कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १७ )
जब जननी अस बचन उचारा । सुनि संसै कर तिहूँ कुमारा ॥ माता कपट कीन हमपाहीं । पिताको भेद बतावत नाही ॥ तीनो बालक ताते रूठै । जननी बचन कहैं सब झूठै ॥ तब माता बोली रिसिआई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥ माता कह तुम पुष्प चढ़ाओ । पिताको शीस परसिके आवो ॥ चले जो पुत्र पिताकी आसा । पिता रहै पुत्रनके पास ॥ खोजत खोजत कतहुँ न पाई । रहे निरंजन सुन्न समाई ॥ लगी समाधि निरंजन तारी । निकसे वेद श्वास सँग चारी ॥ ऋग अरु यजुर अथरबन सामा । धरि तन रटहि निरंजननामा ॥ निरंकारकी अस्तुति करही । देव निरंजन गुन उच्चरही ॥ देव निरंजन दृष्टि न आवै । ज्योतिज्योति कहि श्रुतिगुणगावै तिहिमें वेद निरखै निज नैना । अनुमानहिते भाखे वैना ॥ वेदन प्रति नभ बचन सुनाई । बासा करहु सिंधुमें जाई ॥ आज्ञा दियौ निरंजन राई । बसो वेद सागरमें आई ॥ बहुरि निरंजन सैन लखाई । आद्यासे अस कहौ बुझाई ॥ निज पुत्रनको आज्ञा दीजै । सिंधु मथनको उद्यम कीजै ॥ तब आद्या अस युक्ति बनाई । तीन सुता निज अंग उपाई ॥ पुत्रिन कह अस आज्ञा दीनों । बसहु जाय सागरमें तीनों ॥ माताको अस आयसु पाई । तीनों सिंधुमें गई समाई ॥ यह चरित्र जननी जो ठाना । ब्रह्मा विष्णु शंभु नहि जाना ॥ राखा गुप्त न मर्म बताया । आद्या सुतनसे बचन सुनाया ॥ सागर मथन जाहु मम वारा । पैहो वस्तु महा सुखसारा ॥ माताकी जब आज्ञा पाई । चले तिहूँ तिहि शीस नवाई ॥ मथ्यौ जाय सागरको सोई । कन्या तीन प्रकट तब होई ॥ तीनो कन्या जबही पाये । हर्षसमेत मातु ढिग आये ॥
बो० सा०