कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
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एक झाँई परी । ता झाँईको सब ब्रह्म सच्चिदानंद कहते हैं, ता आनंदमें जीव बूड़ा तब तत्त्व प्रकृति पलटी । पक्केसे कच्चा रूप हुआ । आपा की खबर न रही । तब पाँच पक्के तत्त्वसे पाँच कच्चे तत्त्व भये । धीरजसे आकाश १, दयासे वायु २, शीतलसे तेज ३, विचारसे जल ४, सत्यसे धरती ५ पक्केसे ये पाँच कच्चे तत्त्व भये ताके तीन गुण कच्चे भये । धरती और जलसे सतो गुण भया १, अग्नि और वायुसे रजोगुण भया २, आकाशसे तमोगुण भया ३, पाँच कच्चे तत्त्वकी पचीस प्रकृति भई ये विकारकी देह भई । ताको नाम स्थूल मनमानता ते मानुष कहिये । तब हंकार हुआ कि मैं करता, तासे इच्छा भई ता इच्छाको नारीरूप भया, तासों भोग किया, फिर वह रूप विनसि गया, नारी गर्भसे तीन रूप पैदा भये । १ जीव, ताते मन २, मनसे ज्योति ३, ज्योतिसे त्रिगुण । रजो गुण ब्रह्मा १, सतो गुण विष्णु २, तमो गुण शिव ३ ये त्रिगुण ऐसे भये । जब पक्केसे कच्चा भया तब सम्पूर्ण सृष्टि चार खानी चौरासी लक्ष योनि पैदा भई । आपही अनेक रूप धरि अनेकयोनियोंमें भर्मता है, गफलतसे अपनी भूमिका छोड़ा, जब बहुत दुःख पाया तब अपने मनसे कल्पना किया कि हमारा कर्ता कोई दूसरा है, फिर अनुमानते करता निश्चय किया ता करताके प्रेममें बहुत वेद शास्त्र आदिक बानी बनाया, फिर आप ही उसको खोजने लगा तब कहा कि मालिक निर्गुण निराकार है तब सब वृत्ति थकित भई तब आप ही ब्रह्म कहाय अनुभव करिके संपूर्ण जक्त आपही हो रहा है इस प्रकारसे ब्रह्मसे सृष्टि और सृष्टिसे ब्रह्म रहटमें परा जीवको कहीं निश्चय नहीं दोनों प्रकारसे
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