कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1485, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १०९ )
तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥ तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥ तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥ कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥ तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥ दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन । गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥
चौपाई
तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥ भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥ छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥ राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥ तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥ जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥ तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥ मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥ कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥ इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥ जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥ मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥ सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥ रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥ कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥
पंजाबी भाषा-छंब झूलना
इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥