भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

तेरो कोइ न राखनहारा । कर्मके वश चेतन निरधारा ॥ यहि संसार भावनी येहा । पर दर्बनसे कीजै नेहा ॥ तू चेतन ये जड सरबंगा । ताते तजो पराया संगा ॥ जीव अकेला आपतकाला । अर्ध मध्य भौन पाताला ॥ दूजा कोइ न तेरे साथा । सदा अकेला फिरै अनाथा ॥ भिन्य सद पुदगलसे रहई । भर्मभाव करि जडता गहई ॥ ये पुदगल रूपीके खंथा । चिदानंद तू सदा अबंधा ॥ अशुचि देखि देहादिक अङ्गा । कौन कुवस्तु लागि तेहि संगा ॥ हाड मांस रुधिरो गदगेहा । निरखि सूत्र मल तजो सनेहा ॥ असै परसे कीजै प्रीती । ताते बन्ध बढै विपरीती ॥ पुदगल तोहि अपन कोइ नाही । तू चेतन ये जड सबआहीं ॥ संवरपर रोकनको भाऊ । सुख होनेको यही उपाऊ ॥ चिदानंद हो निर्मल आपू । मिटै सहज परसंग मिलापू ॥ गहि लीजिये आपनो कर्मा । जाते प्रकट होय निज धर्मा ॥ थिति पूरी हो खिरखिर जाई । निरज्वर भाव बढै अधिकार्ई ॥ लोकमाहैं तेरो कछु नाही । लोक आन तू आन लखाहीं ॥ है यह षट्दर्बनको धामा । चिदानंद तू आतम रामा ॥ धर्म सुभाव आपनो जानो । आप सुभाव धर्म सो मानो ॥ जब तोहि धर्म प्रकट है आवै । तब परमात्म पदै लखि पावै ॥ दुर्लभ पर दर्बनको भाऊ । आपा नहिं दुर्लभ सुन राऊ ॥ जाँ तेरो है ज्ञान अनूपा । तौ नहिं दुर्लभ शुद्ध स्वरूपा ॥

इति

अथ जनयतिके अट्टाईस मूलगुण वर्णन

सोरठा-पञ्च महाव्रत सञ्च, सुमति पञ्च परकार है । इंद्रियाणि दम पञ्च, षट् अचार पृथ्वी शयन ॥