कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1458, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८२ )
बोधसागर
कष्ट पावता है जो साधुनकी सेवा करे और बड़े भाग उदय हों तो पारखी गुरु मिले और पूर्ण पारख बतायके जीवको भर्म छोड़ावै तब आवागमनसे रहित हो पक्का रूप पायके कन्चेका अभाव करे तब आप पारख रूप हो । पारखी आप पारख रूप-ना कहूं धोखा ना भ्रमकूप ।
दोहा—एक जीव जो स्वतह पद, बुद्धि आंतिसे काल । काल होय बहु काल सो, रचनते भयो बिहाल ॥ वेहालीको मतो जो, देव सकल बतलाय । ताने परख प्रमान लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥ करि अनुमान जो सुन्न भो, सूझै कतहुँ नाहिं । आप आप बिसरो जबै, विज्ञान देहि कह ताहिं ॥ ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान । प्रतीर्बिब झाँई लखे, साक्षी रूप बखान ॥ साक्षी है परकाश मो, महाकारन तिहि नाम । बिंब मसूर प्रमान भो, नील बरन घनश्याम ॥ बाढि बिंब अर्ध पर्व भो, सुन्नाकार स्वरूप । ताको कारन कहत है, महा अँधियारी कूप ॥ कारणते आकार भो, श्वेत अंगुष्ठ प्रमान । वेद शास्त्र सब कहत तिहि, सूक्ष्मरूप बखान ॥ सूक्ष्म रूपसे कर्म भो, कर्महिसे अस्थूल । परा जीव यहि रहटमें, सहे घनेरी झूल ॥ स्थूलते पुनि सूक्ष्म, सूक्ष्मते कारण होय । महाकारण तुरिया करी, ज्ञान देहि कह सोय ॥ सर्वसाक्षि सो ज्ञान है, रहित भयो विज्ञान । संतो सबै अनर्थ पद, यामें नहिं कल्यान ॥