भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जनधर्मवोध

( ६७ )

तज मज्जन निरधार, बसन त्याग कच लुंचकर । लघुभोजन थित धार, दातन लेपन त्यागकर ॥

चोपाई

सब जीवनपर दाय्या पाला । सत्य वचन बोले तेहि काला ॥ परसे नहिं धन करे ससोई । मदन विकार न व्यापै कोई ॥ सकल परिग्रहको जिन डाले । अधो दृष्टि मारगमें चाले ॥ सूखी भूमि निरखि पद धरही । दयासहित शिवपन्थ विचरही ॥ निरभिमान अनवद्य अदीना । कोमल मधुर दोष दुख हीना ॥ ऐसे सुवचन सदा उचारा । सो जैनेश सुक्तिपद धारा ॥ उत्तम कुल स्नावक आचारा । तासु भौन सूक्ष्म आहारा ॥ दोष बयालिसको सो टाली । भिक्षा भोजनकी यह चाली ॥ धर्मवस्तु कछु संग्रह धारा । सूखी भूमि निरखि मल डारा ॥ सीत उष्ण दोउ यक सम वादा । गंध कुगंधो स्वाद कुस्वादा ॥ शब्द कुशब्द कुरंग सुरंगा । स्तुति निंदा दोउ यक ढंगा ॥ शब्द मित्र दोउ यकसम भाला । सामा यक साधै तिहुँ काला ॥ अरि हंतो सिद्धौ आचारी । उपाध्याय साधूगुण धारी ॥ पंच परम परमेशी बाना । सदा काल तिनका गुण गाना ॥ दोष विचारिके प्राश्रित करही । कृपा कर्ममें निजु चित धरही ॥ जैनेश्वर बानी अनुसारा । द्वादशांग आदर उर धारा ॥ काऊ सम मुद्रा नित धारे । हृदये सुद्ध स्वरूप विचारे ॥ सूखी भूमि शयन हितकारा । त्यागे त्रिविधियोग ममकारा ॥ पश्चिम राति नींद लघु गहई । धर्म ध्यानमहँ पावन रहई ॥ अंतर बाहर परम पुनीता । लेप नहान त्याग सब कीता ॥ नग्र दिगंबर मुद्रा धारी । विगलित लज्जा लोक विहारी ॥ एक बार लघुभोजन लेही । कच लुंचै तजि दातन देही ॥

इति