भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1454

( ७८ )

बोधसागर

पद पराग अनुराग हटाईं । कर बहु अम्बर मणिछबिछाईं॥ चरण सलिल सरि मज्जन पाना । युगयुगको कलिकलुषनसाना ॥ महा प्रसाद प्रसादी पाईं । कोटिन युगकी छुधा बुझाईं ॥ धर्मदास पद प्रथम नमासी । ता पीछे करुणामय स्वामी ॥ वंश बयालिस जगमें जिनको । कोटि प्रनाम हमारा तिनको ॥ चार गुरु निज सतगुरु दासा । जिन्हेंन प्रभु तजि दूरारि आसा ॥ मन क्रम बच गुरु चरनन चेरो । तिनप्रति बहु अभिवंदन मेरो ॥ सतगुरु अंशनको बहु बारी । बदि चरनरज निजसिर धारी ॥ जिन जिन सन्त मोहि उपदेशा । धर्मधामको कह्यो संदेशा ॥ प्रणवों कोटि बार कर जोरी । जिनकी कृपा विमल मति मोरी ॥ जो गुरु पद पंकज प्रिय पागे । बन्दों सबहि सहित अनुरागे ॥ पुनि बन्दों सन्तनके चरना । गुरुस्वरूप कह्यु भेद न बरना ॥ साहिब सन्त एक जिन जाना । तिनको आवागवन नसाना ॥ नमों बहुरि कवि कुल समुदाईं । सत्य कबीर चिन्ह जिन पाईं ॥ भे अरु अहैं भव्य बहुतेरो । तिन प्रति बिनय दीनता मेरो ॥ उमैगि उमैगि जो गुरुगुन गावै । कोटिन जीव लोक पहुँचावै ॥ जड चेतन जहैं लगजगजाया । रचना विविधि विरंचि बनाया ॥ साधु असाधु सूर अरु कूरा । भोजन विविधि एकरस पूरा ॥ सत्य सुकृत सबमाहिं निहारौं । जोरि जुगुल कर सकल जोहारौं ॥ सब मिलि कृपा कीजिये सोईं । भणित मोर मङ्गलमय होईं ॥ कबि न होउ नहिं चतुर सयाना । काव्य भेद रस भेद न जाना ॥ कथ्यौ कथा सतगुरुकी आसा । बुधजन लखि न करै परिहासा ॥ बार बार गुरु पद शिर नाईं । धर्म कबीर मर्म अब गाईं ॥

इति मंगलाचरण