भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १६ )

बोधसागर

कहै निरञ्जन कामिनि पाही । पुरुष ढिग अब हम नहीं जाई॥ पुरुष लोक इहाँ रचि लीजे । यकछत राज हमहि तुम कीजे॥ अब तौ पुरुष आस नहीं मोही । गहिके बाह राखि हो तोही ॥

छन्द-भग ना हतो तिहि नारिके नख फारि कीन निरञ्जना । यमसाट जिव जेहि बाट विचरे घाट उत्पतिको बना ॥ भग भोग प्रथम सँयोग सोई कैल आद्या सो ठना । भे प्रकट ब्रह्मा विष्णु शंकर त्रिगुन भव निधि रंजना॥

अथ त्रिदेवकी जन्मकथा वर्णन-चोपाई

काल कल्लुङ्ग जब गयौ सिराई । रूपरंग कन्या तन छाई ॥ जब भलि भांति रंग तन भीना । कन्या कैल व्याह सँग कीना ॥ कूर्मको तीन शीस जो रहेऊ । कैल काटिके भक्षण कियऊ ॥ ताते तीन अंश प्रकटाने । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने ॥ देव निरंजन आदि कुमारी । केते काल कीनो सुख भारी ॥ कैल अरु कामिनि भोग बिलासा । स्वसमवेद भलिभांति प्रकाशा ॥ तीनो सुत जिहि काल उपाई । धर्मराय तब गयौ लुपाई ॥ राजपाट आद्याको दीना । सुत्रमाहँ निज बासा कीना ॥ कह्यो निरंजन आद्या पासा । मेरो भेद न करहु प्रकाशा ॥ पुत्रनसे जनि बात जनावो । मेरो भेद न तिनहि सुनावो ॥ यतन अनेक ध्यान जौ लैहैं । तो मम दर्श पुत्र नहीं पैहैं ॥ यह कहि शून्यमें गयो समाई । योगसमाधि निरञ्जन लाई ॥ मातासे सुत पूछे बाता । पिता हमार कहाँ है माता ॥ पुत्रनते कह आदि भवानी । पिता तुमार हमहुँ नहीं जानी ॥ रचना सकल हमहिते होई । हम तुम तुम हम और न कोई ॥ तुमहो पुरुष हमहि तोर जोई । हम तुम दूसर और न कोई ॥ हम हैं पिता हम ही हैं माता । हम ही तीन लोकके दाता ॥

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