केवल ज्ञान गोप तिह करनी ॥ मतिश्रुति औधअरुमनपरजाई । केवल ज्ञान पंच विधि गाई ॥ मति ज्ञान सो नाम बताई । मति बुधिते जेती चतुराई ॥ कारीगरी अरु गुन गन जेते । मति ज्ञान करि ल्हिये तेते ॥ द्वितिये श्रुति ज्ञानजिहि कहई । सर्व शास्त्र मुख पाठ जो रहई ॥ तीन काल देखे श्रुति द्वारा । जाने सकल अचार विचारा ॥ श्रुति केवल ज्ञानी कह सोई । पूरन जो श्रुति ज्ञान ते होई ॥ श्रुतिके बली जो पंडित पूरा । श्रुति द्वारे संशय कर दूरा ॥ तृतिये औध ज्ञान जब होई । मनकी बात जाने सब सोई ॥ जाके मनमें जो कछु भासा । सब औधते होय प्रकाशा ॥ चौथे कह मन परजय ज्ञाना । जो मनकी परजायको जाना ॥ जहाँ जहाँ मन छन २ करदौरा । जो कछु फुरै जाय जिहि ठौरा ॥ मन परजय सो सबही जानो । सूक्ष्म गति मन कछु नदुरानो ॥ पंचम केवल ज्ञान कहावै । ताकी उदय मुक्ति जिव पावै ॥ केवल ज्ञान जो हृदय प्रकाशा । सकल भर्म भयकेर विनाशा ॥