भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ११० )

बोधसागर

भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥

सत्यकबीर बचन

तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥

चौपाई

पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥ तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥ कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥ अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥ यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥ बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥ यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥ तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥ सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥ विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥ यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥ रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥ षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥ सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥ नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥ एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥ सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥ चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥ योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥ मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥