भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ७० )

बोधसागर

अथ बाईस बस्तु अभक्ष्य वर्णन—चौपाई

बैगन बहुबीजा अरु ओला । बटु पीपर पाकर कहि बोला ॥ ऊमर कमऊमर निस भोजन । कदमअयाचतुच्छ फलकोगन॥ विष माटी मद मधु अरु मासा । खार चलो रसघोरव डासा ॥ माखन और अँचार कहावै । बाइस बस्तु अभक्ष्य बतावै ॥ इनते अधिक मूल है जेते । भक्षण योग्य न कोई तेते ॥ जिनमें धाम निगोद कहीजै । जीव अनंत न पार लहीजै ॥

इति

अथ जैनसाधु और गृहीको वर्णन—चौपाई

दोय प्रकारके साधु बखाना । दीगम्बर श्वेतांबर बाना ॥ दीगम्बर मुद्रा कठिनाई । सो नरते अव गही न जाई ॥ ताते लोप दीगम्बर भैऊ । श्वेतांबरी अजो रहि गैऊ ॥ अजहूँ गृही दीगम्बर मतको । जाने अपने धर्मकी गतको ॥ गृहीको गृही करे उपदेसा । जैसो गुरु शिष्य पुनि तैसा ॥ श्वेतांबरी साधु बहु तेरे । नाम दूदिया तिनको ठेरे ॥ जैन धर्मकी बारह पौरी । विविधि रीति देखो सब ठौरी ॥ सबपर श्रेष्ठ दिगम्बर बाना । छुल्लक ताके हेठ बखाना ॥ पुनि दश पौर सरावक आहीं । सेवा पूजा देखो ताहीं ॥ तिरसठ पुरुष शलाका जोई । पूजा तासु जैन घर होई ॥ तिरथंकरकी मूर्ति बनाई । मंदिर माहैं ताहि पधराई ॥ दीगम्बर कर फेची टूटी । श्वेतांबर फेची मुखपट्टी ॥

इति

अथ स्वर्ग और मुक्तिशिलावर्णन—चौपाई

साठि पटल स्वर्गन में सुनिये । सर्वांरज सिध सबपर गुनिये ॥ तापर मुक्ति शिला कहलावै । मुक्त होय सो ताहि समावै ॥