कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जनधर्मबोध
( ६९ )
चर्जा दुख सहि मुनि व्रत धरहीं । प्रथम स्वादकी सुरति न करहीं॥ सुखी ठौर शयनको हेरे । निश्चल अंग रहै ऋषिकेरे ॥ कठिन पृथ्वीमें शयन कराई । शयन परीसा पर जय पाई ॥ खल निरदोष साधु को मारे । दुख अनंत दे अग्निमें जारे ॥ समरथ होय सहै दुख सारा । रंच क्रोध नहीं निज उरधारा ॥ हाँसी करहि दुष्ट मिलि झारी । कहि कटुबचन देहि बहु गारी ॥ वचन बाण मारै जब तानी । क्षमा ढाल ओटे मुनि ज्ञानी ॥ छीन भये तन पिंजर रहेऊ । दुख अनंत जब देही सहेऊ ॥ काहूकी नहीं चहै सहाई । प्राणहु गये अयाच रहाई ॥ एक बार भोजन की बेरा । मौन साधि नगरी करि फेरा ॥ बहुदिन बीते न भिक्षा पाई । तिहि अलाभ मन खेद न ल्याई ॥ भोग संयोग रोग जब होई । कछु उपचार न चाहै सोई ॥ सहै दुःख नित रहै अदीना । देह विरक्त आत्म लौलीना ॥ कैंकरी कंटा पाँय विदारे । रज तृण आंखिनमें भरि मारे ॥ सहै दुःख निज कर नहीं गाढे । तृणपारस विजई मुनि गाढे ॥ तजि असनान होय दुख भारी । चलै प्रसेव धूल भरिडारी ॥ मलिन आपनी देह निहारी । मलिनभाव नहीं जैनाचारी ॥ चिर तपसीबुधि विद्यासागर । गुणगणअतुलित जक्त उजागर ॥ नर आदर प्रणाम नहीं करहीं । तहैं मुनि मलिनभाव नहीं धरहीं॥ ऐसे बुधि विद्या निधि गहिरे । परबादी नहीं सम्मुख ठहरे ॥ आगम अगम अलंकृत जाना । पै मुनीश मद रंच न आना ॥ पालत धर्म बहुत दिन गेऊ । ज्ञानप्रकाश अजौँ नहीं भेऊ ॥ कछु विकल्प नहीं मनमें गहई । सो अज्ञान विजई मुनि अहई ॥ मैं चिर घोर घोर तप ठानी । तब बलसिद्ध झूठ कछु मानी ॥ यों कदापि मनमें नहीं बाधू । सोई अदरसन विजई साधू ॥
इति बाईस परोक्षा
( ७० )
बोधसागर
अथ बाईस बस्तु अभक्ष्य वर्णन—चौपाई
बैगन बहुबीजा अरु ओला । बटु पीपर पाकर कहि बोला ॥ ऊमर कमऊमर निस भोजन । कदमअयाचतुच्छ फलकोगन॥ विष माटी मद मधु अरु मासा । खार चलो रसघोरव डासा ॥ माखन और अँचार कहावै । बाइस बस्तु अभक्ष्य बतावै ॥ इनते अधिक मूल है जेते । भक्षण योग्य न कोई तेते ॥ जिनमें धाम निगोद कहीजै । जीव अनंत न पार लहीजै ॥
इति
अथ जैनसाधु और गृहीको वर्णन—चौपाई
दोय प्रकारके साधु बखाना । दीगम्बर श्वेतांबर बाना ॥ दीगम्बर मुद्रा कठिनाई । सो नरते अव गही न जाई ॥ ताते लोप दीगम्बर भैऊ । श्वेतांबरी अजो रहि गैऊ ॥ अजहूँ गृही दीगम्बर मतको । जाने अपने धर्मकी गतको ॥ गृहीको गृही करे उपदेसा । जैसो गुरु शिष्य पुनि तैसा ॥ श्वेतांबरी साधु बहु तेरे । नाम दूदिया तिनको ठेरे ॥ जैन धर्मकी बारह पौरी । विविधि रीति देखो सब ठौरी ॥ सबपर श्रेष्ठ दिगम्बर बाना । छुल्लक ताके हेठ बखाना ॥ पुनि दश पौर सरावक आहीं । सेवा पूजा देखो ताहीं ॥ तिरसठ पुरुष शलाका जोई । पूजा तासु जैन घर होई ॥ तिरथंकरकी मूर्ति बनाई । मंदिर माहैं ताहि पधराई ॥ दीगम्बर कर फेची टूटी । श्वेतांबर फेची मुखपट्टी ॥
इति
अथ स्वर्ग और मुक्तिशिलावर्णन—चौपाई
साठि पटल स्वर्गन में सुनिये । सर्वांरज सिध सबपर गुनिये ॥ तापर मुक्ति शिला कहलावै । मुक्त होय सो ताहि समावै ॥
जैनधर्मबोध
( ७१ )
इतर धर्म जो जग विरुध्दाता । कोइ मिथ्या कोइ मिश्रमिथ्याता॥ साठि पटल जो स्वर्गन माहीं । बारहलों मिथ्याती जाहीं ॥ जैनी बिना न ऊपर जावै । बारहलों सबही गम पावै ॥ जैनधर्म बिन मुक्ति न होई । केवल ज्ञान उगे नहीं कोई ॥ स्वर्गनके सुख श्रमित बताई । रहे देवगण सबमहँ छाई ॥ स्वर्गकि थित जब पूरन होई । तब जिव धरणिधरे तन सोई ॥ जैसो भाव स्वर्गमें धरई । तैसी योनिमाह जिव परई ॥ जो सर्वांरज सिद्धको जावै । एकदेह धरि मुक्ति सो पावै ॥ जबलों कर स्वर्गनमें बासा । तबलों देह धरनकी आसा ॥ चौथे काल मुक्ति जिव होई । पंचयें छठएँ लहे न कोई ॥ सुकरम किये स्वर्गको जावै । पंचयें छठयें मुक्ति न पावै ॥ ढाईसहस वर्ष बित गयऊ । पंचम काल लगत जो भयऊ॥ उगे न तबसे केवल ज्ञाना । बिना ज्ञानको मुक्ति लहाना ॥ छ्री कोई मुक्ति न पाई । करि सुकर्म स्वर्गनमें जाई ॥ स्वर्ग भोगि नरतन पुनि पावै । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहावै ॥
इति
अथ नर्कको वर्णन—चोपाई
सप्त नरक मत जैन कहाहीं । यम यमगण कतहुँ कोइ नाहीं ॥ औध ज्ञान जस देव गहाही । ज्ञानक औध नारकिनमाहीं ॥ बुरा औध नारकहि फुराना । पूरब वैरभाव सब जाना ॥ पिछला सब औगुन सुधि आवै । एक एकको मारि दुखावै ॥ शस्त्रादिक तहँ अगणित जाती । दंड कि हेत बना बहुभांती ॥ काटे छेदे तन तिन केरे । कोइ कोइ कोल्हुँमें धरि पेरै ॥ एक एकको धरि धरि मारा । मचा चहुँ दिश हाहाकारा ॥ जस पारा तस नारक अंगा । कटि फटि होयसो पहिले ढंगा॥
( ७२ )
बोधसागर
सातो नरक केर व्यौहारा । भिन्न भेद पीडा अधिकारा ॥ महादुःख नारकहि बनाई । आयू परम दीर्घ जिन पाई ॥ दोहा—सुई अग्नि भरि मृत्तिका, नरकसे महि जौ आय । ताकी अति दुर्गंधते, सब तरु पशु मरिजाय ॥ इति ॥
अथ प्रलय वर्णन—चौपाई
प्रलयके प्रथम इन्द्र महि आवै । जोड़े जोड़े जिव ले जावै ॥ वर्गमें सबकी जतन कराई । जबलौ प्रलय पूर्ण ना पाई ॥ निज विमानमें सब जिव धारी । स्वर्ग दिशा जब इन्द्र सिधारी ॥ ताके पीछे परलय आवै । जीव जन्तु सबही विनशावै ॥ अग्निवाषि पुनि जल बरसाई । जीवबीज नहिं कतहूँ पाई ॥ पूर्ण प्रलय होय हरिजाई । जीव इन्द्र गहिमहि पुनि आई ॥ ताते पुनि जग उत्पति होई । एकते बहुरि अनेकन सोई ॥ कबहुँ न होय बीजको नाशा । जक्त अनादि स्वतह परकाशा ॥ क्रमहीक्रम फिर बढै विभूती । सर्व पदार्थ पृथिव प्रसूती ॥
इति प्रलय
अथ स्फुटवार्ता—चौपाई
षटप्रकारकी अस्थि जो कहेऊ । वज्रशरीर प्रथम जिव गहेऊ ॥ वज्रको हाड शीघ्र किमि गलई । कहुँ कहुँ भूमें अजौ न टलई ॥ यूरूप नर जहँ तहँ चलि जावै । वज्र हाड जिव जंतुको पावै ॥ सो निजु मन ऐसे अनुपानो । हाड परा चिरने पथरानो ॥ ताको मर्म न जाने सोई । वज्रहाड जिव प्रथम गहोई ॥ भीम शरीर समस्त वज्र रह । दुयोधन तन अर्ध वज्र कह ॥ लेखा ताहि काल अस रहेऊ । कोइ वज्रकाइ घटि तिहि कहेऊ ॥ ताके प्रथम कठिन सर्वगा । हनुमान आदिक बजरंगा ॥ चिरंजीव जीवे चिरकाल । गहि तन वज्र दोय दुखटाला ॥
इति श्रीजैनधर्म
स्वसमवेदबोध ग्रन्थ
स्वसमवेदबोध प्रारंभ
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन
संघ लोकसभा
१
संघ लोकसभा
संघ लोकसभा
•
संघ लोकसभा
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
1917 1918
सत्यमुक्त, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्कनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानाम की दया, वंश ब्यालीसकी दया ।
अथ श्रीबोधसागरे
एकोनत्रिंशत्तरंगः
अथ स्वसमवेदबोध प्रारम्भ
★
मंगलाचरण—चौपाई
बन्दों गुरपद नख मणि ज्योती । हृदये बसत दिग्विहग होती ॥ कोटि सूर शशि उर उजियारा । तिमिर अविद्या सकल सँहारा ॥ चरणकमल मुनि दलअलिफंदा । धुरपद पाय मधुर मकरंदा ॥
( ७८ )
बोधसागर
पद पराग अनुराग हटाईं । कर बहु अम्बर मणिछबिछाईं॥ चरण सलिल सरि मज्जन पाना । युगयुगको कलिकलुषनसाना ॥ महा प्रसाद प्रसादी पाईं । कोटिन युगकी छुधा बुझाईं ॥ धर्मदास पद प्रथम नमासी । ता पीछे करुणामय स्वामी ॥ वंश बयालिस जगमें जिनको । कोटि प्रनाम हमारा तिनको ॥ चार गुरु निज सतगुरु दासा । जिन्हेंन प्रभु तजि दूरारि आसा ॥ मन क्रम बच गुरु चरनन चेरो । तिनप्रति बहु अभिवंदन मेरो ॥ सतगुरु अंशनको बहु बारी । बदि चरनरज निजसिर धारी ॥ जिन जिन सन्त मोहि उपदेशा । धर्मधामको कह्यो संदेशा ॥ प्रणवों कोटि बार कर जोरी । जिनकी कृपा विमल मति मोरी ॥ जो गुरु पद पंकज प्रिय पागे । बन्दों सबहि सहित अनुरागे ॥ पुनि बन्दों सन्तनके चरना । गुरुस्वरूप कह्यु भेद न बरना ॥ साहिब सन्त एक जिन जाना । तिनको आवागवन नसाना ॥ नमों बहुरि कवि कुल समुदाईं । सत्य कबीर चिन्ह जिन पाईं ॥ भे अरु अहैं भव्य बहुतेरो । तिन प्रति बिनय दीनता मेरो ॥ उमैगि उमैगि जो गुरुगुन गावै । कोटिन जीव लोक पहुँचावै ॥ जड चेतन जहैं लगजगजाया । रचना विविधि विरंचि बनाया ॥ साधु असाधु सूर अरु कूरा । भोजन विविधि एकरस पूरा ॥ सत्य सुकृत सबमाहिं निहारौं । जोरि जुगुल कर सकल जोहारौं ॥ सब मिलि कृपा कीजिये सोईं । भणित मोर मङ्गलमय होईं ॥ कबि न होउ नहिं चतुर सयाना । काव्य भेद रस भेद न जाना ॥ कथ्यौ कथा सतगुरुकी आसा । बुधजन लखि न करै परिहासा ॥ बार बार गुरु पद शिर नाईं । धर्म कबीर मर्म अब गाईं ॥
इति मंगलाचरण
स्वसमवेदबोध
( ७९ )
अथ स्वसमवेद धर्मवर्णन
दोहा—देव कबीर महंत गुरु, स्वसमवेद मत भाष । सार शब्द टकसार जहाँ, सत्यनामकी साष ॥ सार शब्द यक मूल है, टीका चौदह कोर । कोटिन ग्रंथको गनि सके, लहे न ताको ओर ॥ जे ती जगमें बनपती, अस गंगाको रैन । अगम अपार अकथ कथा, सत्य कबीरको बैन ॥
इति
अथ उत्पत्तिकथा—चौपाई
उत्पत्ति प्रलयकि कथा अनंता । बहु विधि सत्य कबीर भनंता ॥ उत्पत्ति प्रलय कोटिन बारा । स्वसमवेद निर्णय निरधारा ॥ कछुक लिखो सो ग्रंथन हेरी । कथा अनूप यथा मति मेरी ॥ प्रथमै आदिमें ऐसो कहेऊ । स्वतह स्वच्छंद जीव यक रहेऊ ॥ रह स्वतंत्र आनंद अकेला । नहिं तब गुरु नहीं तब चेला ॥ पक्की तत्त्वको ताकी अंगा । अंग पिंड दोनों यक ढंगा ॥ माया पुरुषसो जीव उपाना । सत्यस्वरूपी ताको बाना ॥ अपना रूप अनूप निहारी । अहमित भयौ जीव तिहि बारी ॥ मोहित भा लखि रूप निकई । ताहि मोहमें गा गफिलाई ॥ आपा भूलि रहा नहिं चेता । महागमन मन भो ता हेता ॥ परमानंदमें गयो भुलाई । निजस्वरूपकी सुधि बिसराई ॥ तत्त्व प्रकृति पलटि गइ तबहीं । पक्कीसे कच्छी भई जबहीं ॥ कमही कम भै छीन शरीरा । धरिधरि देह पाव बहु पीरा ॥ जब कच्छा भा पक्का साँचा । अंड पिंड दोनों भा काँचा ॥ निज स्वरूपको ज्ञान न राखा । भई योनि चौरासी लाखा ॥ आपै आप रमे जग सारा । भरमे युनि अनंत अपारा ॥
नं. ९ कबीरसागर - ४
( ८० )
बोधसागर
बुद्धिभ्रांति भै जिवकी जबते । काल दयाल प्रकट भै तबते ॥ आप काल है काल उषाया । आपै फँसा आप दुख पाया ॥
वार्ता
प्रथम जीव पक्के रूपमें हता तब दूसरा ना हता । पक्के तत्त्वके नाम-सत्य १, विचार २, शील ३, दया ४, धीरज ५ इन पाँच पक्के तत्त्वका रूप हंसाका था, ताके तीन गुण पक्के गुण हते । अथ सत्य और विचारको गुण-विवेक १. अथ शील और दयाका गुण-गुरु भक्ति साधु भाव २. अथ धीरजको गुण-बैराग ३ ये पक्के तीन गुण हते तामें हंसा रहा ।
पचीस प्रकृति वर्णन
१ सत्यकी प्रकृति निर्णय-१ निर्बेध, २ प्रकार, ३ थीर, ४ छमा ५ इति ।
२ विचारकी प्रकृति-अस्ति १ नास्ति पदमें भान २, यथार्थ ३, शुद्धभाव ४, सत्यता ५ इति ।
३ शीलकी प्रकृति-शुधा निवारन १, प्रियवचन २, शांति बुद्धि ३, प्रत्यक्ष पारख ४, सब सुख प्रकट ५ इति ।
४ दयाकी प्रकृति-अद्रोह १, मित्रजीव २, सम ३, अभय ४, समदृष्टि ५ इति ।
५ धीरजकी प्रकृति-मिथ्या त्याग १, सत्यग्रहण २, निस्संदेह ३, हंतानासने ४, अचल ५ इति ।
ये पाँच तत्त्वकी पचीस प्रकृति हैं तामें हंसाको बासा हता तब कच्छा तत्त्व ना हता । पक्के तत्त्वका पक्का देह हता, तब कछु अनुमान ना हता । जब ऐसी अपनी देह देखा और सुंदरता माना तब बहुत आनंद हुआ । ता आनंदमें हंसा मिला तब आप अपनेको भूल गया, गफलत पैदा भई । ता गफलतमें
स्वसमवेदबोध
( ८१ )
एक झाँई परी । ता झाँईको सब ब्रह्म सच्चिदानंद कहते हैं, ता आनंदमें जीव बूड़ा तब तत्त्व प्रकृति पलटी । पक्केसे कच्चा रूप हुआ । आपा की खबर न रही । तब पाँच पक्के तत्त्वसे पाँच कच्चे तत्त्व भये । धीरजसे आकाश १, दयासे वायु २, शीतलसे तेज ३, विचारसे जल ४, सत्यसे धरती ५ पक्केसे ये पाँच कच्चे तत्त्व भये ताके तीन गुण कच्चे भये । धरती और जलसे सतो गुण भया १, अग्नि और वायुसे रजोगुण भया २, आकाशसे तमोगुण भया ३, पाँच कच्चे तत्त्वकी पचीस प्रकृति भई ये विकारकी देह भई । ताको नाम स्थूल मनमानता ते मानुष कहिये । तब हंकार हुआ कि मैं करता, तासे इच्छा भई ता इच्छाको नारीरूप भया, तासों भोग किया, फिर वह रूप विनसि गया, नारी गर्भसे तीन रूप पैदा भये । १ जीव, ताते मन २, मनसे ज्योति ३, ज्योतिसे त्रिगुण । रजो गुण ब्रह्मा १, सतो गुण विष्णु २, तमो गुण शिव ३ ये त्रिगुण ऐसे भये । जब पक्केसे कच्चा भया तब सम्पूर्ण सृष्टि चार खानी चौरासी लक्ष योनि पैदा भई । आपही अनेक रूप धरि अनेकयोनियोंमें भर्मता है, गफलतसे अपनी भूमिका छोड़ा, जब बहुत दुःख पाया तब अपने मनसे कल्पना किया कि हमारा कर्ता कोई दूसरा है, फिर अनुमानते करता निश्चय किया ता करताके प्रेममें बहुत वेद शास्त्र आदिक बानी बनाया, फिर आप ही उसको खोजने लगा तब कहा कि मालिक निर्गुण निराकार है तब सब वृत्ति थकित भई तब आप ही ब्रह्म कहाय अनुभव करिके संपूर्ण जक्त आपही हो रहा है इस प्रकारसे ब्रह्मसे सृष्टि और सृष्टिसे ब्रह्म रहटमें परा जीवको कहीं निश्चय नहीं दोनों प्रकारसे
बो • सा • ६
( ८२ )
बोधसागर
कष्ट पावता है जो साधुनकी सेवा करे और बड़े भाग उदय हों तो पारखी गुरु मिले और पूर्ण पारख बतायके जीवको भर्म छोड़ावै तब आवागमनसे रहित हो पक्का रूप पायके कन्चेका अभाव करे तब आप पारख रूप हो । पारखी आप पारख रूप-ना कहूं धोखा ना भ्रमकूप ।
दोहा—एक जीव जो स्वतह पद, बुद्धि आंतिसे काल । काल होय बहु काल सो, रचनते भयो बिहाल ॥ वेहालीको मतो जो, देव सकल बतलाय । ताने परख प्रमान लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥ करि अनुमान जो सुन्न भो, सूझै कतहुँ नाहिं । आप आप बिसरो जबै, विज्ञान देहि कह ताहिं ॥ ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान । प्रतीर्बिब झाँई लखे, साक्षी रूप बखान ॥ साक्षी है परकाश मो, महाकारन तिहि नाम । बिंब मसूर प्रमान भो, नील बरन घनश्याम ॥ बाढि बिंब अर्ध पर्व भो, सुन्नाकार स्वरूप । ताको कारन कहत है, महा अँधियारी कूप ॥ कारणते आकार भो, श्वेत अंगुष्ठ प्रमान । वेद शास्त्र सब कहत तिहि, सूक्ष्मरूप बखान ॥ सूक्ष्म रूपसे कर्म भो, कर्महिसे अस्थूल । परा जीव यहि रहटमें, सहे घनेरी झूल ॥ स्थूलते पुनि सूक्ष्म, सूक्ष्मते कारण होय । महाकारण तुरिया करी, ज्ञान देहि कह सोय ॥ सर्वसाक्षि सो ज्ञान है, रहित भयो विज्ञान । संतो सबै अनर्थ पद, यामें नहिं कल्यान ॥
स्वसप्तमवेदबोध
( ८३ )
षट् देही वर्णन करो, समझिके त्यागो मित । एक एक अब कहत हौं, जिहि प्रकार जिहि मित ॥
इति
अथ स्थूल देही वर्णन--वार्ता
स्थूल देही साढ़े तीन हाथ रक्तवरण ब्रह्मा देवता रजो गुण ॐकार मात्राका जाग्रत अवस्था बैसरी वाचा त्रिकुटी अस्थान जल तत्त्व खेचरी मुद्रा पपील मार्ग घटाकाश नेत्रस्थान सत्य- लोक विश्व अभिमानी गायत्री प्रथम पद क्षर निर्णय बङ्गवाअग्नी विषयानन्दादिक आपतत्त्व दश इन्द्री रहस मात्रका अर्थ सत्र ऋग्वेद चौदह देवता पचीस प्रकृति । इति ।
पचीस प्रकृति वर्णन
( १ ) आकाशकी प्रकृति-काम १, कोध २, लोभ ३, मोह ४, भय ५, रंग काला अहार शब्दद्वारा कान इति । ( २ ) वायुकी प्रकृति-चलना १, बोलना २, बल करना ३, पसारना ४, संकोचना ५. रंग हरा अहार गंध द्वारा नासिका इति । ( ३ ) अग्निकी प्रकृति-नींद १, जमुहार्द २, भ्रूख ३, प्यास ४, आलस ५. रंग लाल अहार देखनो द्वारा आंख । ( ४ ) जलकी प्रकृति-रक्त १, पसीना २, थूक ३, मृत ४, विद ५. रंग श्वेत अहार मैथुन द्वारा लिंग इति । ( ५ ) पृथ्वी प्रकृति- हाड १, मांस २, नाडी ३, चाम ४, रोम ५. रंग पीला द्वारा गुदा इति पचीस प्रकृति ।
चौदह देवताके नाम
मनके देवता चन्द्रमा १, बुद्धिके देवता ब्रह्मा २, चित्तके देवता नारायण ३, अहंकारके देवता शंकर ४, नेत्रके देवता सूर्य ५, कानके देवता दिशा ६, वाचाके देवता अग्नि ७, त्व-
( ८४ )
बोधसागर
चाके देवता वायु ८, नाकके देवता अश्वनीकुमार ९, जीभके देवता वरुण १०, हाथके देवता इंद्र ११, पाँवके देवता उपेन्द्र १२, लिंगके देवता प्रजापति १३, गुदाके देवता यम १४ । मुक्ति सालोक इति स्थूलदेही विस्तार ।
अथ सूक्ष्म देहीका वर्णन
लिंगदेही अंगुष्ठ बराबर ओंकार मात्रका श्वेत वर्ण विष्णु देवता स्वप्न अवस्था श्रीहटस्थान मध्यमा बाचा उर्ध्व सैन्य दीर्घ-मात्रका यजुर्वेद वैकुण्ठलोक कण्ठस्थान पालनक्रिया आप तत्त्व भूचरी मुद्रा विहंगमार्ग दुतिया पद गायत्री अक्षर निर्णय मन्दा किनी कोहं अहंकार सामीप्य मुक्ति पंचभूत सूक्ष्म प्राण अपान समान उदान व्यान चतुष्टय अन्तःकरण मन बुद्धि चित्त अहंकार शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये सूक्ष्म नौ तत्त्व कहिये, पंच ज्ञान इन्द्री पंच कर्म इन्द्री ये सब जड़ हैं; जीव प्रतापते चैतन्य होते हैं तासे जाव कहते हैं इति लिंग ।
अथ कारण देहीका वर्णन--वार्ता
कारण देही अर्ध पर्व श्याम बरण मकार मात्राका गोलहट स्थान वैसन्ती बाचा मध्य शून्य तमो गुणसामवेद चाचरी मुद्रा कपिमार्ग महदाकाश हृदयस्थान पराग्य अभिमान कंठ स्थान निर्णय उदायाग्नि तृतीया पद गायत्री अद्वैतानन्द नवीन इच्छा शक्ति सुषुप्ति अवस्था सारूपमुक्ति इति कारण देही ।
अथ महाकारण देहीका वर्णन
महा कारण देही मसूर बराबर विकार मात्रका नील वरण ईश्वर देवता हुंठ पीठ स्थान पराबाचा शून्य अर्धमात्रका अथर्वण वेद वायुतत्त्व अगोचरी मुद्रा । ज्वाला कालामीनमार्ग चिदाकाश आद्वैलोक नाभी स्थान प्रतिज्ञा विष्णु अभिमानी
स्वसमवेदबोध
( ८५ )
चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति विदेही नंद सोहं ओहं अहंकार तुरीया अवस्था प्रकाशिक सायुज्य मुक्ति इति ।
अथ ज्ञानदेहीका वर्णन वार्ता
इन चारोंको साक्षी ज्ञान देही स्वसमवेद उन मुनि बाचा स्थान भौर गुफा सदाशिव पूर्ण गिरी अनुचरीय मात्रका पूर्ण बोध अवस्था कालातीत शिष्यमार्ग निराकाश शिष्यस्थान निराश्रयलोक निरंजन अभिमानी पंचम परमारथ पद गायत्री ज्ञाननिर्णय ब्रह्मज्ञान मन ब्रह्मानंद अहंकार ज्ञानदेही ज्योति- स्वरूप कहते हैं मुक्ति में ब्रह्ममय सर्वसाक्षी, इति ज्ञानदेही ।
अथ विज्ञानदेहीका वर्णन-वार्ता
विज्ञानदेही आकाशवद् रूप रेख रहित नहीं आवै नहीं जाय नहीं उपजे नहीं विनशै नहीं भीतर नहीं बाहर ऐसा है कैसा नहीं अहंकार रहित मान अपमान रहित रूप अरूप रहित अहम् (मैं) वम् (तू) रहित वचन और निर बाच रहित इच्छा अनइच्छा रहित नाहं कर्ता नाहं भुक्ता जैसाको तैसा विज्ञान देही ना कोई जीव ना कोई मन ना कोई माया ऐसा भास विज्ञान देहीमें रहता है इति विज्ञानदेही ।
चोपाई
इसके आगे भेद हमारा । जानैगा कोइ जाननहारा ॥ कहैं कबीर जानैगा सोई । जापर दया गुरूकी होई ॥
सोरठा-यहि विधिसे यह जीव, गिरा आपने रूपसे ।
भोगे दुःख सदीव, जबलौं लहे न भूमिका ॥
चोपाई
यहि विधिजिव निजरूप बिसारे । तजि सो भूमि देह गहन्यारे ॥ तजि निजरूप और जब भासा । कहुक दौस तामैं कर बासा ॥
( ८६ )
बोधसागर
सो तन त्यागि और पुनि लेऊ । पुनि कछु काल ताहिमें रहेऊ ॥ पुनि त्याग्यौ पुनि गह्यौ नवीना । क्रम क्रम भयौ ज्ञान गुनछीना ॥ षट प्रकार गह उत्तम अंगा । पुनि पशु पक्षी कीट पतंगा ॥ नर तनमें ज्यौ पारख पावै । तौ यह जीव बहुरि घर आवै ॥ मनुज देह ज्यौ चेतन होई । तौ निश्चय जिव जाय विगोई ॥ धोखे परा जीव यहि लेखा । भांति भांतिको धारे भेषा ॥ भ्रम करि वेद कितेब बनाया । भ्रम करि द्वैताद्वैत बताया ॥ भ्रम करि कर्म धर्म ठहराया । भ्रम करि बड़ बानी कथि गाया ॥ भर्मको धर्म सकल जग माहीं । सब जिव बले भर्मकी छाहीं ॥ भ्रम करिके षट दर्शन थापा । भ्रम करिके जिव लखै न आपा ॥ भ्रम करि ईश्वर दूर बताया । विरही बने सकल जग जाया ॥ भ्रम करि इत उत दूँदन लागे । भ्रम करि प्रेम भक्तिमें पागे ॥ धोखे परा सकल संसारा । बिन सतगुरु भ्रम टरे न टारा ॥ सारशब्द सतगुरुको पावै । सब धोखा भ्रम दूरि बहावै ॥
दोहा-ब्रह्मादिक सनकादिक, भ्रम करि बानी गाय । ता बानी भ्रम विष चढ़ा, जीव गये गफिलाय ॥ तिहि कारन आसा लगी, आवा गौनको मूल । पछो ताते सात फुटि, जीव सहे बहु शूल ॥
इति
अथ सात बीज वर्णन
ॐ श्रीं रं सौं रौं ह्रीं क्लीं. अ इ उ ए व म ह ।
चोपाई
सात बीज यह कह्यौ बखानी । ताते पुनि अंकुर उत्पानी ॥ क्रम ऊपाछा योग रु ज्ञानी । उत्तपति स्थितिप्रलय विधिनाना ॥ सातो अंकुरे जब चाली । चित्तरूप तब गहौ कुदाली ॥
स्वसम्बन्धवोध
( ८७ )
गोडन लगे नित प्रति वाही । बुद्धिके जलते सींचा ताही ॥ आलबाल हंकार बनाया । मन रूपी तहैं खाद डराया ॥ अंतःकरण भूमिका माही । नित नौ पल्लव फूटै ताही ॥ नाना क्रम उपाछा नाना । नाना योग अरु नाना ज्ञाना ॥ नाना उत्तपति स्थित है नाना । प्रलय अनंत न जाय बखाना ॥ एक एक प्रति नाना बानी । नाममात्र कहि तासु बखानी ॥ सात बीज गुरुवन मिलि बोये । प्रथम सुभेच्छा नाम कहाये ॥ पुनि सुविचार दूसरे कहिये । तनोमानसा तृतिये गहिये ॥ सत्त्वापति चौथे कहि दीजै । असंशक्ति पंचम गनि लीजै ॥ छठे पदार्थ अभावनी भाषा । तुरिया नाम सप्तमे राखा ॥ बोये सात बीज जब येही । अंकुरे निकसे फुटि तेही ॥ प्रथमै सो अब करों बखाना । जाते ज्ञानकेर बंधाना ॥ सोहं बीजको अंकुर ज्ञाना । आलबाल भक्तिमय साना ॥ सींचा ताहि प्रेमकी बारी । ताने नित नौ पल्लव धारी ॥
दोहा-शुभ इच्छादिक सात ये, तिनप्रति बानी भूर ।
पल्लव तिनते बहु फुटी, रही जक्त भर पूर ॥
ज्ञान परोक्ष है फूल तिहि, फल अपरोक्ष जो ज्ञान ।
दो बिधि ज्ञान प्रमानमें, जक्त जीव अरुज्ञान ॥
चौपाई
दुतिये अकार कर्म कहि गावो । ताते क्रम अंकूर उगावो ॥ भय करि आलबाल कर ताही । लोभके जलते सींचा वाही ॥ तामें सात साष कर थापन । यजन याजन अध्यन अध्यापन ॥ दान प्रतिग्रह मैथुन गानी । सातो क्रमकी नाना बानी ॥ बानीते पल्लव बहुतेरो । फूल बासना ताको हेरो ॥ पुण्य पाप द्वै फूल सो आना । कर्म करै यह कीन बखाना ॥
( ८८ )
बोधसागर
पुनि तृतिये अब देहुँ बताई । श्री उपाछा बीज कहाई ॥ तिहि उपाछा अंकुर आया । आलबाल मरजाद बनाया ॥ भावके जलते सींचा ताहीं । सात साख फूटी तिहि माहीं ॥ शिव विष्णू गणपति रवि होई । शक्ती राम कृष्ण सातोई ॥ पल्लव ताहि न फूटी थोरी । महामंत्र जो सात करोरी ॥
दोहा—जारन मारन बसकरन, उच्चाटन, उच्चार ।
आकर्षण अरुंधभनो, मोहन सप्त विचार ॥
तिनमें लागे फल रुचिर, लोकादिक बहु फूल ।
आब चौथो वर्णन करौं, योग धर्मको मूल ॥
बीपाई
योग बीज रंकी न प्रमाना । ताते योग अंकुर बिकसाना ॥
किरिया आलबाल कर ताको । साधन जलते सींचा वाको ॥
शास्त्र पतञ्जल पल्लव गायौ । सात साख तामें फहि आयौ ॥
प्रथमें सो हठयोग बतावो । बहुरि योग लय नाम कहावो ॥
योग कुंडली तीजे बरना । पुनि लंबिका योग चित धरना ॥
पंचम तारक योग बताई । षष्ठ योग अमनसकहि गाई ॥
योग सारुय सप्तम गुणगाहा । फूल समाध बखानो ताहा ॥
अणिमादिक सिद्धी फल अहई । अब उत्तपत्य भेद विधि कहई ॥
ए उत्तपत्य बीज बतलाया । तामें उत्तपति अंकुर आया ॥
विषया आलबाल कर जाही । बानी जलते सींचा वाही ॥
उत्तपति साख सात प्रकटानी । जाते चारो खानि बखानी ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गंधा । बहुरि वासना इच्छा बंधा ॥
शब्दते मेघ कीट बहु आही । दाडुर आदिक उत्तपति जाही ॥
बहुरि स्पर्श अरु मैथुन गाया । जीव मैथुनी ताते जाया ॥
तृतिये रूप कि उत्तपति ठाना । अनल विहंग आदि जिव नाना ॥