भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जैनधर्मबोध

( ७१ )

इतर धर्म जो जग विरुध्दाता । कोइ मिथ्या कोइ मिश्रमिथ्याता॥ साठि पटल जो स्वर्गन माहीं । बारहलों मिथ्याती जाहीं ॥ जैनी बिना न ऊपर जावै । बारहलों सबही गम पावै ॥ जैनधर्म बिन मुक्ति न होई । केवल ज्ञान उगे नहीं कोई ॥ स्वर्गनके सुख श्रमित बताई । रहे देवगण सबमहँ छाई ॥ स्वर्गकि थित जब पूरन होई । तब जिव धरणिधरे तन सोई ॥ जैसो भाव स्वर्गमें धरई । तैसी योनिमाह जिव परई ॥ जो सर्वांरज सिद्धको जावै । एकदेह धरि मुक्ति सो पावै ॥ जबलों कर स्वर्गनमें बासा । तबलों देह धरनकी आसा ॥ चौथे काल मुक्ति जिव होई । पंचयें छठएँ लहे न कोई ॥ सुकरम किये स्वर्गको जावै । पंचयें छठयें मुक्ति न पावै ॥ ढाईसहस वर्ष बित गयऊ । पंचम काल लगत जो भयऊ॥ उगे न तबसे केवल ज्ञाना । बिना ज्ञानको मुक्ति लहाना ॥ छ्री कोई मुक्ति न पाई । करि सुकर्म स्वर्गनमें जाई ॥ स्वर्ग भोगि नरतन पुनि पावै । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहावै ॥

इति

अथ नर्कको वर्णन—चोपाई

सप्त नरक मत जैन कहाहीं । यम यमगण कतहुँ कोइ नाहीं ॥ औध ज्ञान जस देव गहाही । ज्ञानक औध नारकिनमाहीं ॥ बुरा औध नारकहि फुराना । पूरब वैरभाव सब जाना ॥ पिछला सब औगुन सुधि आवै । एक एकको मारि दुखावै ॥ शस्त्रादिक तहँ अगणित जाती । दंड कि हेत बना बहुभांती ॥ काटे छेदे तन तिन केरे । कोइ कोइ कोल्हुँमें धरि पेरै ॥ एक एकको धरि धरि मारा । मचा चहुँ दिश हाहाकारा ॥ जस पारा तस नारक अंगा । कटि फटि होयसो पहिले ढंगा॥