भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जनधर्मबोध

( ६९ )

चर्जा दुख सहि मुनि व्रत धरहीं । प्रथम स्वादकी सुरति न करहीं॥ सुखी ठौर शयनको हेरे । निश्चल अंग रहै ऋषिकेरे ॥ कठिन पृथ्वीमें शयन कराई । शयन परीसा पर जय पाई ॥ खल निरदोष साधु को मारे । दुख अनंत दे अग्निमें जारे ॥ समरथ होय सहै दुख सारा । रंच क्रोध नहीं निज उरधारा ॥ हाँसी करहि दुष्ट मिलि झारी । कहि कटुबचन देहि बहु गारी ॥ वचन बाण मारै जब तानी । क्षमा ढाल ओटे मुनि ज्ञानी ॥ छीन भये तन पिंजर रहेऊ । दुख अनंत जब देही सहेऊ ॥ काहूकी नहीं चहै सहाई । प्राणहु गये अयाच रहाई ॥ एक बार भोजन की बेरा । मौन साधि नगरी करि फेरा ॥ बहुदिन बीते न भिक्षा पाई । तिहि अलाभ मन खेद न ल्याई ॥ भोग संयोग रोग जब होई । कछु उपचार न चाहै सोई ॥ सहै दुःख नित रहै अदीना । देह विरक्त आत्म लौलीना ॥ कैंकरी कंटा पाँय विदारे । रज तृण आंखिनमें भरि मारे ॥ सहै दुःख निज कर नहीं गाढे । तृणपारस विजई मुनि गाढे ॥ तजि असनान होय दुख भारी । चलै प्रसेव धूल भरिडारी ॥ मलिन आपनी देह निहारी । मलिनभाव नहीं जैनाचारी ॥ चिर तपसीबुधि विद्यासागर । गुणगणअतुलित जक्त उजागर ॥ नर आदर प्रणाम नहीं करहीं । तहैं मुनि मलिनभाव नहीं धरहीं॥ ऐसे बुधि विद्या निधि गहिरे । परबादी नहीं सम्मुख ठहरे ॥ आगम अगम अलंकृत जाना । पै मुनीश मद रंच न आना ॥ पालत धर्म बहुत दिन गेऊ । ज्ञानप्रकाश अजौँ नहीं भेऊ ॥ कछु विकल्प नहीं मनमें गहई । सो अज्ञान विजई मुनि अहई ॥ मैं चिर घोर घोर तप ठानी । तब बलसिद्ध झूठ कछु मानी ॥ यों कदापि मनमें नहीं बाधू । सोई अदरसन विजई साधू ॥

इति बाईस परोक्षा