भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वसमवेदबोध

( ९९ )

तिहि अस्थान पहुँचे जाईं । नहिं तिहँ रवि शशि सुत्र रहाईं॥ बहुविधि अस्तुति करे बनाईं । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाईं॥ करते ध्यान गये युग चारी । माता शोच पुत्रकर भारी ॥ ब्रह्मा तात दरश नहिं पावा । शून्य ध्यान युग चारि गँवावा ॥ किहि विधि रचना रची बनाईं । ब्रह्मा आवै कौन उपाईं ॥ उषटि शरीर मैल गहि काढ़ी । पुत्रीरूप कीन रचि ठाढ़ी ॥ शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री तासु धरावा ॥ गायत्री मातहि शिर नावा । चरन टेकि रज शीस चढ़ावा ॥ गायत्री बिनवै कर जोरी । सुन जननी बिनती यक मोरी ॥ कौन काज मोंकह निरमाईं । कहो वचन लेवैं शीस चढ़ाईं ॥ कह अद्या पुत्री सुन बाता । ब्रह्मा आहि जेठ तव आता ॥ पिता दरश कहँ गये अकाशा । आनहु ताहि वचन प्रकाशा ॥ दरश तातको वह नहिं पावै । खोजत खोजत जन्म सिरावै ॥ जौनी विधि वह ईहां आईं । करहु जाय तुम तौन उपाईं ॥ चलि गायत्री मारग जाईं । जननी बचन प्रीति चित लाईं ॥ गायत्री पहुँची तहँ जाईं । ब्रह्मा जहाँ समाधि लगाईं ॥ लगी समाधि ब्रह्मकी गाढी । गायत्री शोचे तहँ ठाढी ॥ केते धौस रही सो ताहीं । ब्रह्मा पलक उधारे नाहीं ॥ गायत्री तब शोचन लागी । कौन भाँति ब्रह्मा अब जागी ॥ निजु मनमें बहुतै अनुमानी । आद्या ताके ध्यान समानी ॥ आद्या ध्यानमें ताहि सिवाईं । परसो निजकर ब्रह्मा पाईं ॥ गायत्री पुनि कीनेहु तैसो । जननी युक्ति बतायो जैसो ॥ तिहि औसरसो मन चितलाईं । परस्यौ ब्रह्म चरन तब जाईं ॥ ब्रह्मा योग ध्यान चित डोला । व्याकुल भयो ब्रह्म अम बोला ॥ कौन आहि पापिन अपराधी । काहेको मोर छोडाय समाधी ॥