भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

बुद्धिभ्रांति भै जिवकी जबते । काल दयाल प्रकट भै तबते ॥ आप काल है काल उषाया । आपै फँसा आप दुख पाया ॥

वार्ता

प्रथम जीव पक्के रूपमें हता तब दूसरा ना हता । पक्के तत्त्वके नाम-सत्य १, विचार २, शील ३, दया ४, धीरज ५ इन पाँच पक्के तत्त्वका रूप हंसाका था, ताके तीन गुण पक्के गुण हते । अथ सत्य और विचारको गुण-विवेक १. अथ शील और दयाका गुण-गुरु भक्ति साधु भाव २. अथ धीरजको गुण-बैराग ३ ये पक्के तीन गुण हते तामें हंसा रहा ।

पचीस प्रकृति वर्णन

१ सत्यकी प्रकृति निर्णय-१ निर्बेध, २ प्रकार, ३ थीर, ४ छमा ५ इति ।

२ विचारकी प्रकृति-अस्ति १ नास्ति पदमें भान २, यथार्थ ३, शुद्धभाव ४, सत्यता ५ इति ।

३ शीलकी प्रकृति-शुधा निवारन १, प्रियवचन २, शांति बुद्धि ३, प्रत्यक्ष पारख ४, सब सुख प्रकट ५ इति ।

४ दयाकी प्रकृति-अद्रोह १, मित्रजीव २, सम ३, अभय ४, समदृष्टि ५ इति ।

५ धीरजकी प्रकृति-मिथ्या त्याग १, सत्यग्रहण २, निस्संदेह ३, हंतानासने ४, अचल ५ इति ।

ये पाँच तत्त्वकी पचीस प्रकृति हैं तामें हंसाको बासा हता तब कच्छा तत्त्व ना हता । पक्के तत्त्वका पक्का देह हता, तब कछु अनुमान ना हता । जब ऐसी अपनी देह देखा और सुंदरता माना तब बहुत आनंद हुआ । ता आनंदमें हंसा मिला तब आप अपनेको भूल गया, गफलत पैदा भई । ता गफलतमें