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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्वसमवेदबोध

( १०९ )

तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥ तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥ तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥ कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥ तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥ दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन । गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥

चौपाई

तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥ भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥ छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥ राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥ तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥ जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥ तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥ मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥ कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥ इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥ जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥ मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥ सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥ रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥ कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥

पंजाबी भाषा-छंब झूलना

इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥

( ११० )

बोधसागर

भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥

सत्यकबीर बचन

तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥

चौपाई

पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥ तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥ कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥ अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥ यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥ बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥ यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥ तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥ सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥ विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥ यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥ रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥ षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥ सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥ नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥ एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥ सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥ चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥ योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥ मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १११ )

तस शिला यक नाम पुकारा । सब जिव पकरि ताहिपरजारा ॥ तस शिलापर जो जिव परही । हाय हाय करि चटपट करही ॥ तलफि तलफि जिव तहँरहिजाही । भूनि भूनि सब यमधरिखाही ॥ केते युग जीवन धरि खायौ । जारि वारिके योनि भ्रमायौ ॥ जरत जीव जब कीन पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥ यमको कष्ट सहो नहि जाई । हो साहिब दुःख टारो आई ॥ यहि बिधि जिव जब कीन पुकारा । पुरुष दयाल दया उरधारा ॥ तब पुरुष ज्ञानीको टेरो । ज्ञानी सुनिये आज्ञा मेरो ॥

सत्यकबीर वचन

छंद—जब देखि जीवन कहैं बिकल तब दया पुरुष जनाइया ॥ दया विधि सतपुरुष साहिब तबै मोहि बोलाइया ॥ कह्यौ मोहि समुझाय बहुविधि जीव जाय चितावहो ॥ तुव दरशते जिव होय शीतल जाय तपत बुझावहो ॥ सोरठा—आपा लीनो मानि, पुरुष सिखावन शिर धरचो ॥ तत्क्षण कीन पयान, शीस नाय सतपुरुषको ॥

चौपाई

आयो जहँ जहँ जीव सतावै । काल निरंजन जीव नचावै ॥ चटपट करे जीव तहँ भाई । ठाढ़ भयो मैं तहँ पुनि जाई ॥ मोहि देखि जिव कीन पुकारा । हो साहिब मोहि लेव उबारा ॥ तब हम सत्य शब्द गोहरावा । पुरुष शब्द ते जीव बुझावा ॥ सब जीवनमिलि अस्तुति लाई । धन्य पुरुष यह तपन बुझाई ॥ यमते छोरि लेहु मोहि स्वामी । दया करो उर अंतर्यामी ॥

इति

अथ जीवनकी स्तुति—छंद तोटक

जय सत्य कबीर कृपाल घनं, दल दुष्टहनं पय पुष्ट जनं ॥

नं. ९ कबीरसागर - ५

( ११२ )

बोधसागर

योग जीत अतीत पुनीत प्रभू, वपु धारण कारन तारन भू ॥ सत सुवकृत सत्यस्वरूप सदा, जन ध्यावत पावत मुक्तिपदा ॥ मुक्ता मनिते जिव जो जुगता, मृतलोक सशोकन भौ भुगता ॥ हम दीन दुखी किमि त्याग चहो, करूणामय हो करूणामयहो ॥ करूणातन धार करी करूणा, करूणामयधौ करूणा वरूणा ॥ सुर सिद्ध बखानत खान दया, जिव देखि अनाथ सनाथ भया ॥ यहि ज्वाल जला यम भक्ष करे, बिन देव दयालको रक्ष करे ॥ यम जालिम जीवन जेर कियौ, सुधि लेत दयादधि देर कियौ ॥ सुख लेशन के तक लेश भरे, जगदीश परे जगदीश परे ॥ जिव काल करालके ज्वाल दहे, तर ऊपर भूपर धाय गहे ॥ हम जानि दयाल जो काल भजे, गुणश्राम प्रनाम सो नामतजे ॥ घटवाह मलाह सलाह कहो, फिर कैलकि गेलको सैल न हो ॥ वह सिंह समान शिकार करे, प्रिय पीव बिना कह जीव तरे ॥ हरि केहरि देहरि पार करौ, सरकार बडे बरकार करौ ॥ भयभंजन रंजन दासनको, खल डाटत काटत फांसनको ॥ भवसागर झागर काल बली, तह जीवकि उक्ति न युक्ति चली ॥ नहि एक उपाय बनाय बनी, करू काज गरीब निवाज गनी ॥ प्रभु पेखतही जिव शीतल है, श्रुति वेद पुराण बखानत है ॥ करूणा दृग कोटिन काल हने, खुगसिंधु कणा गिर बंधु बनै ॥ मतिधीर कबीर कबीर भजो, हितनाम प्रिया बिन नाम तजो ॥ तपखान कृशान शिला दहके, जरते प्रभु मारगते बहके ॥ तलफै तप तीख सभी तलते, बिन नाथ किने हन सोपलते ॥ निजु सुधि निवाज मुदधि लखो, सिरपै समरत्थ जो हत्थ रखो ॥ नरबाल बेहाल निहाल मही, दुखद्वंद्व दवारिन देह दही ॥ मनभौ मदमोचन लाचन है, जनरक्षक भक्षक पोचन है ॥

स्वसमवेदबोध

( ११३ )

सबलायक नायक हंसनके, जिवमोषक पोषक अंशनके ॥ सर्वोपर साहिब जीवनके, तुम जीवननाथ हो जीवनके ॥ प्रभुके भ्रमते यमते बजरे, यहि तस शिला पर आनि जरे ॥ तपिया जपिया न पिया परखे, विधि वेद लवेदन ते हरखे ॥ जिवकाज चले शिरताज सभी, महाराज मयासुख साज सभी ॥ भवभार हरो करतार धनी, भ्रमराय न पय दुखाय दुनी ॥ करि नेह बिदेह जो देह घृतं, शबदाभूत जीव भे कृतकृतं ॥ मृत नायक सायक तीख हते, पद प्रीत प्रतीत सहीत गते ॥ परमारथि भारथि नाथ सदा, गहते लहते भव पाथ हदा ॥ जनजाय समाय अमाय पदा, शुभज्ञान फुरानन सान मदा ॥ सुनि मानस हंस सुनीन्द्रमता, समता लह पाय पता रमता ॥ तब नाम सुधा वसुधा जो पिया, न खुधा युगही युग जीव जिया ॥ दुखिया हितआय महा सुखिया, लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥ कहँ और न दौर तो पौर परे, सरनी परनी करनी नखरे ॥ पद तीर कबीर शरीर जिते, लह सारभे ब्रह्म अकार तिते ॥ जग योनि जहान महान महा, गुरुदेवको भेव नते बलहा ॥ कमलापति क्यों कमलापति हो, पदकीरति कीरति कीरति हो ॥ मृगब्याध समाध अगाध गहे, कलपानसिरान न ध्यान लहे ॥ गुन गाय फनी गणराय निती, नहिं पावत पार अपार गती ॥ लवलीन प्रवीन नवीन जसै, कलिपंक कलंक निशंक नसै ॥ विषया बनराय भुलाय परे, दुखदौन बिनाकर कौन धरे ॥ कह कौन सँदेश अँदेश बड़ा, भग भूलि गई ठग आनि अडा ॥ शिव शोक कि झोकमें झुलि रहा, करता भरता भ्रम भूलि रहा ॥ तिहुँ लोक बिलोक लगीअगिनी, यह जामिन है यमकी भगिनी ॥ तब सूरको नूर जहूर हुआ, ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥

बो० सा० ९

( ११४ )

बोधसागर

सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥ बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥ जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥ इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥ वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥ निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥ कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥ दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥ मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥ नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥ गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥ जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥ सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥ गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥ धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥ नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥ जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥ भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥ सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥ गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥ हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥ बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥ जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥ दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥ जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥

स्वसमवेदबोध

( ११५ )

मनमत्त मतंग मते यहि गौं, तुहि रावत होय महा उतजौं ॥ चित्तचञ्चर बञ्चर बञ्चक है, समसञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥ यम बंकट संकट जीव महा, दमको गमको रमको न रहा ॥ भवसेत अभय पद देत तुही, कलिकंटक कोटिन कर्म दही ॥ चटि सेत पपीलन ढील तहाँ, लैचि दीन पयोनिधि पीन महाँ ॥ नहिं वञ्चको हाड न चाड रहो, मन वाक शरीर कबीर कहो ॥ गुरु नेह न दीसन दीस जिन्हैं, सुखवासन आस है त्रास तिन्हैं ॥ तुम दीनन बन्धु न पीननके, नित पास हो दास अधीननके ॥ मद मान मलान हिये अरभौ, नर नागर सागर भौ गरभौ ॥ करि पाप कलाप करे दुनिया, विष बीज अर्माफल को लुनिया ॥ हरिमें हरिमें हमही वरषे, लहरी भवभक्ति हरी हरषे ॥ दुखदारिद वारिद ज्ञानघनं, निरभय करि भय शमनं शमनं ॥ जिव कालके जाल परे बपुरे, सतनाम निकास सदा जपु रे ॥ गुरुभक्ति निनार किनार गहे, चतुरे लुतरे भवधार बहै ॥ भ्रमभूलते मूलते जात भगे, बुध बालन डालन पात लगे ॥ मन बाचक याचक हौं दरको, तुम छोड अजोड सभी घरको ॥ प्रभु नामको दान निदान चहो, कोई आसरुवास बिकाश न हो ॥ तरनी बरनी तब नाम जहाँ, गहिये लहिये विशराम तहाँ ॥ रसना रसरास रसै रससो, जसतौ बस और सबै कस हो ॥ चढ नाम रथा गइ बीत विथा, रसना रसना बिन कीर्त कथा ॥ पदपंकज प्यार जो छूटि गया, अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥ ठग ठाकुर आनिके जूटि गया, जगजीवनकी बुधि छूटि गया ॥ रहगी रमते बड़ि भीर भई, सतपंथ विहाय कुपंथ लई ॥ गुरुभक्ति बिना भव भूलि परे, शरणागत पाहि कबीर हरे ॥

( ११६ )

बोधसागर

दोहा—यह कबीर पंचाशिका, पढ़ै सप्तीति प्रतीत ।

परम पुरुष पद पावही, काल कष्ट जा बीत ॥

इति श्रीकबीर पंचाशिका

सत्यकबीर वचन—चौपाई

तब हम कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसाई ॥

जब तुम जाय धरो नर देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥

पुरुष नाम सुमिरन सहिदानी । बीरा सार करो परमानी ॥

देह धरे सत शब्द समाई । तब हंसा सतलोकहि जाई ॥

देह धरे कीने जहँ आसा । अन्तकाल लीनो तहँ बासा ॥

अब तोहि कष्टभयौ जिव आनी । ताते यहि बिधि बोलो बानी ॥

जब तुम देह धरो जग जाई । बिसरे पुरुष काल धरि खाई ॥

जीव वचन—चौपाई

कहै जीव सुन पुरुष पुराना । देह धरे बिसरो नहिं ज्ञाना ॥

पुरुष जानि सुमिरौं यमराई । वेद पुरान कहैं समुझाई ॥

वेद पुरान कहै मत येहा । निराकारसे कीजै नेहा ॥

सुर नर मुनि तैंतीस कोरी । बंधे सबहि निरंजन डोरी ॥

ताके मत कीने हम आसा । अब यह जानि परा यमफांसा ॥

ज्ञानी वचन—चौपाई

सुनो जीव यह छल यमकेरा । यह यमफन्दा कीन घनेरा ॥

छंद—कला कला अनेक कीनो जीव कारन ठाट हो ।

वेद पुरानो शास्त्र स्मृती याते हूँध्यौ बाट हो ॥

आप तनधरि प्रकट है यम सिफत आपन कीनहो ।

नाना गुन मन कर्म फाटो जीव बंधन दीन हो ॥

सोरठा—कला कला परचण्ड, जीव परे बस कालके ।

जन्म जन्म सह दण्ड, सत्यनाम चीन्हे बिना ॥

कबीर पंचाशिका एवं अन्य बोध

स्वसमवेवबोध

( ११७ )

चौपाई

छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥

अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई

यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥

तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥

कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥

विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥

सत्य पुरुष वचन—चौपाई

कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥

तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥

पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥

प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥

सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥

करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥

द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥

पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥

गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥

मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥

योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥

योगजीत वचन—चौपाई

तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥

तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥

जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥

ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥

अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई

काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥

( ११८ )

बोधसागर

तुम कस जिव मुक्तावन आवा । मारो तोहि अबहि भलदावा ॥ काल अनंत रूप तब धारा । योगजीत कह आनि प्रचारा ॥ महाभयंकर रूप बनावा । गज स्वरूप है सम्मुख धावा ॥ सत्तरयुग हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥ परमपुरुष सेवा वस भैऊ । राज तिहुँ पुरको मोहि दैऊ ॥ तब तुम नारि निकारौ मोही । योगजीत नहि छोडो तोही ॥ अस कहि धाय सुंड फटकारा । दंतसो योगजीत पर मारा ॥ योगजीत कै लहि ललकारा । गहि कर सुंड दूर तिहि डारा ॥ पुरुषप्रताप सुमिर मन माहीं । मारचो सत्य शब्द से ताहीं ॥ ततछन ताहि दृष्टि पर हेरा । श्यामलिलार भयौ तिहिकेरा ॥ पंख घात जिमि होय पखेरू । तैसे कैल मोहि प्रति हेरू ॥ जब फटकार कर गहे डाला । भागा काल पैठ पाताला ॥ गयौ पाताल कूर्मके आगे । योगजीत गये पीछे लागे ॥ बिनती करे कूर्मसे जाई । राखो कूर्म शरन हम आई ॥ योगजीत मोहि मारि निकारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥ युगन युगन हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥ एक पायँ हम ठाढे रहेऊ । तबहि पुरुष सेवा सब भैऊ ॥ तीन लोक दीना मोहि हारी । अब कस मोकहँ मारि निकारी ॥ जाय कूर्मकी शरन जो परेऊ । तब ताने दाय़ा उर धरेऊ ॥

कूर्मवचन--चोपाई

तबै कूर्म उठि बिनती लाई । को तुम आहु कहाँ ते आई ॥ अपनो नाम कहो मोहि स्वामी । पुरुष अंश तुम अंतरयामी ॥

योगजीत वचन--चोपाई

तब हम कहा नाम मोर ज्ञानी । योगजीत हम अंश बखानी ॥ समरथ वचन जीव बर आवा । काल फौंस जीवन मुक्तावा ॥

स्वसमवेदबोध

( ११९ )

कैलवचन

सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥ सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥ समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥ तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥ अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥

कूर्मवचन

तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥ जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥ तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥ ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥ चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥ जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥ कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥ फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥

ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई

बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥ सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥ अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥ ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥ शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥ जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥ जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥ रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥ जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥

( १२० )

बोधसागर

अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥ बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥ मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥

निरंजन वचन

सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि । षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥ पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥ पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥

शब्द

अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो । तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥ देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई । परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥ सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती । आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥ ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा । हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।

निरंजन वचन--चौपाई

धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥ ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥ पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥ बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥

स्वसमवेदबोध

( १२१ )

कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥ मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥ वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥ देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥ यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥ जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥ जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥ जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥

निरंजन वचन चौपाई

सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥ ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥

ज्ञानी वचन चौपाई

अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥ बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥ काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥ घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥ पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥ कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥

निरंजन वचन चौपाई

ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥ बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥

( १२२ )

बोधसागर

राजा इंद्रदौन पहाँ जैहैं । मेरो मंदिर सोई उठै हैं ॥ तब समुद्र ढाहनको धावै । मंदिर मेरो तोरि बहावै ॥ कृपा करो तब तुम तहाँ जाई । मेरो मन्दिर देहु थपाई ॥ जो हंसा तुमरो गुण गाई । ताके निकट तो हम नहिं जाई ॥ जो कछु वर माँग्यो धर्मराया । सो ज्ञानी दीनो करि दाया ॥ धर्मराय उठि शीस नवाई । तब ज्ञानी संसारहि आई ॥

इति

अथ सतयुगमें ज्ञानीजीको मृत्युलोकमें आगमनकथा और सत्य

सुकृत नाम धारण और जवत जीव तारण--चौपाई

ज्ञानी योगजीत कहलाये । सत्यसुकृत सुनींद्र बतलाये ॥ पुनि अचित मुक्तामणि होई । योग संतायन कहिये सोई ॥ अविनाशी करुणामय जानी । कबीर आदि बहुनाम बखानी ॥ चारों युगके चारों नामा । सतयुग सत्यसुकृत गुणधामा ॥ त्रेतामाँह सुनींद्र नामधर । करुणामय स्वामी कह द्वापर ॥ कलियुगमाँह कबीर कहाये । हिंदू मुसलमान गुण गाये ॥ सैद अहमद कबीर बखाना । शेख कबीर कहे मुसलमाना ॥ सोई सकल जक्त गुरु पीरा । नाम अनेकन ताके तीरा ॥ देश देशमें नाम है न्यारा । सारे जीव जक्तको तारा ॥ वेद पुराण जासु गुण गावै । नाम अनंत जासु निरतावै ॥ आदिकाल जब सतयुग आया । सत्यसुकृत सो नाम धराया ॥ तीन देवते कीन पुकारा । सो नहिं माने मन हंकारा ॥ प्रथमहिं जब पृथ्वीपर आये । नृप घोघल कह नाम हढ़ाये ॥ सतगुरु चीन्हि चरण लपटाना । नरनायक लह पद निर्वाना ॥ पुनि सतगुरु मथुरामें आई । खेमसरी तिय तहाँ रहाई ॥ खेमसरी ग्वालिनहि चितावा । कुल परिवार सहित मुक्तावा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२३ )

पुनि सत सुकृत लोक सीधारा । पहुँच हंस पुरुष दरबारा ॥ पुरुष दरश सब हंसन पाईं । कोटि सोम रवि रोम लजाईं ॥ पुरुष स्वरूप भये सब हंसा । बीती सब यमकी भ्रम शंसा ॥ कछु दिन कीने लोक निवासा । बहुरि आय देख्यो निजदासा ॥ निशि दिन रहौं गुप्त जगमाहीं । मोकहँ कोइ जिव चीन्हत नाहीं ॥ जिहि जीवन परबोध्यौ आईं । दीन्हौं तिनको लोक पठाईं ॥ सत्यलोक हंसनको बासा । सदा वसंत पुरुषके पास ॥

इति

सतयुगका वृत्तान्त

अथ त्रेतायुगमें सतसुकृतजीको पृथ्वीमें आगमनकथा और

मुनींद्रनाम धारण और जबत जीवतारण

सत्कबीर वचन-चौपाई

सतयुग गत है त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव मुक्तावा ॥ जब आयो जीवन उपदेशा । धर्मराय उर हुआ अँदेशा ॥ इन भवसागर मोर उजारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥ कितनो छल बल करो उपाईं । ज्ञानी डर मोर नाहिं डेराईं ॥ पुरुष प्रताप ज्ञानीके पास । ताते मोर न लागे फाँसा ॥ इनते काल बसावै नाहीं । नाम प्रताप जीव घर जाहीं ॥ छंद-सतनामके परताप धर्मन हंस निज घरको चले ॥ जिमि देखि केहरि त्रास गज हो कँपिके धरनी रले ॥ पुरुष नाम प्रताप केहरि काल गज सो जानिहै ॥ नाम गहि इसलोक पहुँचे बहुरि भव नाहिं आनिहै ॥ सोरठा-सतगुरु शब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहै । रहै नाम लौ लाय, कर्म भर्म ममता तजे ॥

चौपाई

त्रेतायुग तबही पग धारा । मृत्युलोक कीनो पैसारा ॥

( १२४ )

बोधसागर

जीव अनेकन पूछेहु जाई । यमसे को तोहि लेय छोड़ाई ॥ कहै कर्म वश जिव अज्ञाना । हमरे कर्ता पुरुष है ध्याना ॥ विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमसे मोहि छोडावनहारा ॥ कोई महेश कि आसा लावै । कोइ चंडी देवीको गावै ॥ कहा करो जिव भयो बिगाना । खसम छोड़िकर जार बिकाना ॥ भरम कोठरी सब जग डारा । धोखा दे यम जीवन मारा ॥

साखी सोई काल सोई है करता, भक्ति मुक्ति तिहि हाथ । हमरो कहा न आदरे, मन यम जिवके साथ ॥ परंपंची निरंजन, मन सोई ओंकार । फंदे तीनों लोक सब, कोई न पावै पार ॥

चौपाई

सत्यपुरुषको आयसु पावो । कालहि मेटिछोरि जिव ल्यावो ॥ जोर करो तो वचन नशाई । सहज जीवन लेहु चेताई ॥ जो ग्रासै जिव सेवै ताही । अनचीन्है यमके मुख जाही ॥ चहुँदिशि फिर आयौ गढलंका । जहँवाँ रावण बसै निशंका ॥ भाट विचित्र पन्यौ गुरुचरना । पायौ अमर धाम गहि शरना ॥ मंदोदरी प्रेममें पागी । सतगुरुके सो चरनन लागी ॥ रानीको दीनो गुरुदिच्छा । पूरन भई तासुकी इच्छा ॥ पुनि आयौ रावण दरबारा । जहाँ पौरिया रह रखवारा ॥ कह्यौ पौरियाते तब जाई । रावणको मम पांह बोलाई ॥ जबहि पौरिया खबरि जनाई । सिद्ध एक प्रभु तुमहिं बोलाई ॥ सुनि प्रभु क्रोधकीन तेहि बारा । तैं मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥ शिवसुत मोर दरश नहि पावै । भिक्षुक मोकहँ कहा बोलावै ॥ यह मत ज्ञान हन्यौकिन तोरा । जो तू मोहि बोलावन दोरा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२५ )

हे प्रतिहार सुनो यह बानी । सिद्धरूप तुम कहो बखानी ॥ कौन बरन अरु कौन है भेखा । मोसन कहो दृष्टि जो देखा ॥ अहो राव तिहि श्वेत स्वरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनुपा ॥ शशिसमान तिहि रूप विराजा । श्वेतबरन सब श्वेतहि साजा ॥ मंदोदरि कह सुन रावण राजा । यह तो रूप पुरुषको साजा ॥ वेगिहि आय गहो तुम पाई । तौ तुव राज अटल है जाई ॥ छोड़िहो अपनो मान बढ़ाई । गहो चरण तिहि शीस नवाई ॥ रावण सुनत कोध अति कीना । जरत हुताशन जनु घृत दीना ॥ रावण चलो अस्त्र गहि हाथा । तुरत जाय तिहि काटो माथा ॥ मारो ताहि शीस खसि परई । देखो भिक्षुक कहा मोर करई ॥ जहैं सुनींद्र तहैं रावण आई । सत्तर बार तरवार चलाई ॥ लै सुनींद्र यक तृणको ओटा । अतिबल रावण मान्यो चोटा ॥ रावण अस्त्र अफल जब भयऊ । तब खिसियायके सोरहि गयऊ ॥ तृण सुनींद्र लीने यहि भावन । बल तुमार देखो नृप रावण ॥ काटे जो तृण कटै न तेरे । कौन भाँति शिर खंडै मेरे ॥ मन्दोदरी कहै समुझाई । हे नृप सतगुरुको गहु पाई ॥ रावण कहे सहित अभिमाना । सेवों शिव नहिं जानों आना ॥ जाने अटल राज मोहिं दीना । ताहि दंडवत पलपल कीना ॥ ऐसो वचन सुनींद्र पुकारी । हो रावण तुम गर्व प्रहारी ॥ भेद हमारा तुम नहिं जानी । वचन एक तोहि कहौं बखानी ॥ रामचंद्र तोहि माँरें आई । मांस तुम्हार स्वान नहिं खाई ॥ रावणको कीनो अपमाना । औध नग्र कह कीन पयांना ॥ मारगमाहँ चलो जब जाई । मधुकर विप्र मिला तब आई ॥ सो सुनींद्रके चरनन परेऊ । अतिसै प्रेम मोद मन भरेऊ ॥ तापर सतगुरु कीनी दाय। सहितकुटुम निजलोक पठाया ॥

( १२६ )

बोधसागर

रामचन्द्र वन भये दुखारी । तबहिं मुनींद्र तहाँ पग धारी ॥ योग युक्ति रघुपतिहि दृढ़ाई । बहुविधि ताकहैं शांति धराई ॥ जब मुनींद्रजी दायो कीने । सेत बांधि लंका पग दीने ॥ मन संशय कीने हनुमाना । सतगुरु कृपा लह्यौ दृढ़ ज्ञाना ॥ गरुड़ जो परम प्रेमते ध्याये । परम हंसकी पदवी पाये ॥ यहि बिधि केते जीव चेतार्ई । तब मुनींद्र निज लोक सिधार्ई । पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । दरस पाय दुख हंस विदारा ॥ कछुक दिवसजबयहिबिधि बीते । त्रेता गत द्वापर तब थीते ॥

इति त्रेतायुगवृत्तान्त

अथ द्वापर युगमें मुनींद्रजीको पृथ्वीमें आगमन कथा और करुणामय स्वामी नामधारन और जवतजीव तारन--बोपाई

पुरुष अवाज भई तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥ परम पुरुष कह शीस नवाई । महि मंडल मुनींद्र चलि आई ॥ जो प्रभु आहि नाम अरु नामी । द्वापर कह करुणामय स्वामी ॥ प्रथमहि जब भूलोक सिधारे । गढ गिरनार तहाँ पग धारे ॥ चंद्रविजय नृप नाम बखानी । गढ गिरनार तासु रजधानी ॥ परम भक्ति मय ताकी रानी । इंद्रमती तेहि नाम बखानी ॥ साधुसे परम प्रीति सो धारे । नित साधुनकी बाट निहारे ॥ साधुको जहाँ कहुँ आवत हेरे । नित आपने ढिग सो टरे ॥ परम प्रीतिसे सेवा धारे । तन मन धन साधुनपर वारे ॥ तासु प्रीतिकी रीति बिचारी । करुणामय स्वामी पग धारी ॥ जात चले तेहि मारग माहीं । रानीको मंदिर रह जाहीं ॥ देखे रानी चढ़ी अटारी । साधु जानि हरषित भइ भारी ॥ त्वरित पठायौ तहाँ निज चेरी । बेगि साधुको आनहु टेरी ॥ वृषली चलि हमकहैं शिर नावा । रानीको संदेश सुनावा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२७ )

महाराज दाया चित दीजै । भूपति भौन गौन अब कीजै ॥ करुणामय स्वामी कह ताहीं । हम नहिं भूपतिके गृह जाहीं ॥ राज काज है मान बड़ाई । हमैं साय ना नृप घर जाई ॥ पुनि वृषली रानी ढिग आवो । साधु न आवै मोर बोलावो ॥ यह सुनि इंद्रमती उठि धाई । करुणामयके पद शिर नाई ॥ मोपर दाया कीजै नाथा । मो गृह चलिये करो सनाथा ॥ रानीकी लखि प्रीति अपारा । करुणामय तिहि भौन सिधारा ॥ ताके भौन जबहि पग दीनो । चरण धोय चरनोदक लीनो ॥ रानी चरनामृत करि पाना । बहुतभांति कीने सनमाना ॥ कीन सेव भल हिय हर्षाई । पीछे ज्ञान मुननको आई ॥ सुनि गुरुज्ञान प्रीति अति बाढ़ी । चरनन लागि प्रेममें गाढ़ी ॥ नाथ मोहि गुरुदीक्षा दीजै । अपनी शरन माहिं अबलीजै ॥ रानीको गुरुदीक्षा दीना । राजा चंद्रविजय नहिं लीना ॥ रानीको निज लोक पठाया । सो सतगुरुसे विनय सुनाया ॥ हे प्रभु नृपको करो उबारा । यद्यपि वह नहिं शिष्य तुमारा ॥ भावभक्ति रानीके काजा । सतगुरु कृपा तरो सो राजा ॥ यहिबिधिजिनजिनगृहगुरुज्ञाना । सो सब सत्यलोक कर थाना ॥ हंसनको सतलोक ले जाई । तहाँ आप कछु काल वितार्ई ॥

इति द्वापर युग

अथ कलियुगमें करुणामय स्वामीको पृथ्वीमें आगमन कथा

और सत्य कबीर और सेयद अहमद कबीर शेख कबीर

नामधारण और जग जीव तारण--चौपाई

द्वापर जगको अंत जो पाया । पुरुष बचन तब टेरि सुनाया ॥ ज्ञानी बेगि जाहु मर्त्य लोक । नाश करो जीवनको शोका ॥ सत्य पुरुषको करो प्रणामा । तब ज्ञानी पहुँचे नर धामा ॥

( १२८ )

बोधसागर

प्रथमहि मृत्युलोक जब आये । कलियुग नाम कबीर कहाये ॥ हिंदू मुसलमान गुरुपीरा । मिश्रित नाम कहाव कबीरा ॥ प्रथमहि प्रकट भये चलि काशी । तहाँ आपनो ज्ञान प्रकाशी ॥ नग्रमें जबहिं धरे निज पाई । श्वपच सुदर्शन तहाँ रहाई ॥ ताने सतगुरुको पहिचाना । चरनन लागि गह्यो दृढ़ ज्ञाना ॥ जब सतगुरुकी दीक्षा पाई । करे भक्ति सो मन चित लाई ॥ श्वपच करे भक्ती मन लाई । मात पिता देखै हर्षाई ॥ भक्ति पुत्र लखि हरषित होई । सतगुरु दीक्षा लियो न दोई ॥ ताही काल कृष्ण औतारा । अरु कौरौ पांडव तन धारा ॥ सत्य कबीर कृष्णसंवादा । ज्ञानगुष्टि तहैं बहु कथि बादा ॥ कृष्णहि बहु विधि ज्ञान दृढाई । क्षर अक्षरके पार लखाई ॥ सत्य कबीर ज्ञान गंभीरा । कथे सकल सुर नर मुनितीरा ॥ ताही समय युधिष्ठिर राजा । ताने कीन यज्ञको साजा ॥ वंधु मारि अपकीरति कीना । ताते यज्ञ रचन चित दीना ॥ कृष्णकेरि जब आज्ञा पाई । तब पांडौ सब साज मँगाई ॥ यज्ञ कि सामित्री गहि सारी । जहैं तहैंते सब साधु हँकारी ॥ पांडौ प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहि काला ॥ घंट अकास बजत सुनि आवो । यज्ञको तब पूरन फल पावो ॥ जुरे तहाँ कोटिन ऋषि राजा । साधू ब्राह्मण सहित समाजा ॥ भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहि जेवाई ॥ भोजन कीन सकल ऋषिराई । बजा न घंट भूप भ्रम आई ॥ पांडौ तबहि कृष्णपहैं गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥ करिके कृपा कहो यदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥ सो अस कारण तासु बताई । साधू नहि कोइ भोजन पाई ॥ चक्रत है तब पांडौ कहेऊ । कोटिन साधू भोजन लहेऊ ॥