कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1428, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५२ )
बोधसागर
अथ नौ प्रतिनारायणके नाम
दोहा-अश्वग्रीव तारक मेरक, मधु निशुम्भ प्रहलाद । बलि रावण जरासंध नव, प्रतिनारायण बाद ॥
इति
अथ तिरसठ शलाकापुरुषके नाम-चौपाई
तिरसठ पुरुष शलाका येही । जन जान अति उत्तम तेही ॥ मात पिता तिरथंकर करो । अरतालीस जीव सो हेरो ॥ चौबिस कामदेव नौ नारद । चौदह कुलकर बुद्धिविशारद ॥ ग्यारह रुद्र यक सौ उनहतर । मुक्तिपात्र अवश्य येते नर ॥ इतने इतर और अधिकाई । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहाई ॥
अथ जैनशास्त्र संख्या प्रमाण-चौपाई
जैन शास्त्र संख्या परमाना । ऐसे ताको सुनो बखाना ॥ बत्तिस पद सब शास्त्र कहावै । ऐसे ताको लेख लगावै ॥ प्रतिपद ढाई सौ मन स्याही । यक पद पूरन लिखिये ताही ॥ यक चावल कजल जौं लीजै । यकश्लोक पूरण तिहि कीजै ॥ बत्तिस पद यह लेख लगाई । सर्व शास्त्र ताते लिखि पाई ॥ कजल आठ सहस मन लागे । केवल वैन जैनपति जागे ॥ केवल वानी जैनको जोई । अंथ प्रमाणिक इनमें सोई ॥
अथ अष्टकर्म विधान वर्णन
दोहा-अष्टकर्म जो जैन कह, ताके बंधन जीव । भवसागर भोगे सदा, पावे नहिं निजु पीव ॥ ज्ञानी बरनी प्रथम कह, दर्शना बरनी फेर । बहुरि बेदनी जानिये, महा मोह पुनि टेर ॥