कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अथ जैन यतिको बाइस परीसा वर्णन
सोरठा-भूख प्यास हिम गर्म, हंस मशक डँस नम्र तन । अरतिकेरे दुख पर्मे, चर्जा आसन शयन कह ॥ खल वध बंधन बाद, जाँचै नहीं अलाभको । रोग परस न विषाद, मलमय आदर मान विन ॥ प्रज्ञा अरु अज्ञान, दरस मलीन दो बीसये । जैन परीसा जान, सहै जाहि रिषि राय नित ॥
चौपाई
एकपक्ष जब दिन बित गैऊ । उन ओदर भोजन तब लैऊ ॥ विधिवत जौं भिक्षा नहिं पाई । अंग शिथिल मनमें हटताई ॥ पर अधीन भिक्षा ऋषि राया । प्रकृति विरुद्ध जो भोजन पाया ॥ ग्रीष्म काल विहाली ठानी । सहै प्यास मांगै नहिं पानी ॥ हिम ऋतुमें कम्पै संसारी । बाहर तबहि खड़े व्रतधारी ॥ वर्षा वायु शीतको जोरा । सहै सकल नहिं तन मन मोरा ॥ भूख प्यास उर अंतर दगै । कोपे पित्त देहज्वर जागै ॥ ग्रीष्म धूप अग्नि सो लागे । सहत सबीसन धीरज त्यागे ॥ दंश मशा माखी डँसै सर्पा । भाल शृगाल केहरी दर्पा ॥ कनखजूर आदिक दुख देहीं । पाड़ा सह हटता गह येहीं ॥ विषय विकार जासु उर भरई । भेष दिगम्बर सो किम धरई ॥ महाकठिन यह नम्र परीसा । सहै शील धर जैन मुनीशा ॥ देश काल कारण को पाई । जक्त जीव मन व्याकुलताई ॥ ऐसी अरति परीसा भारी । सहै जैन सुनिधर्म सँभारी ॥ तियहग तीर शरीर न लागा । जगमें को असजन्म सुभागा ॥ को अस जेहि रतिनाथ न चंपा । मन सुमेर मुनिको नहिं कंपा ॥ चार हाथ देखत महिं चारे । कठिन कंकरी पायँ विदारे ॥