भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ९८ )

बोधसागर

तब माता पुत्रन कहि टेरा । यह तो काज भयौ सुत तेरा ॥ सावित्री ब्रह्माको दीना । विष्णु लक्ष्मीको बरि लीना ॥ पारवती शंकरको ब्याहा । नारि पाय अतिमनहि उछाहा ॥ काम विवशभे तीनों भाई । देव दनुज सब ही प्रकटाई ॥ जननी पुनि पुत्रन समुझावो । सागर मथन फेरि तुम जावो ॥ जो जिहि मिले लेहु तुम सोई । तीनों पुत्र चलत तब होई ॥

सोरठा-रश्म न लायौ बार, चले तिहुँ सुत सिंधुतट ।

मथ्यौ ताहि चित धार, निकसे चौदह रतन तब ॥

चौपाई

चौदह रत्न निकस जिहि बारी । लै जननीके सम्मुख धारी ॥ माताके जब आगे कीना । ताने बांटि तिहुँको दीना ॥ पायौ वेद सो ब्रह्मा लीनो । पढ़ि गुनिके विचार सो कीनो ॥ ब्रह्मा वेद पढ़न जब लागा । पढ़त वेद तब भौ अनुरागा ॥ कहै वेद पुरुष यक आही । निराकार जिहि रूप न छाही ॥ सत्य माई सो रूप देखावत । चितवत दृष्टि नजर नहि आवत ॥ स्वर्ग सीस पग आहि पताला । यह सब देखो ताको रुयाला ॥ ब्रह्मा विष्णुसे कह समुझाई । तुमहू शंख सुनो चितलाई ॥ आदि पुरुष यक वेद बतावा । वेद कहै हम भेद न पावा ॥ तब ब्रह्मा माता ढिग आये । करि प्रनाम तेहि शीस नवाये ॥ हे माता मोहि वेद बतावा । सिरजनहार और बतलावा ॥

दोहा-ब्रह्मासे माता कहे, सुन सुत मेरी बात ।

सप्त स्वर्ग है शीस जिहि, चरण पताल है तात ॥

जौ इच्छा तोहि दरशकी, पुष्प लेहु तुम हाथ ।

बेगि सिधारो ताहि ढिग, जाय नवावो माथ ॥

चौपाई

ब्रह्मा मातहि शीस नवाई । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥