भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जनधर्मबोध

( ५७ )

जैसे हो करसीकी आगी । रहै सदा उर अंतर लागी ॥ महाकलुषता नित उर जेही । वेद नपुंसक धर नर येही ॥ नर अरु नारि नपुंसक माही । भविधि मदनमद जैन कहाही ॥ प्रथम तीन मिथ्यात बखाना । बहुरि पचीस कषाय विधाना ॥ दोनों मिलि अद्रठाइस होई । मोह प्रकृत जानिये सोई ॥

इति

अथ आयुकर्म चारप्रकार वर्णन-चौपाई

आयू कर्महै चार प्रकारा । नरपशु देव नारकी धारा ॥ उदय मनुष आयू नरभोगा । पशुआयूते पशु संयोगा ॥ सुरआयू सुरपदको जाता । नारक आयू नरक निपाता ॥

इति

अथ नामकर्मको तिवानव प्रकृतवर्णन- चौपाई

छठये नाम कर्म कहलावै । जीवको मूरतवंत बनावै ॥ नाम कर्म यह चतुर चितेरा । मूरतखंच रंच नहिं फेरा ॥ पिंडप्रकृत चौदह परतारा । अद्रठाईस अपिंड विस्तारा ॥ पिंडभेद पुनि चौसठ भाषा । अद्रठाईस अपिंड मिलिसाखा ॥ ते दूनों तिरानवे होई । पिंड अपिंड बयालिस जोई ॥ सो तिरानवे करो बखाना । श्रवण लायके सुनो सयाना ॥ प्रथमहि पिण्डप्रकृत गतिनाना । सुरनर पशु नारकदुखधाना ॥ देवदेह सुरगति उद्यौता । नरशरीर नरगतिसे होता ॥ पशुगतिसे जिव पशुतन पावै । नरक गती ले नरक बसावै ॥ चहुगति पूरबी चारो गनिये । द्वितिये पिंडप्रकृतअब सुनिये ॥ मरनसमय तनतज जिवजबही । परभवगौन तौनकर तबही ॥ पूर्वप्रकृत ल्यावै तिहि प्रेरी । भावी गतिमें ल्यावै घेरी ॥ करे पूरबी आनि सहाई । धरि नवीनतन जिव प्रकटाई ॥