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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १६ )

बोधसागर

कहै निरञ्जन कामिनि पाही । पुरुष ढिग अब हम नहीं जाई॥ पुरुष लोक इहाँ रचि लीजे । यकछत राज हमहि तुम कीजे॥ अब तौ पुरुष आस नहीं मोही । गहिके बाह राखि हो तोही ॥

छन्द-भग ना हतो तिहि नारिके नख फारि कीन निरञ्जना । यमसाट जिव जेहि बाट विचरे घाट उत्पतिको बना ॥ भग भोग प्रथम सँयोग सोई कैल आद्या सो ठना । भे प्रकट ब्रह्मा विष्णु शंकर त्रिगुन भव निधि रंजना॥

अथ त्रिदेवकी जन्मकथा वर्णन-चोपाई

काल कल्लुङ्ग जब गयौ सिराई । रूपरंग कन्या तन छाई ॥ जब भलि भांति रंग तन भीना । कन्या कैल व्याह सँग कीना ॥ कूर्मको तीन शीस जो रहेऊ । कैल काटिके भक्षण कियऊ ॥ ताते तीन अंश प्रकटाने । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने ॥ देव निरंजन आदि कुमारी । केते काल कीनो सुख भारी ॥ कैल अरु कामिनि भोग बिलासा । स्वसमवेद भलिभांति प्रकाशा ॥ तीनो सुत जिहि काल उपाई । धर्मराय तब गयौ लुपाई ॥ राजपाट आद्याको दीना । सुत्रमाहँ निज बासा कीना ॥ कह्यो निरंजन आद्या पासा । मेरो भेद न करहु प्रकाशा ॥ पुत्रनसे जनि बात जनावो । मेरो भेद न तिनहि सुनावो ॥ यतन अनेक ध्यान जौ लैहैं । तो मम दर्श पुत्र नहीं पैहैं ॥ यह कहि शून्यमें गयो समाई । योगसमाधि निरञ्जन लाई ॥ मातासे सुत पूछे बाता । पिता हमार कहाँ है माता ॥ पुत्रनते कह आदि भवानी । पिता तुमार हमहुँ नहीं जानी ॥ रचना सकल हमहिते होई । हम तुम तुम हम और न कोई ॥ तुमहो पुरुष हमहि तोर जोई । हम तुम दूसर और न कोई ॥ हम हैं पिता हम ही हैं माता । हम ही तीन लोकके दाता ॥

स्वसमवेदबोध

( १७ )

जब जननी अस बचन उचारा । सुनि संसै कर तिहूँ कुमारा ॥ माता कपट कीन हमपाहीं । पिताको भेद बतावत नाही ॥ तीनो बालक ताते रूठै । जननी बचन कहैं सब झूठै ॥ तब माता बोली रिसिआई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥ माता कह तुम पुष्प चढ़ाओ । पिताको शीस परसिके आवो ॥ चले जो पुत्र पिताकी आसा । पिता रहै पुत्रनके पास ॥ खोजत खोजत कतहुँ न पाई । रहे निरंजन सुन्न समाई ॥ लगी समाधि निरंजन तारी । निकसे वेद श्वास सँग चारी ॥ ऋग अरु यजुर अथरबन सामा । धरि तन रटहि निरंजननामा ॥ निरंकारकी अस्तुति करही । देव निरंजन गुन उच्चरही ॥ देव निरंजन दृष्टि न आवै । ज्योतिज्योति कहि श्रुतिगुणगावै तिहिमें वेद निरखै निज नैना । अनुमानहिते भाखे वैना ॥ वेदन प्रति नभ बचन सुनाई । बासा करहु सिंधुमें जाई ॥ आज्ञा दियौ निरंजन राई । बसो वेद सागरमें आई ॥ बहुरि निरंजन सैन लखाई । आद्यासे अस कहौ बुझाई ॥ निज पुत्रनको आज्ञा दीजै । सिंधु मथनको उद्यम कीजै ॥ तब आद्या अस युक्ति बनाई । तीन सुता निज अंग उपाई ॥ पुत्रिन कह अस आज्ञा दीनों । बसहु जाय सागरमें तीनों ॥ माताको अस आयसु पाई । तीनों सिंधुमें गई समाई ॥ यह चरित्र जननी जो ठाना । ब्रह्मा विष्णु शंभु नहि जाना ॥ राखा गुप्त न मर्म बताया । आद्या सुतनसे बचन सुनाया ॥ सागर मथन जाहु मम वारा । पैहो वस्तु महा सुखसारा ॥ माताकी जब आज्ञा पाई । चले तिहूँ तिहि शीस नवाई ॥ मथ्यौ जाय सागरको सोई । कन्या तीन प्रकट तब होई ॥ तीनो कन्या जबही पाये । हर्षसमेत मातु ढिग आये ॥

बो० सा०

( ९८ )

बोधसागर

तब माता पुत्रन कहि टेरा । यह तो काज भयौ सुत तेरा ॥ सावित्री ब्रह्माको दीना । विष्णु लक्ष्मीको बरि लीना ॥ पारवती शंकरको ब्याहा । नारि पाय अतिमनहि उछाहा ॥ काम विवशभे तीनों भाई । देव दनुज सब ही प्रकटाई ॥ जननी पुनि पुत्रन समुझावो । सागर मथन फेरि तुम जावो ॥ जो जिहि मिले लेहु तुम सोई । तीनों पुत्र चलत तब होई ॥

सोरठा-रश्म न लायौ बार, चले तिहुँ सुत सिंधुतट ।

मथ्यौ ताहि चित धार, निकसे चौदह रतन तब ॥

चौपाई

चौदह रत्न निकस जिहि बारी । लै जननीके सम्मुख धारी ॥ माताके जब आगे कीना । ताने बांटि तिहुँको दीना ॥ पायौ वेद सो ब्रह्मा लीनो । पढ़ि गुनिके विचार सो कीनो ॥ ब्रह्मा वेद पढ़न जब लागा । पढ़त वेद तब भौ अनुरागा ॥ कहै वेद पुरुष यक आही । निराकार जिहि रूप न छाही ॥ सत्य माई सो रूप देखावत । चितवत दृष्टि नजर नहि आवत ॥ स्वर्ग सीस पग आहि पताला । यह सब देखो ताको रुयाला ॥ ब्रह्मा विष्णुसे कह समुझाई । तुमहू शंख सुनो चितलाई ॥ आदि पुरुष यक वेद बतावा । वेद कहै हम भेद न पावा ॥ तब ब्रह्मा माता ढिग आये । करि प्रनाम तेहि शीस नवाये ॥ हे माता मोहि वेद बतावा । सिरजनहार और बतलावा ॥

दोहा-ब्रह्मासे माता कहे, सुन सुत मेरी बात ।

सप्त स्वर्ग है शीस जिहि, चरण पताल है तात ॥

जौ इच्छा तोहि दरशकी, पुष्प लेहु तुम हाथ ।

बेगि सिधारो ताहि ढिग, जाय नवावो माथ ॥

चौपाई

ब्रह्मा मातहि शीस नवाई । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥

स्वसमवेदबोध

( ९९ )

तिहि अस्थान पहुँचे जाईं । नहिं तिहँ रवि शशि सुत्र रहाईं॥ बहुविधि अस्तुति करे बनाईं । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाईं॥ करते ध्यान गये युग चारी । माता शोच पुत्रकर भारी ॥ ब्रह्मा तात दरश नहिं पावा । शून्य ध्यान युग चारि गँवावा ॥ किहि विधि रचना रची बनाईं । ब्रह्मा आवै कौन उपाईं ॥ उषटि शरीर मैल गहि काढ़ी । पुत्रीरूप कीन रचि ठाढ़ी ॥ शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री तासु धरावा ॥ गायत्री मातहि शिर नावा । चरन टेकि रज शीस चढ़ावा ॥ गायत्री बिनवै कर जोरी । सुन जननी बिनती यक मोरी ॥ कौन काज मोंकह निरमाईं । कहो वचन लेवैं शीस चढ़ाईं ॥ कह अद्या पुत्री सुन बाता । ब्रह्मा आहि जेठ तव आता ॥ पिता दरश कहँ गये अकाशा । आनहु ताहि वचन प्रकाशा ॥ दरश तातको वह नहिं पावै । खोजत खोजत जन्म सिरावै ॥ जौनी विधि वह ईहां आईं । करहु जाय तुम तौन उपाईं ॥ चलि गायत्री मारग जाईं । जननी बचन प्रीति चित लाईं ॥ गायत्री पहुँची तहँ जाईं । ब्रह्मा जहाँ समाधि लगाईं ॥ लगी समाधि ब्रह्मकी गाढी । गायत्री शोचे तहँ ठाढी ॥ केते धौस रही सो ताहीं । ब्रह्मा पलक उधारे नाहीं ॥ गायत्री तब शोचन लागी । कौन भाँति ब्रह्मा अब जागी ॥ निजु मनमें बहुतै अनुमानी । आद्या ताके ध्यान समानी ॥ आद्या ध्यानमें ताहि सिवाईं । परसो निजकर ब्रह्मा पाईं ॥ गायत्री पुनि कीनेहु तैसो । जननी युक्ति बतायो जैसो ॥ तिहि औसरसो मन चितलाईं । परस्यौ ब्रह्म चरन तब जाईं ॥ ब्रह्मा योग ध्यान चित डोला । व्याकुल भयो ब्रह्म अम बोला ॥ कौन आहि पापिन अपराधी । काहेको मोर छोडाय समाधी ॥

( १०० )

बोधसागर

शाप देब तोको हम जानी । पिता ध्यान खंडेहु मोर आनी॥ कह गायत्री मोहि न पाया । बृक्षि लेव तब देहो आपा ॥ कहौं तोहिते सांची बाता । तोहि लेन पठयौ तो माता ॥ चलहु बेगि जननी पहुँ जाई । तुम बिन रचना होय न भाई ॥ ब्रह्मा कहैं कौन विधि जाई । पिता दरश अजहूं नहि पाई ॥ कह गायत्री दरशन पैहो । चलहु बेगि नहि तो पछितैहो ॥ ब्रह्मा कहैं देहु तुम सार्वी । परस्यौ शीस देखा मैं आँखी ॥ ऐसो कहो मातु समुझाई । तब तुमरे सँग हम चलिजाई ॥ गायत्री कह यह है स्वारथ । कहब जानि मैं पुनि परमारथ ॥ यहि विधि बोलब झूठी बाता । कौनी विधि तौ बूझे माता ॥ पुष्प गायत्री ब्रह्मा तीनी । एकमता तिहि औसर कीनी ॥ तीनों मिलिके चलि भये तहँवा । कन्या आदि कुमारी जहँवा ॥ करि प्रणाम सम्मुख रह जाई । माता सब पूछी कुशलार्ई ॥ कैसे दरश भो पिता सुभाऊ । ब्रह्मा सो सब मोहि सुनाऊ ॥ कहैं ब्रह्म दोनों हैं सार्वी । परस्यौ शीस देखा इन आँखी ॥ तब माता बूझै अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी ॥ तुम देखा इन दर्शन पावा । कहो सत्य दरशन परभावा ॥ तब गायत्री बचन सुनावा । ब्रह्मा दरश शीस पितु पावा ॥ मैं देखा इन परस्यो शीसा । ब्रह्माही मील्यौ जगदीशा ॥

छंद-ले पुष्प परस्यौ शीस पितु इन दृष्टिमें देखत रही । जल ढारि पुष्प चढ़ाय दीनों हे जननि है यह सही ॥ माता कहे पुष्पावतीसे कहो सत्यहि मोसना । जो चढ़ेहु शीसपिताके तुम मोसे कहो तुम ततछना ॥

सोरठा-कहु पुष्पावति मोहिं, दरसकथा निरुवारिके । यह बूझौं मैं तोहिं, जिमि ब्रह्मा दरशन कियौ ॥

स्वसमवेदबोध

( १०१ )

चौपाई

पुष्पावती वचन अस बोले । माता सत्य वचन नहिं डोले ॥ दरसन शीस लह्यौ चतुरानन । चढ़न शीस यह धरिनिश्चलमन ॥ शाप सुनत आद्या अकुलानी । यह अचरज भो मरम न जानी ॥ अलखनिरंजन असपुनिभाखी । मोकहैं कोइ न देखे आंखी ॥ तीनों बोलैं झूठी बानी । सुनि माता बहुतै अकुलानी ॥ यह सुनि माता कीनेहु दापा । ब्रह्माको पुनि दीनेसु शापा ॥ पूजा तोर करे कोइ नाही । जो मिथ्या बोल्यौ हम पाही ॥ आगे ह्वैहै शाप तुम्हारा । मिथ्या पाप करे बहु भारा ॥ प्रकट नियम बहु करै अचारा । अंतरमैल पाप विस्तारा ॥ विष्णु भक्तसे कर हंकारा । ताते परे नरककी धारा ॥ कथा पुराण औरन समुझावै । चाल बिहीन आप दुख पावै ॥ उनत और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहो प्रमाना ॥ देवन पूजा, बहुबिधि लावै । दछिना कारन गलाकटावै ॥ जाकह शीस करे पुनि जाई । परमारथ तिहि नाहिं हढ़ाई ॥ अपने स्वारथ ज्ञान सुनैहै । आपन पूजा जगहि हढ़ैहै ॥ परमारथके निकट न जाई । स्वारथ अरथ सबै समुझाई ॥ गायत्री तोर वृषभ भतारा । पाँच सात अरु बहुत पसारा ॥ धरि औतार अखज तुम खाई । बहुत झूठ तुम वचन सुनाई ॥ सुनो पुष्प तुमरो विश्वासा । होय विगंध मध्य तौ बासा ॥ जो तोहि सींच लगावै आनी । ताकर होय वंशकी हानी ॥ अब तुम जाय धरो औतारा । केवडा केतकी नाम तुमारा ॥ छंद-शाप तीनोंको दियो मनमाहैं तब पछितावई । कैसे करे मोहि निरंजन पल छमा मोहि न आवई ॥ आकाश बानी तब भई यह कहाँकी नभ बानिया । उत्पत्ति कारन तोहि पठयौ कह चरित यह ठानिया ॥

( १०२ )

बोधसागर

सोरठा-नीचहि ऊँच सताव, ओल मोहिते पाय हो । द्वापर युग जब आव, तोहि पाँच भरतार हो ॥

चौपाई

शाप ओल जब सुने भवानी । मनमें गुने कहे नहि बानी ॥ ओल प्रभाव आपते पाई । अब कह करो निरंजन राई ॥ तुमरी वशय परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥ आई माता विष्णु दुलारा । सुनहु विष्णु यक बचन हमारा ॥ अब तुम बेगि पिता लगि जाई । बेगि पिताको परसहु पाई ॥ आज्ञा पाय विष्णु तब चाला । पिता दरश कहै गये पताला ॥ अछत पुष्प लीने कर माहीं । चले पताल पंथ गम नाहीं ॥ पहुँचे शेष नाग पहुँ जाई । विषके तेज विष्णु अलसाई ॥ भयौ श्याम विष तेज समावा । निरंकार अस बचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जाई । कहियो सत् बचन ससुझाई ॥ सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर होय चौथा पद तबही ॥ जब तुम है हो कृष्ण शरीरा । लेहु ओल सो कहो बलवीरा ॥ जो जीव देय पीत जेहि काहूँ । हम पुनि ओल दिलावैं ताहूँ ॥ नाथहु नाग कालिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ बिल्लु पहुंचे जननी पास । कीनो सत् बचन परकाशा ॥ भेत्यौ नाहि मोहि पद ताता । विषके ज्वाल श्यामभो गाता ॥ व्याकुल भयौ तबहि फिरि आई । पितादरश नाहीं हम पाई ॥ सुनिकै हरषी आदि कुमारी । लीन विष्णु कहै निकटदुलारी ॥ चूम्पौ बदन शीश दियो हाथा । सत्य वचन बोल्यौ सुतगाथा ॥ देहुँ पुत्र तोहि पिता भेटाई । तोरे मनको धोख छुड़ाई ॥ प्रथमहि ज्ञान दृष्टि तुम देखो । बचन मोर हृदयेमें पेखो ॥ मनस्वरूप करि ताकर जानो । मनते दूजा और न मानो ॥

स्वसमवेदबोध

( १०३ )

स्वर्गं पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन फिरै अनेरा ॥ छनमहँ कला अनंत देखावै । मनकहँ पेरि न कोई पावै ॥ निराकार मनहीको कहिये । मनके आस दौस निशि रहिये ॥ देखहु पलटि सुन्नमें ज्योती । जहाँ झिलिमिलि झलके मोती ॥ यहिविधिविष्णुदरसपितुपायौ । भांति भांतिको रंग दिखायो ॥ श्वेत पीत हरितो जंगाली । रूप अन्तूप गगनमें भाली ॥ सुनि बाजा हियमें हरपाना । पिता दरसते अति सुख माना ॥ बहुत अधीन मातुसे भैऊ । शीश नाय मृदु बानी कहेऊ ॥ तव प्रसाद मम मातु विशेषा । पिताको दरश दृष्टि देखा ॥ मातु गई पुनि रुद्रके पास । देखि रुद्र मनमाहँ हुलासा ॥ दौय पुत्र कह मता बतावा । माँग महेश्वर तोहि जो भावा ॥ हे जननी यह कीजै दाय । कबहुँ न विनसै हमरी काया ॥ कह जननी तुम ऐसे होही । साधो योग सत्य कहाँ तोही ॥ जबलों पृथ्वी अकाश सनेहा । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देहा ॥ तिहुँ सुतनको मता बताई । आदि पुरुषको नाम छपाई ॥ आद्या ऐसो छल बल कीना । पुरुष छपाय प्रकट यम कीना ॥ निरंकारको भेद बतावा । पुरुषसँदेश न सुनत सुनावा ॥ पुरुषभेद विष्णुहू न जाने । निरंकारको करता माने ॥ जैसो छल बल आद्या कीन्हा । सोई चला जक्तमें चीन्हा ॥ देखो ऐसो नारि स्वभाऊ । मात पिता कह सो विसराऊ ॥ केतो प्रीति मातु पितु करही । कन्या एक न चितमें धरही ॥ गै पुत्री जब स्वामी गेहा । रातयौ रंग तासुके नेहा ॥ मातु पिता सबही विसरायौ । अपने पतिकी नारि कहायौ ॥ आदर मान खसमको होई । पिताको नाम लेय नहि कोई ॥ ताते आद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥

( १०४ )

बोधसागर

ब्रह्मा निज मन कीन उदासा । तब चलि गये विष्णुके पास ॥ जाय विष्णुसे बिनती ठाना । तुम हो बुद्धिदेव परधाना ॥ तुमपर माता भई दयाला । हम तो आप बस भये बिहाला ॥ निज करनी फल पायों भाई । कैसे दोष लगावों माई ॥ अब सोयतन करो हो आता । चले परिवार वचन रहै माता ॥ कहैं विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करि हौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सब ही तुमरो परिवारा ॥ यज्ञ धर्म पूजा जो होई । विप्र बिना कछु होय न सोई ॥ जत्तमें ऐसो ज्ञान हटावै । पुन्यफलनकी आस लगावै ॥ जो कोइ करे द्विजनकी सेवा । हरषित हों तिहि विष्णुदेवा ॥

सोरठा-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु अस भाषेऊ ।

मेलो मनको द्रंद, साख मोर सुखते रहै ॥

चौपाई

ब्रह्मा भाष्यौ झूठ संदेशा । ताते ताको भयो अंदेशा ॥ विष्णु जो सांचो वचन सुनाया । माता कीन ताहिपर दाया ॥ शिव लजायके चुप है रहेऊ । झूठ सांच एको नहिं कहेऊ ॥ दृढत पिता तिहुं गे हारी । पिताको रूप न कतहुं निहारी ॥ माता कही बिहँसि निज बानी । ब्रह्मा झूठ झूठकी खानी ॥ शिव कछु झूठसांच नहिं भाखो । ताते योग ध्यान चित राखो ॥ योग समाधि करो अब जाई । जटा रखाय बिभूति रमाई ॥ माता विष्णुसे बोलै बानी । तीन लोक करिहो रजधानी ॥ शिव ब्रह्मा करिहै तब सेवा । गन गंधर्व रचिहो मुनि देवा ॥ चार बरण ब्रह्मा निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥ शिवके वरण भेद ना होई । कौध रूप धरि भेष बिगोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १०५ )

मातु जो दया विष्णुपर कीने । पिता देखाय निकटही दीने ॥ माता पिता एक मिलि गेऊ । विष्णु देखिके हर्षित भैऊ ॥ माता पिता सुत एकै ठेऊ । विष्णुसमाधिज्योति मिलिगैऊ॥ तीनों मिलि जब एकै भयऊ । तिहि पीछे जग सिरजै लियऊ॥ तब माता अस बचन उचारा । रचो सृष्टि तुम तीनों बारा ॥ अंडज उत्पति कीनी साता । पिंडजको ब्रह्मा उत्पताता ॥ उखमज खानि विष्णु न्यौहारा । शिव थाबरको कीन पसार ॥ चौरासी लख जूनी कीना । आधा जल आधा थलदीना ॥ नौलख जलके जीव बखाना । चौदह लख पंछी परमाना ॥ कृमी कीट सत्ताइस लाख । तीस लक्ष अस्थावर भाषा ॥ चतुर लक्ष मानुष परमाना । मनुषदेह लह पद निर्वाना ॥ और योनि परचे नहीं पावै । तत्त्वहीन भव भटका खावै ॥ एक तत्त्व अस्थावर जाना । उखमज दोय तत्त्व परमाना ॥ अंडज तीन तत्त्वगुन जाना । पिंडज चार तत्त्व परमाना ॥ ताते होय ज्ञान अधिकारा । मानुष देह भक्ति अनुसारा ॥ अंडज खानि तीन तत्त्वव्यापा । वायू तेज तीसरो आपा ॥ थावर एक तत्त्व है पानी । उखमज वायु तेजते सानी ॥ पिंडज चार तत्त्वसे बरनी । पौनो पावक जल अरु धरनी ॥ पिंडज नरकी देह देह सँवारा । ताते पंच तत्त्व परमाना ॥ नर नारीमें तत्त्व समाना । ज्ञान विभेद ताहुमें जाना ॥ चारो खानि जीव भरमावा । तब मानुषकी देही पावा ॥ पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहिमाहँ सँवारा ॥ देह धरे छोडे जस खानी । तैसो ज्ञान लहे सो प्रानी ॥ प्रथम कहो अंडजकी खानी । दारिद्री निद्रा अलसानी ॥ चोरी चुगली निंदा माया । घर बन झाड़ी आगिलगाया॥

(१०६)

बोधसागर

तृष्णा दूत भूत सेवकाई । रोवै कभीके मंगल गाई ॥ और को देत देखि पछिताई । गुरु सतगुरु चीन्है नहिं भाई ॥ वेद शास्त्र सब देत उठाई । आपन मन सब ही दरसाई ॥ जगमें और तुच्छ सब आही । मोहि समान बड़ को जगमाही ॥ मैले वस्त्र सो नहीं नहाई । आँखि चिपर मुख लार बहाई ॥ पासो जूवा खेल अरु दाऊ । कूबर मूंड अरु लामा पाऊ ॥ दूजी उखमज खानि कहावा । ताते जो नर देही पावा ॥ जाय सिकार जीव कहैं मारा । बहुत आनंद होय तिहि बारा ॥ बहुविधि मांसु राँधिके खाई । गुरुको मेटि करे अधिकार्ई ॥ निंदै नाम शब्द गुरु देवा । बहुत बात कथ ज्ञानको भेवा ॥ झूठी बचन सभामें लाई । टेढी पाग छोर ओरमाई ॥ दया धर्म मनमें नहिं आवै । करे पुन्य तिहि हाँसी लावै ॥ माला तिलक अरु चंदन करई । हाट बजार चिकन पट धरई ॥ अन्तर पापी ऊपर दया । सो जिव यमके हाथ बिकाया ॥ लम्बा दन्त रु वदन भयावन । पीरे नैन ऊँच अनपावन ॥ तीजे अचल स्वानिको लेखा । देह धरेते होय जो भेखा ॥ छिनक बुद्धि होवै जिव केरा । पलटत बुद्धि न लगै बेरा ॥ झगा फेटा शिरपर पागा । राजद्वारसे वामे लागा ॥ घोडेपर होवै असवारा । तीर खड्ग अरु कमर कटारा ॥ इत उत सैन चित्तसे लावा । परनारीको सैन बोलावा ॥ पर घर रति कर चोरी जाई । शरमभाव उपजै नहिं भाई ॥ छन यकमें कर पूजा सेवा । छन यकमें बिसरै सो देवा ॥ छन यक मनमें सूरा होई । छन यक मनमें कादर सोई ॥ छन यक मनमें करे सुधर्मा । छन यक माहँ करे अपकर्मा ॥ भोजन करत माथ खजुआवै । बाँह जाँघ पुनि मीजत जावै ॥

स्वसमवेदबोध

( १०७ )

भोजन करे सोय पुनि जाई । जो जगाव तिहि मारन धाई ॥ आँखी लाल होय पुनि वाको । और अनेक न लक्षण ताको ॥ चौथे पिंडज खानि सुनावों । गुन औगुनको भेद बतावों ॥ वैरागी उन मुनि मत धारी । धर्म पुण्य कर वेद विचारी ॥ तीरथ पुण्य अरु योग समाधी । गुरुके चरण चित बल बाँधी ॥ पढे पुराण कथे भल ज्ञाना । सभामें बैठि बात भल ठाना ॥ राजभोग कामिनि सुख माने । मनशंका कबहुँ नहि आने ॥ धन संपत्ति सुख बहुत सोहाई । लौंग सोपारी बीरा खाई ॥ खरचै दाम पुण्यमें सोई । हृदये सुख पुनि ताके होई ॥ चक्षु तेज ताकर अति मानी । परा कर्म देही बल ठानी ॥ देखो खड्ग सदा ता हाथा । प्रतिमा निरखि नवावै माथा ॥

सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरो फिरि आय जब ।

ताको कह्यो सनेह, धर्मदास सुन कान दे ॥

चौपाई

आयू आछत जिव मरिजाई । जन्म धरे मानुषको आई ॥ शूरा होय सो रणके माहीं । भै डर ताहि निकट न जाहीं ॥ माया मोह ममता नहि व्यापे । दुरमति ताहि देखि डर कांपे ॥ सत्यशब्द परतीत कै आने । निंदारूप कबहुँ ना जानै ॥ सतगुरु चरण सदा चित राखे । प्रेम रु प्रीति दोनता भाखे ॥ यहिविधि चारों खानि बनाया । सबमें रमे निरंजन राया ॥ कर्मजाल महाँ सबै फँसाई । रेखाकर्म प्रत्यक्ष देखाई ॥ कर्मकी रेख लिखे सबमाही । ताते जीव भवमें भरमाही ॥ लिखे निरञ्जन कर्मको रेखा । ताते जीव धरे बहु भेषा ॥ कर्मरेख कबहुँ नहि छूटे । फिर फिर जीव निरंजन लूटे ॥ चारि खानि रचिकियो पसारा । चार बरन पाखेंड व्यौहारा ॥

( १०८ )

बोधसागर

चौरासी लख योनी कीन्हहा । चार खानि जिव एकै चीन्हहा ॥ चौरासी लख बचन बखाना । चारखान जिव एक समाना ॥ रचना रचे सृष्टि बहु रंगा । कामदेवकी कला अनंगा ॥ सुर नर मुनि गण काम तरंगा । पशु पक्षी सबहीके संगा ॥ कर्म काल सबही भरमावा । शिवशक्ती सँग कला नचावा ॥ कनक कामिनी फंद बनाया । तिहि फन्दे सबही अरुझाया ॥ जाति पांति कुल मान बढ़ाई । ब्रह्मा यह यम फंद बनाई ॥ शिव शक्ती द्वै रूप बनाया । नारि पुरुष सो नाम धराया ॥ भगद्वारे है सब जग आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥ नखशिख रची काल फुलवारी । फूल कुवास सुवास सँवारी ॥ कनक कामिनी काल बनाई । चार खानिमें रही समाई ॥ कामिनि काम सँवारा ज्ञानी । चारो खानि रहा विष सानी ॥ काल कर्मकी खानि बनाई । सब संगतमें रहा समाई ॥ सुर नर मुनि सबहीको डहके । चारखानि सबही घटमहके ॥ तीनों देव निरंजन रूपा । येई भवसागरके भूपा ॥ चारो मिलि सब सृष्टि सँवारी । पञ्चम कहिये आदि कुमारी ॥ जहाँ तहाँ तीरथ व्रत दाना । देवल देव पूजा पाषाना ॥ मथुरा तीनि देव औतारा । ब्रह्मा पुनि काशी पग धारा ॥ यहिविधि आया साज्यौसाजू । तिहुँ पुत्रनकहँ दीनो राजू ॥ मथुराते चलि आदि भवानी । कोटकगंडे पहुची आनी ॥ कोटकगंडे करि निज थाना । हींगलाज पुनि कीन पयाना ॥ आदि भवानी रही तहाँई । तिहुँ पुत्र जग राज कराई ॥ नाना भांति कर्म बिस्तारा । वेद कितेब प्रपंच अपारा ॥ भर्मजाल जगमें फैलाई । नर नारी तामें अरुझाई ॥ जहतहँ तीन देवकी सेवा । कोइ न जान पुरातन देवा ॥

स्वसमवेदबोध

( १०९ )

तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥ तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥ तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥ कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥ तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥ दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन । गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥

चौपाई

तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥ भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥ छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥ राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥ तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥ जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥ तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥ मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥ कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥ इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥ जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥ मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥ सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥ रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥ कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥

पंजाबी भाषा-छंब झूलना

इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥

( ११० )

बोधसागर

भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥

सत्यकबीर बचन

तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥

चौपाई

पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥ तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥ कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥ अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥ यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥ बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥ यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥ तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥ सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥ विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥ यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥ रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥ षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥ सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥ नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥ एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥ सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥ चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥ योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥ मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १११ )

तस शिला यक नाम पुकारा । सब जिव पकरि ताहिपरजारा ॥ तस शिलापर जो जिव परही । हाय हाय करि चटपट करही ॥ तलफि तलफि जिव तहँरहिजाही । भूनि भूनि सब यमधरिखाही ॥ केते युग जीवन धरि खायौ । जारि वारिके योनि भ्रमायौ ॥ जरत जीव जब कीन पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥ यमको कष्ट सहो नहि जाई । हो साहिब दुःख टारो आई ॥ यहि बिधि जिव जब कीन पुकारा । पुरुष दयाल दया उरधारा ॥ तब पुरुष ज्ञानीको टेरो । ज्ञानी सुनिये आज्ञा मेरो ॥

सत्यकबीर वचन

छंद—जब देखि जीवन कहैं बिकल तब दया पुरुष जनाइया ॥ दया विधि सतपुरुष साहिब तबै मोहि बोलाइया ॥ कह्यौ मोहि समुझाय बहुविधि जीव जाय चितावहो ॥ तुव दरशते जिव होय शीतल जाय तपत बुझावहो ॥ सोरठा—आपा लीनो मानि, पुरुष सिखावन शिर धरचो ॥ तत्क्षण कीन पयान, शीस नाय सतपुरुषको ॥

चौपाई

आयो जहँ जहँ जीव सतावै । काल निरंजन जीव नचावै ॥ चटपट करे जीव तहँ भाई । ठाढ़ भयो मैं तहँ पुनि जाई ॥ मोहि देखि जिव कीन पुकारा । हो साहिब मोहि लेव उबारा ॥ तब हम सत्य शब्द गोहरावा । पुरुष शब्द ते जीव बुझावा ॥ सब जीवनमिलि अस्तुति लाई । धन्य पुरुष यह तपन बुझाई ॥ यमते छोरि लेहु मोहि स्वामी । दया करो उर अंतर्यामी ॥

इति

अथ जीवनकी स्तुति—छंद तोटक

जय सत्य कबीर कृपाल घनं, दल दुष्टहनं पय पुष्ट जनं ॥

नं. ९ कबीरसागर - ५

( ११२ )

बोधसागर

योग जीत अतीत पुनीत प्रभू, वपु धारण कारन तारन भू ॥ सत सुवकृत सत्यस्वरूप सदा, जन ध्यावत पावत मुक्तिपदा ॥ मुक्ता मनिते जिव जो जुगता, मृतलोक सशोकन भौ भुगता ॥ हम दीन दुखी किमि त्याग चहो, करूणामय हो करूणामयहो ॥ करूणातन धार करी करूणा, करूणामयधौ करूणा वरूणा ॥ सुर सिद्ध बखानत खान दया, जिव देखि अनाथ सनाथ भया ॥ यहि ज्वाल जला यम भक्ष करे, बिन देव दयालको रक्ष करे ॥ यम जालिम जीवन जेर कियौ, सुधि लेत दयादधि देर कियौ ॥ सुख लेशन के तक लेश भरे, जगदीश परे जगदीश परे ॥ जिव काल करालके ज्वाल दहे, तर ऊपर भूपर धाय गहे ॥ हम जानि दयाल जो काल भजे, गुणश्राम प्रनाम सो नामतजे ॥ घटवाह मलाह सलाह कहो, फिर कैलकि गेलको सैल न हो ॥ वह सिंह समान शिकार करे, प्रिय पीव बिना कह जीव तरे ॥ हरि केहरि देहरि पार करौ, सरकार बडे बरकार करौ ॥ भयभंजन रंजन दासनको, खल डाटत काटत फांसनको ॥ भवसागर झागर काल बली, तह जीवकि उक्ति न युक्ति चली ॥ नहि एक उपाय बनाय बनी, करू काज गरीब निवाज गनी ॥ प्रभु पेखतही जिव शीतल है, श्रुति वेद पुराण बखानत है ॥ करूणा दृग कोटिन काल हने, खुगसिंधु कणा गिर बंधु बनै ॥ मतिधीर कबीर कबीर भजो, हितनाम प्रिया बिन नाम तजो ॥ तपखान कृशान शिला दहके, जरते प्रभु मारगते बहके ॥ तलफै तप तीख सभी तलते, बिन नाथ किने हन सोपलते ॥ निजु सुधि निवाज मुदधि लखो, सिरपै समरत्थ जो हत्थ रखो ॥ नरबाल बेहाल निहाल मही, दुखद्वंद्व दवारिन देह दही ॥ मनभौ मदमोचन लाचन है, जनरक्षक भक्षक पोचन है ॥

स्वसमवेदबोध

( ११३ )

सबलायक नायक हंसनके, जिवमोषक पोषक अंशनके ॥ सर्वोपर साहिब जीवनके, तुम जीवननाथ हो जीवनके ॥ प्रभुके भ्रमते यमते बजरे, यहि तस शिला पर आनि जरे ॥ तपिया जपिया न पिया परखे, विधि वेद लवेदन ते हरखे ॥ जिवकाज चले शिरताज सभी, महाराज मयासुख साज सभी ॥ भवभार हरो करतार धनी, भ्रमराय न पय दुखाय दुनी ॥ करि नेह बिदेह जो देह घृतं, शबदाभूत जीव भे कृतकृतं ॥ मृत नायक सायक तीख हते, पद प्रीत प्रतीत सहीत गते ॥ परमारथि भारथि नाथ सदा, गहते लहते भव पाथ हदा ॥ जनजाय समाय अमाय पदा, शुभज्ञान फुरानन सान मदा ॥ सुनि मानस हंस सुनीन्द्रमता, समता लह पाय पता रमता ॥ तब नाम सुधा वसुधा जो पिया, न खुधा युगही युग जीव जिया ॥ दुखिया हितआय महा सुखिया, लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥ कहँ और न दौर तो पौर परे, सरनी परनी करनी नखरे ॥ पद तीर कबीर शरीर जिते, लह सारभे ब्रह्म अकार तिते ॥ जग योनि जहान महान महा, गुरुदेवको भेव नते बलहा ॥ कमलापति क्यों कमलापति हो, पदकीरति कीरति कीरति हो ॥ मृगब्याध समाध अगाध गहे, कलपानसिरान न ध्यान लहे ॥ गुन गाय फनी गणराय निती, नहिं पावत पार अपार गती ॥ लवलीन प्रवीन नवीन जसै, कलिपंक कलंक निशंक नसै ॥ विषया बनराय भुलाय परे, दुखदौन बिनाकर कौन धरे ॥ कह कौन सँदेश अँदेश बड़ा, भग भूलि गई ठग आनि अडा ॥ शिव शोक कि झोकमें झुलि रहा, करता भरता भ्रम भूलि रहा ॥ तिहुँ लोक बिलोक लगीअगिनी, यह जामिन है यमकी भगिनी ॥ तब सूरको नूर जहूर हुआ, ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥

बो० सा० ९

( ११४ )

बोधसागर

सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥ बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥ जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥ इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥ वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥ निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥ कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥ दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥ मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥ नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥ गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥ जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥ सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥ गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥ धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥ नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥ जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥ भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥ सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥ गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥ हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥ बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥ जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥ दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥ जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥

स्वसमवेदबोध

( ११५ )

मनमत्त मतंग मते यहि गौं, तुहि रावत होय महा उतजौं ॥ चित्तचञ्चर बञ्चर बञ्चक है, समसञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥ यम बंकट संकट जीव महा, दमको गमको रमको न रहा ॥ भवसेत अभय पद देत तुही, कलिकंटक कोटिन कर्म दही ॥ चटि सेत पपीलन ढील तहाँ, लैचि दीन पयोनिधि पीन महाँ ॥ नहिं वञ्चको हाड न चाड रहो, मन वाक शरीर कबीर कहो ॥ गुरु नेह न दीसन दीस जिन्हैं, सुखवासन आस है त्रास तिन्हैं ॥ तुम दीनन बन्धु न पीननके, नित पास हो दास अधीननके ॥ मद मान मलान हिये अरभौ, नर नागर सागर भौ गरभौ ॥ करि पाप कलाप करे दुनिया, विष बीज अर्माफल को लुनिया ॥ हरिमें हरिमें हमही वरषे, लहरी भवभक्ति हरी हरषे ॥ दुखदारिद वारिद ज्ञानघनं, निरभय करि भय शमनं शमनं ॥ जिव कालके जाल परे बपुरे, सतनाम निकास सदा जपु रे ॥ गुरुभक्ति निनार किनार गहे, चतुरे लुतरे भवधार बहै ॥ भ्रमभूलते मूलते जात भगे, बुध बालन डालन पात लगे ॥ मन बाचक याचक हौं दरको, तुम छोड अजोड सभी घरको ॥ प्रभु नामको दान निदान चहो, कोई आसरुवास बिकाश न हो ॥ तरनी बरनी तब नाम जहाँ, गहिये लहिये विशराम तहाँ ॥ रसना रसरास रसै रससो, जसतौ बस और सबै कस हो ॥ चढ नाम रथा गइ बीत विथा, रसना रसना बिन कीर्त कथा ॥ पदपंकज प्यार जो छूटि गया, अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥ ठग ठाकुर आनिके जूटि गया, जगजीवनकी बुधि छूटि गया ॥ रहगी रमते बड़ि भीर भई, सतपंथ विहाय कुपंथ लई ॥ गुरुभक्ति बिना भव भूलि परे, शरणागत पाहि कबीर हरे ॥